117 सीटें, चार यात्राएं और अकाली दल से संभावित गठबंधन: आखिर भाजपा ने पंजाब में क्या तय कर लिया है?
नशा मुक्त पंजाब यात्रा सिर्फ नशे के खिलाफ अभियान नहीं, 2027 के लिए भाजपा की बड़ी राजनीतिक परीक्षा भी—क्या पार्टी ने अकेले चलने की तैयारी कर ली है या गठबंधन की कहानी में अभी एक मोड़ बाकी है?
चंडीगढ़। पंजाब में विधानसभा चुनाव अभी कुछ महीने दूर हैं, लेकिन सियासी बिसात पर मोहरे तेजी से अपनी जगह बदलने लगे हैं। भारतीय जनता पार्टी ने जिस ‘नशा मुक्त पंजाब यात्रा’ की शुरुआत की है, वह पहली नजर में नशे के खिलाफ जनजागरण अभियान दिखाई देती है, लेकिन इसके पीछे 2027 की चुनावी राजनीति का एक बड़ा संदेश भी पढ़ा जा रहा है। चार अलग-अलग दिशाओं से निकलने वाली ये यात्राएं करीब 4,000 किलोमीटर का सफर तय करते हुए पंजाब की सभी 117 विधानसभा सीटों तक पहुंचेंगी और 30 सितंबर को जालंधर में इसका समापन होगा। वहां केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की रैली प्रस्तावित है।
चार यात्राएं, मगर निशाना पूरा पंजाब
भाजपा ने इस अभियान को इस तरह तैयार किया है कि पंजाब का कोई बड़ा राजनीतिक क्षेत्र इससे बाहर न रहे। पठानकोट से निकलने वाली पहली यात्रा माझा और सीमावर्ती इलाकों से होते हुए जालंधर पहुंचेगी, फतेहगढ़ साहिब से शुरू होने वाली दूसरी यात्रा लुधियाना, रोपड़, मोहाली, होशियारपुर, नवांशहर और फगवाड़ा जैसे इलाकों को छुएगी, फाजिल्का से शुरू होने वाली तीसरी यात्रा मालवा के बड़े हिस्से से गुजरेगी और तलवंडी साबो से निकलने वाली चौथी यात्रा बठिंडा, मानसा, बरनाला, संगरूर और पटियाला होते हुए जालंधर पहुंचेगी। यानी भाजपा ने केवल कुछ संवेदनशील जिलों को चुनने के बजाय पूरे पंजाब को अपने अभियान का मैदान बनाया है।
लेकिन 117 सीटों का आंकड़ा ही इस यात्रा की असली कहानी है
अगर मकसद केवल नशे के खिलाफ जागरूकता पैदा करना होता तो इतनी बड़ी राजनीतिक मशीनरी को एक साथ पूरे 117 विधानसभा क्षेत्रों में उतारने की जरूरत नहीं पड़ती। भाजपा पहले ही सार्वजनिक रूप से कह चुकी है कि वह 2027 में पंजाब की सभी 117 सीटों पर अपने दम पर चुनाव लड़ने की तैयारी कर रही है। पंजाब प्रभारी सतीश पूनिया ने अगस्त में साफ कहा था कि पार्टी का केंद्रीय नेतृत्व 117 सीटों पर अपने दम पर लड़ने का संदेश दे चुका है और संगठन को बूथ स्तर से मजबूत करना उनकी प्राथमिकता है। यही वजह है कि आज शुरू हुई यात्रा को भाजपा के उस ऐलान की जमीन पर परीक्षा के रूप में भी देखा जा सकता है। 117 सीटों की बात दिल्ली में बैठकर कहना अलग बात है और 117 सीटों तक अपना संगठन, कार्यकर्ता और राजनीतिक संदेश लेकर पहुंचना अलग। भाजपा इस यात्रा के जरिए शायद यही देखना चाहती है कि वह पंजाब के कितने हिस्से में अपने दम पर राजनीतिक उपस्थिति खड़ी कर सकती है।
तो क्या यह अकाली दल को भी संदेश है?
पिछले कुछ समय से पंजाब की राजनीति में भाजपा और शिरोमणि अकाली दल के संभावित पुनर्गठबंधन की चर्चाएं चलती रही हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और सुखबीर सिंह बादल की मुलाकात के बाद इन चर्चाओं को और हवा मिली, लेकिन भाजपा के पंजाब प्रभारी सतीश पूनिया ने सार्वजनिक रूप से इन अटकलों को खारिज करते हुए कहा कि मुलाकात को गठबंधन का संकेत नहीं माना जाना चाहिए और पार्टी सभी 117 सीटों पर अपने दम पर चुनाव लड़ेगी। ऐसे में चार यात्राओं के जरिए 117 सीटों तक पहुंचने की रणनीति को एक साफ राजनीतिक संदेश की तरह भी देखा जा सकता है—भाजपा इस बार चुनाव की तैयारी अकाली दल के भरोसे नहीं, अपने संगठन के भरोसे करना चाहती है। इसका मतलब यह नहीं कि भविष्य में कोई राजनीतिक समझौता संभव ही नहीं है, लेकिन इतना जरूर है कि पार्टी ने कम से कम अपनी तैयारी ऐसी रखी है जिसमें उसे गठबंधन के फैसले का इंतजार नहीं करना पड़ेगा।
भाजपा ने शायद पहली बार पंजाब में अपना ‘प्लान ए’ बदल दिया है
अकाली दल के साथ लंबे गठबंधन के दौर में पंजाब में भाजपा की भूमिका मुख्य रूप से उन सीटों तक सीमित रही जहां उसका पारंपरिक शहरी और कारोबारी आधार मजबूत था। गठबंधन टूटने के बाद उसके सामने सबसे बड़ी चुनौती यही थी कि क्या वह अपने पुराने सीमित दायरे से बाहर निकलकर पूरे पंजाब में अपना स्वतंत्र राजनीतिक आधार बना सकती है। अब 117 सीटों पर लड़ने की घोषणा और उसके बाद पूरे राज्य में संगठनात्मक गतिविधियां इस दिशा में एक बड़ा प्रयोग हैं। भाजपा के केंद्रीय संगठन की बैठकों में भी बूथ स्तर से राज्य स्तर तक संगठन मजबूत करने और 2027 के लिए रोडमैप तैयार करने पर जोर दिया गया है।
नशा इसलिए चुना गया या नशा चुनाव के लिए सबसे बड़ा मुद्दा बन गया?
भाजपा ने इस अभियान के लिए नशे को केंद्र में रखा है, लेकिन उसके नेताओं के बयानों से साफ है कि अभियान का दायरा केवल नशे तक सीमित नहीं रखा जा रहा। पार्टी नशे के साथ कानून-व्यवस्था और भ्रष्टाचार को भी जोड़ रही है। यानी राजनीतिक संदेश कुछ ऐसा बनाया जा रहा है जिसमें नशा केवल एक सामाजिक बुराई नहीं, बल्कि सरकार की कार्यप्रणाली, पुलिस व्यवस्था और पंजाब के युवाओं के भविष्य से जुड़ा सवाल बन जाए। यह भाजपा के लिए इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि नशे का मुद्दा पंजाब की राजनीति में नया नहीं है। 2022 के चुनाव में भी यह प्रमुख मुद्दों में रहा था और अब 2027 से पहले एक बार फिर सभी प्रमुख दल इसे अपनी राजनीति के केंद्र में ला रहे हैं। आज की स्थिति यह है कि भाजपा AAP सरकार पर सवाल उठा रही है, AAP भाजपा की यात्रा को राजनीतिक अभियान बता रही है और कांग्रेस दोनों दलों पर इस मुद्दे का राजनीतिक इस्तेमाल करने के आरोप लगा रही है। यानी नशा अब केवल सामाजिक मुद्दा नहीं रहा, बल्कि 2027 की चुनावी बहस का महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुका है।
मगर भाजपा के लिए असली सवाल यात्रा के बाद शुरू होगा
चार यात्राएं निकलेंगी, हजारों किलोमीटर चलेंगी, 117 विधानसभा क्षेत्रों तक पहुंचेंगी और बड़े नेता मंचों से नशे के खिलाफ आवाज उठाएंगे। लेकिन चुनावी राजनीति में असली सवाल यह होगा कि इस पूरी कवायद से भाजपा के संगठन को कितना विस्तार मिलता है। जिस पार्टी ने अब तक पंजाब में कई सीटों पर गठबंधन के सहारे चुनावी गणित साधा था, क्या वह अब हर विधानसभा क्षेत्र में अपने उम्मीदवार, कार्यकर्ता और बूथ नेटवर्क के साथ खड़ी हो सकती है? भाजपा के लिए यही इस अभियान की सबसे बड़ी राजनीतिक परीक्षा होगी।
क्या भाजपा अकेले सरकार बनाने के आत्मविश्वास में है?
भाजपा के नेताओं के बयानों में आत्मविश्वास जरूर दिखाई देता है। पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव संगठन बी.एल. संतोष ने भी पंजाब में 117 सीटों पर चुनाव लड़ने और अपने दम पर सरकार बनाने की बात कार्यकर्ताओं के बीच कही है। सतीश पूनिया भी संगठन को बूथ स्तर तक मजबूत करने की बात कर चुके हैं। लेकिन राजनीतिक आत्मविश्वास को चुनावी नतीजे की गारंटी मानना अलग बात है। 117 सीटों पर उम्मीदवार खड़ा करना और 117 सीटों पर प्रभावी चुनाव लड़ने की क्षमता पैदा करना भाजपा के लिए एक बड़ी संगठनात्मक चुनौती होगी। इसलिए फिलहाल ज्यादा सटीक तस्वीर यह है कि भाजपा अकेले लड़ने के लिए खुद को पूरी तरह तैयार कर रही है और इसी तैयारी के जरिए यह परखना चाहती है कि पंजाब में उसका स्वतंत्र आधार कितना बड़ा हो सकता है।
और यहीं से अकाली गठबंधन की कहानी फिर दिलचस्प हो जाती है
अगर भाजपा अभी से 117 सीटों पर अपना संगठन खड़ा करती है, उम्मीदवारों की तलाश करती है और हर क्षेत्र में अपनी राजनीतिक मौजूदगी बनाती है तो भविष्य में अगर किसी गठबंधन की बातचीत होती भी है, तो वह पहले जैसी मजबूरी वाली बातचीत नहीं होगी। भाजपा के पास तब यह कहने की स्थिति होगी कि वह अकेले भी मैदान में उतरने की तैयारी कर चुकी है। दूसरी तरफ अकाली दल के लिए भी भाजपा के साथ रिश्तों का सवाल केवल सीटों के बंटवारे का नहीं बल्कि अपने पारंपरिक राजनीतिक आधार और भविष्य की रणनीति का सवाल होगा। सार्वजनिक तौर पर भाजपा फिलहाल गठबंधन से इनकार कर रही है, जबकि राजनीतिक चर्चाओं में संभावित पुनर्गठबंधन की अटकलें बनी हुई हैं। इसलिए दरवाजा बंद है या सिर्फ अभी खोला नहीं गया है—इसका जवाब समय के साथ ही साफ होगा।
जालंधर में खत्म होगी यात्रा, लेकिन शुरू होगी अगली कहानी
चार दिशाओं से निकलकर 30 सितंबर को जालंधर में मिलने वाली इन यात्राओं का समापन भी अपने आप में राजनीतिक संदेश रखता है। दोआबा के केंद्र जालंधर में होने वाली रैली को भाजपा अपने राज्यव्यापी अभियान के अगले चरण की शुरुआत के रूप में इस्तेमाल कर सकती है। करीब 4,000 किलोमीटर और 117 विधानसभा क्षेत्रों तक पहुंचने के बाद पार्टी के सामने अगला काम इस जनसंपर्क को चुनावी संगठन में बदलने का होगा।
पंजाब की राजनीति में अभी तस्वीर पूरी तरह साफ नहीं हुई है
इस समय भाजपा का सार्वजनिक संदेश बिल्कुल स्पष्ट है—अकेले लड़ने की तैयारी, 117 सीटों पर संगठन और नशे को बड़ा चुनावी मुद्दा बनाना। लेकिन पंजाब की राजनीति में चुनाव से पहले गठबंधन, सीटों का गणित और राजनीतिक समीकरण कई बार आखिरी दौर में बदलते रहे हैं। इसलिए आज की तारीख में न तो यह कहना उचित होगा कि भाजपा और अकाली दल का गठबंधन तय है, और न यह कि भविष्य में किसी समझौते की कोई संभावना नहीं बची है। इतना जरूर है कि भाजपा ने अपना संगठन इस तरह तैयार करना शुरू कर दिया है कि उसे किसी गठबंधन के फैसले का इंतजार करके चुनावी तैयारी शुरू न करनी पड़े। यही इस नशा मुक्त पंजाब यात्रा का सबसे बड़ा राजनीतिक संदेश हो सकता है—भाजपा अब पंजाब में किसी के कंधे पर बैठकर नहीं, कम से कम अपनी ताकत को आजमाकर आगे बढ़ने की तैयारी कर रही है। अब सवाल यह नहीं कि यात्रा कितने किलोमीटर चलेगी; सवाल यह है कि 4,000 किलोमीटर की इस यात्रा के बाद भाजपा के साथ कितने किलोमीटर का राजनीतिक रास्ता बचा रहेगा—और उस रास्ते पर वह अकेली चलेगी या रास्ते में कोई पुराना साथी फिर साथ आ जाएगा।
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