17 साल की उम्र में घर छोड़ा, फिर शुरू हुआ ऐसा सफर जिसकी मंजिल दिल्ली थी
नई दिल्ली। 17 सितंबर 1950 को गुजरात के वडनगर में जन्मा एक बच्चा शायद खुद भी नहीं जानता था कि उसके जीवन की कहानी एक दिन भारत की राजनीति की सबसे चर्चित यात्राओं में गिनी जाएगी। एक साधारण परिवार, छोटा-सा घर, पिता की चाय की दुकान, स्कूल की पढ़ाई, किताबों और बहसों में दिलचस्पी और फिर 17 साल की उम्र में घर छोड़कर भारत को देखने निकल पड़ा एक युवक। आज वही नरेंद्र दामोदरदास मोदी 76 वर्ष के हो गए हैं। यह कहानी सिर्फ एक प्रधानमंत्री के जन्मदिन की कहानी नहीं है। यह उस सफर की कहानी है जिसमें एक-एक करके दृश्य बदलते गए—वडनगर से अहमदाबाद, अहमदाबाद से भाजपा का संगठन, गुजरात से दिल्ली और फिर दिल्ली से दुनिया के बड़े राजनीतिक मंच तक।
वडनगर की गलियां और चाय की दुकान
नरेंद्र मोदी का बचपन गुजरात के वडनगर में बीता। परिवार आर्थिक रूप से साधारण था। प्रधानमंत्री कार्यालय की जीवनी के अनुसार, परिवार एक छोटे से घर में रहता था और नरेंद्र मोदी पढ़ाई के साथ परिवार की चाय की दुकान पर भी हाथ बंटाते थे। उनके बचपन के बारे में उपलब्ध विवरणों में किताबें पढ़ने, बहसों में रुचि और तैराकी का भी उल्लेख मिलता है। रेलवे स्टेशन और चाय की दुकान से जुड़ी उनकी बचपन की कहानी बाद के वर्षों में उनके सार्वजनिक जीवन की पहचान का हिस्सा बनी। यही वह दौर था जब एक छोटे शहर का लड़का लोगों को आते-जाते देख रहा था—अलग-अलग चेहरे, अलग-अलग बातें और देश के अलग-अलग हिस्सों से आने वाली आवाजें। कहानी का यह पहला दृश्य बिल्कुल साधारण है। लेकिन अगला दृश्य साधारण नहीं था।
17 साल का लड़का और घर से बाहर की दुनिया
लगभग 17 वर्ष की उम्र में नरेंद्र मोदी घर से निकल पड़े। अगले करीब दो वर्षों में उन्होंने भारत के अलग-अलग हिस्सों की यात्रा की। प्रधानमंत्री कार्यालय की आधिकारिक जीवनी के अनुसार, इस यात्रा के बाद वह अहमदाबाद पहुंचे और RSS से जुड़ गए। यही वह मोड़ था जहां कहानी बदलने लगी। अब चाय की दुकान वाला लड़का एक संगठन के अनुशासन में दिखाई देता है।
सुबह पांच बजे से शुरू होने वाली जिंदगी
RSS में उनका जीवन आराम वाला नहीं था। आधिकारिक जीवनी के मुताबिक, 1972 के आसपास वह प्रचारक बने और उनकी दिनचर्या सुबह जल्दी शुरू होकर देर रात तक चलती थी। संगठन का काम, यात्राएं, लोगों से संपर्क और लगातार काम—यहीं से उनकी संगठनात्मक राजनीति की नींव मजबूत हुई। इमरजेंसी के दौर में भी वह लोकतंत्र बहाली के आंदोलन से जुड़े। यानी राजनीति में उनका पहला बड़ा परिचय चुनाव लड़कर नहीं, बल्कि संगठन खड़ा करने वाले कार्यकर्ता के रूप में हुआ। और यही उनकी कहानी की एक दिलचस्प बात है। वे सीधे विधानसभा या संसद की राजनीति में नहीं आए। पहले संगठन आया। फिर सत्ता।
भाजपा के संगठन में एंट्री
1980 के दशक में नरेंद्र मोदी भाजपा के संगठन में तेजी से आगे बढ़े। 1987 में उन्होंने गुजरात भाजपा में संगठनात्मक जिम्मेदारी संभाली। प्रधानमंत्री कार्यालय की जीवनी के अनुसार, अहमदाबाद नगर निगम के चुनाव में भाजपा की सफलता से लेकर 1990 और 1995 के गुजरात विधानसभा चुनावों तक उनकी संगठन क्षमता लगातार सामने आई। इसके बाद कहानी गुजरात से बाहर निकलती है। हरियाणा और हिमाचल प्रदेश जैसे राज्यों की जिम्मेदारी मिली। राष्ट्रीय स्तर पर संगठन में काम बढ़ा। अब वह चुनाव लड़ने वाले नेता से ज्यादा चुनाव लड़वाने वाले संगठनकर्ता के रूप में पहचाने जाने लगे। और फिर आया साल 2001।
फोन की एक घंटी और जिंदगी का सबसे बड़ा मोड़
सितंबर 2001। नरेंद्र मोदी को गुजरात के मुख्यमंत्री की जिम्मेदारी मिली। यह उनके जीवन का शायद सबसे बड़ा मोड़ था। क्योंकि अब तक वह मुख्य रूप से संगठन के आदमी थे। प्रशासन चलाने का प्रत्यक्ष अनुभव उनके पास नहीं था। अचानक उन्हें पूरे गुजरात की सरकार चलानी थी। उसी समय गुजरात कई चुनौतियों से गुजर रहा था। 2001 में आए विनाशकारी भूकंप के बाद राज्य के सामने पुनर्निर्माण की बड़ी चुनौती थी। बाद के वर्षों में मोदी लगातार गुजरात के विकास मॉडल और प्रशासनिक कामकाज को अपनी राजनीतिक पहचान का हिस्सा बनाते गए। एक संगठनकर्ता अब मुख्यमंत्री की कुर्सी पर था। और फिर गुजरात में उनका राजनीतिक सफर अगले 12-13 वर्षों तक चलता रहा।
गुजरात से निकलकर राष्ट्रीय राजनीति की तरफ
2001 से 2014 तक नरेंद्र मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री रहे। इस दौरान उनका नाम गुजरात की राजनीति से निकलकर राष्ट्रीय राजनीति में तेजी से स्थापित हुआ। संसद के आधिकारिक रिकॉर्ड के अनुसार, उन्होंने 2002 से 2014 तक गुजरात विधानसभा के सदस्य के रूप में चार कार्यकाल पूरे किए। अब सवाल यह था कि क्या गुजरात का यह मुख्यमंत्री दिल्ली की राजनीति में भाजपा का सबसे बड़ा चेहरा बन सकता है? 2013 में इसका जवाब मिलने लगा। भाजपा ने नरेंद्र मोदी को 2014 लोकसभा चुनाव के लिए प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बनाया। और फिर कहानी ने अचानक एक और बड़ा मोड़ लिया।
वडनगर (गुजरात) से दिल्ली दरबार
26 मई 2014। राष्ट्रपति भवन का प्रांगण। नरेंद्र मोदी भारत के प्रधानमंत्री पद की शपथ ले रहे थे। जिस व्यक्ति की राजनीतिक शुरुआत संगठन के एक कार्यकर्ता के रूप में हुई थी, जिसने गुजरात में मुख्यमंत्री के रूप में करीब 13 साल बिताए थे, वह अब देश का प्रधानमंत्री था। 2014 की जीत के बाद 2019 में फिर सत्ता मिली। 2024 में नरेंद्र मोदी ने तीसरी बार प्रधानमंत्री पद की शपथ ली। और इस तरह वडनगर की गलियों से शुरू हुई कहानी दिल्ली के सत्ता केंद्र में लगातार तीसरे कार्यकाल तक पहुंच गई।
25 साल की सफल सत्ता यात्रा
नरेंद्र मोदी के राजनीतिक सफर का एक आंकड़ा अपने आप में कहानी कहता है। 2001 में उन्होंने गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ली थी। 2026 में वह सरकार के प्रमुख के रूप में अपने 25वें वर्ष में हैं। पहले करीब 13 साल गुजरात के मुख्यमंत्री। फिर 2014 से केंद्र में प्रधानमंत्री। यानी एक चौथाई सदी से अधिक समय से नरेंद्र मोदी भारतीय शासन व्यवस्था के शीर्ष स्तर पर बने हुए हैं। प्रधानमंत्री कार्यालय ने भी 2025 में उनके गुजरात के मुख्यमंत्री बनने के 25वें वर्ष में प्रवेश को इस रूप में दर्ज किया था। नरेंद्र मोदी की पूरी राजनीतिक यात्रा में एक चीज बार-बार वापस आती है—वडनगर। चाय की दुकान। साधारण परिवार। छोटे शहर का बचपन। और फिर संगठन की कठिन जिंदगी। आज प्रधानमंत्री बनने के बाद भी उनकी कहानी सुनाते समय उनके शुरुआती जीवन का यह हिस्सा बार-बार सामने आता है। शायद इसलिए क्योंकि यह कहानी भारतीय राजनीति में एक ऐसे रास्ते की तस्वीर बनाती है जिसमें कोई व्यक्ति सीधे सत्ता की सीढ़ी पर नहीं चढ़ता। पहले कार्यकर्ता। फिर संगठनकर्ता। फिर मुख्यमंत्री। और अंत में प्रधानमंत्री।
एक और दिलचस्प बात : प्रधानमंत्री बनने से पहले कोई केंद्रीय मंत्री पद नहीं
नरेंद्र मोदी की राजनीतिक यात्रा का एक असामान्य पहलू यह भी है कि प्रधानमंत्री बनने से पहले उन्होंने केंद्र सरकार में मंत्री के रूप में काम नहीं किया था। उनका पहला बड़ा प्रशासनिक पद ही गुजरात के मुख्यमंत्री का था और वहां से वह सीधे प्रधानमंत्री पद तक पहुंचे। भारतीय राजनीति में यह रास्ता अपने आप में अलग दिखाई देता है।
किताबों, कविताओं और विवेकानंद से भी जुड़ी कहानी
नरेंद्र मोदी की सार्वजनिक छवि सिर्फ राजनीति और चुनावों तक सीमित नहीं रही। उनके जीवन से जुड़े विवरणों में पढ़ने की आदत, बहसों में रुचि और स्वामी विवेकानंद के विचारों से प्रभावित होने का उल्लेख मिलता है। प्रधानमंत्री कार्यालय की जीवनी के अनुसार, युवावस्था में विवेकानंद के विचारों ने उनके आध्यात्मिक और सामाजिक दृष्टिकोण को प्रभावित किया। बाद के वर्षों में उनकी कविताएं और लेखन भी सार्वजनिक चर्चा का हिस्सा बने। यानी जिस व्यक्ति की कहानी अक्सर चाय की दुकान से शुरू की जाती है, उसके जीवन में किताबें, आध्यात्मिक यात्राएं, संगठन और लेखन भी साथ-साथ चलते रहे।
और अब…
वडनगर की वह छोटी-सी दुनिया बहुत पीछे छूट चुकी है। रेलवे स्टेशन की चाय से लेकर संसद भवन तक। RSS के प्रचारक से लेकर भाजपा के राष्ट्रीय संगठनकर्ता तक। गुजरात के मुख्यमंत्री से लेकर भारत के प्रधानमंत्री तक। और आज 76वें जन्मदिन पर नरेंद्र मोदी की कहानी का यह अध्याय यहां पहुंचता है कि वह भारतीय राजनीति में लगभग 25 वर्षों से लगातार सरकार के शीर्ष पद पर हैं। किसी फिल्म की तरह देखें तो कहानी में लोकेशन कई बार बदली है। वडनगर → अहमदाबाद → गुजरात → दिल्ली → दुनिया। लेकिन कहानी का मुख्य किरदार वही है। 17 सितंबर 1950 को जन्मा वडनगर का वह लड़का। जिसने शायद उस समय यह कल्पना भी नहीं की होगी कि उसकी जिंदगी एक दिन भारत की राजनीति की सबसे लंबी और सबसे ज्यादा चर्चा वाली यात्राओं में से एक बन जाएगी।
जन्मदिन पर नरेंद्र मोदी को लेकर राजनीतिक राय अलग-अलग हो सकती है, लेकिन उनके जीवन का सफर अपने आप में भारतीय लोकतंत्र में सामाजिक और राजनीतिक गतिशीलता की एक उल्लेखनीय कहानी है। जो रातों रात सफलता का आसमान छूने के सपने संजोने वाली जेन-G के लिए भी प्रेरणादायक है।
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