2027 के चुनाव के लिए नशे को बनाया भाजपा का केंद्रीय मुद्दा, 31 दिसंबर 2029 तक पंजाब को चिट्टे से मुक्त करने का वादा; 117 सीटों वाली यात्रा के मंच से गठबंधन पर कोई नई घोषणा नहीं

जालंधर। पंजाब में 2027 विधानसभा चुनाव की सियासी जमीन तैयार होने के बीच भाजपा की ‘नशा मुक्त पंजाब यात्रा’ के समापन पर जालंधर के परागपुर में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने अपने भाषण में नशे को चुनावी राजनीति के केंद्र में रखने का स्पष्ट संकेत दिया। चार यात्राओं के जरिए प्रदेश की सभी 117 विधानसभा सीटों को कवर करने के बाद आयोजित इस रैली में शाह ने पंजाब के सामने मौजूद किसान, कानून-व्यवस्था, महिला सुरक्षा और बेरोजगारी जैसे दूसरे मुद्दों का जिक्र तो किया, लेकिन कहा कि आने वाला विधानसभा चुनाव भाजपा मुख्य रूप से ‘नशा मुक्त पंजाब’ के मुद्दे पर लड़ेगी। उन्होंने पंजाब की माताओं और युवाओं से वादा करते हुए कहा कि भाजपा को समर्थन मिलने पर 31 दिसंबर 2029 तक पंजाब को चिट्टे से मुक्त करने का लक्ष्य रखा गया है।
पंजाब के बलिदान से नशे के मुद्दे तक
शाह ने अपने भाषण की शुरुआत पंजाब के किसान और जवान के योगदान से की। उन्होंने कहा कि जब देश को अनाज की जरूरत पड़ी तो पंजाब के किसानों ने योगदान दिया और जब देश की सीमाओं की रक्षा की जरूरत पड़ी तो पंजाब के जवानों ने बलिदान दिया। इसी पृष्ठभूमि में उन्होंने नशे को पंजाब के भविष्य से जोड़ते हुए कहा कि जब तक पंजाब का युवा नशे से मुक्त नहीं होगा, तब तक राज्य का पूरा विकास संभव नहीं है। शाह ने दावा किया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली भाजपा सरकार ने कश्मीर में आतंकवाद, नक्सलवाद और पूर्वोत्तर में आतंकवाद के खिलाफ कार्रवाई की है और उसी तरह पंजाब में नशे के खिलाफ भी सख्त व्यवस्था बनाने की बात कही। ये उनके राजनीतिक भाषण में किए गए दावे और वादे थे। नशे के खिलाफ केंद्र की कार्रवाई का आंकड़ा रखते हुए शाह ने कांग्रेस और भाजपा सरकारों के कार्यकाल की तुलना भी की। उपलब्ध सरकारी रिकॉर्ड में गृह मंत्रालय की ओर से पहले बताया गया आंकड़ा है कि 2004 से 2013 के दौरान करीब 26 लाख किलोग्राम मादक पदार्थ, जिसकी कीमत लगभग 40 हजार करोड़ रुपये बताई गई, जब्त किया गया था, जबकि 2014 से 2025 के दौरान करीब 1.11 करोड़ किलोग्राम मादक पदार्थ जब्त किए जाने की जानकारी दी गई थी। जालंधर में शाह ने इसी तुलना को अपने राजनीतिक तर्क का हिस्सा बनाया।
मान सरकार के पुराने वादों की फाइल फिर खोली
भाषण का दूसरा बड़ा हिस्सा मुख्यमंत्री भगवंत मान और आम आदमी पार्टी सरकार के चुनावी वादों पर केंद्रित रहा। शाह ने 25 लाख नई नौकरियों, 2,500 रुपये विधवा पेंशन, खनन से सालाना 20 हजार करोड़ रुपये की आय बढ़ाने, सभी फसलों पर एमएसपी, 16 हजार मोहल्ला क्लीनिक, 16 मेडिकल कॉलेज तथा 1984 के सिख विरोधी दंगा पीड़ितों को पांच लाख रुपये सहायता जैसे वादों का जिक्र करते हुए पूछा कि इनका क्या हुआ। इन आंकड़ों और वादों को लेकर भाजपा लंबे समय से AAP सरकार पर सवाल उठाती रही है; इसलिए जालंधर के भाषण में भी वही पुराना राजनीतिक हिसाब-किताब नए चुनावी संदर्भ में सामने आया। विज्ञापन खर्च का आंकड़ा भी शाह के निशाने पर रहा। उन्होंने पंजाब सरकार पर 785 करोड़ रुपये विज्ञापनों पर खर्च करने का आरोप लगाया। यह आंकड़ा इससे पहले मार्च 2026 की मोगा रैली में भी शाह के भाषण में सामने आया था।
कांग्रेस निशाने पर, लेकिन अकाली दल का नाम नहीं
जालंधर के भाषण में शाह ने आम आदमी पार्टी सरकार के साथ कांग्रेस पर भी हमला किया। लेकिन ध्यान देने वाली बात यह रही कि उनके संबोधन में शिरोमणि अकाली दल का उल्लेख नहीं आया। यह उस समय हुआ जब पंजाब की राजनीति में पिछले कुछ महीनों से भाजपा और अकाली दल के बीच संभावित राजनीतिक समीकरण को लेकर चर्चा चलती रही है। इससे एक सवाल जरूर खुला रहता है—क्या रैली का फोकस केवल नशे के मुद्दे और AAP-कांग्रेस पर हमला करने तक सीमित था, या भाजपा ने अकाली दल को लेकर अपनी स्थिति पर सार्वजनिक टिप्पणी से फिलहाल दूरी बनाए रखना तय किया है? जालंधर के भाषण से इसका कोई सीधा जवाब नहीं मिला। उपलब्ध रिपोर्ट के मुताबिक शाह ने संभावित SAD-BJP गठबंधन पर कोई घोषणा नहीं की। इसी तरह चारों नशा मुक्ति यात्राओं का 117 विधानसभा क्षेत्रों से गुजरना भाजपा के प्रदेशव्यापी अभियान का हिस्सा था, लेकिन जालंधर के इस भाषण में शाह ने यह नई घोषणा नहीं की कि भाजपा 2027 में सभी 117 सीटों पर अकेले चुनाव लड़ेगी। भाजपा की ओर से पहले 117 सीटों पर चुनाव लड़ने की तैयारी के संकेत जरूर दिए जा चुके हैं, लेकिन आज के भाषण में उस पर कोई नया औपचारिक ऐलान नहीं हुआ। यही वह बिंदु है जहां जालंधर की रैली सामान्य राजनीतिक सभा से आगे चुनावी संकेतों की चर्चा का विषय बनती है। भाजपा ने नशे को अपना प्रमुख चुनावी मुद्दा घोषित किया, AAP और कांग्रेस पर सीधा हमला किया, 2029 की समयसीमा रखी, लेकिन अकाली दल के साथ संभावित रिश्ते या 117 सीटों पर अकेले चुनाव लड़ने को लेकर कोई नई बात नहीं कही। अब पंजाब की राजनीति में अगला सवाल यही रहेगा कि आने वाले महीनों में भाजपा की यह लाइन कितनी स्थिर रहती है और अकाली दल को लेकर पार्टी की सार्वजनिक भाषा किस दिशा में जाती है।
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