अगर विजय इंदर सिंगला के नाम पर लगी मोहर तो क्या यह सिर्फ संगठन में बदलाव होगा या 2027 के लिए ‘सोशल इंजीनियरिंग’ का नया प्रयोग?
चंडीगढ़/पंजाब | D-News Buzz
पंजाब कांग्रेस में पिछले कई महीनों से चल रही अंदरूनी खींचतान अब उस मोड़ पर पहुंच गई है, जहां सवाल सिर्फ यह नहीं रह गया कि अमरिंदर सिंह राजा वड़िंग की जगह कौन आएगा? असली सवाल यह है कि उनके बाद आने वाला चेहरा कांग्रेस की उस पूरी राजनीतिक पहेली को कैसे सुलझाएगा, जिसमें जाट सिख नेतृत्व, दलित प्रतिनिधित्व, हिंदू वोट और मुख्यमंत्री पद की संभावित दावेदारी—सब एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं।
कांग्रेस हाईकमान द्वारा वड़िंग को प्रदेश अध्यक्ष पद से हटाने का फैसला किए जाने की खबर सामने आने के बाद तस्वीर तेजी से बदली है। वड़िंग ने 1 अक्टूबर को अपने सोशल मीडिया प्रोफाइल में खुद को ‘Former PPCC President’ लिख दिया। यानी अब औपचारिक घोषणा का इंतजार है, लेकिन संगठन के भीतर यह संदेश लगभग साफ माना जा रहा है कि पंजाब कांग्रेस को नया कप्तान मिलने वाला है। और इसी के साथ सबसे ज्यादा चर्चा जिस नाम की है, वह है विजय इंदर सिंगला।
क्या कांग्रेस ‘हिंदू कार्ड’ की तरफ बढ़ रही है?
विजय इंदर सिंगला का नाम इसलिए भी चर्चा में है क्योंकि वह पंजाब कांग्रेस के प्रमुख हिंदू चेहरों में गिने जाते हैं। जुलाई में कांग्रेस ने उन्हें चुनाव प्रबंधन और समन्वय समिति की जिम्मेदारी भी दी थी। अब अगर वही प्रदेश कांग्रेस की कमान संभालते हैं तो इसे केवल संगठनात्मक नियुक्ति मानना या इसके पीछे व्यापक राजनीतिक संतुलन देखना—यह आने वाले दिनों में कांग्रेस की रणनीति से समझ आएगा। अगर प्रदेश अध्यक्ष एक हिंदू चेहरा बनता है, तो फिर कांग्रेस के जाट सिख नेतृत्व का सबसे बड़ा चेहरा कौन होगा? क्या सुखजिंदर सिंह रंधावा, परगट सिंह, गुरजीत सिंह औजला या कोई दूसरा जाट सिख नेता उस राजनीतिक स्पेस को भर पाएगा? या कांग्रेस संगठन और चुनावी नेतृत्व की अलग-अलग जिम्मेदारियों के जरिए इस समीकरण को साधेगी?
कांग्रेस ने जुलाई में पूर्व मुख्यमंत्री चरनजीत सिंह चन्नी को 2027 विधानसभा चुनाव के लिए Campaign Committee का चेयरमैन बनाया था। यानी अगर प्रदेश अध्यक्ष की कुर्सी किसी दूसरे समुदाय के चेहरे को जाती है, तो चन्नी के पास पहले से ही चुनाव अभियान की महत्वपूर्ण भूमिका होगी। चन्नी का राजनीतिक महत्व इसलिए भी कम नहीं है कि पंजाब में दलित मतदाताओं की संख्या महत्वपूर्ण है और पार्टी के भीतर प्रतिनिधित्व का सवाल पहले भी खुलकर उठ चुका है। इस साल जनवरी में चन्नी ने संगठन में दलित प्रतिनिधित्व को लेकर सवाल उठाए थे, जिस पर कांग्रेस के भीतर काफी राजनीतिक बहस हुई। तो क्या कांग्रेस एक ऐसी व्यवस्था बनाने की कोशिश कर रही है जिसमें—प्रदेश अध्यक्ष — हिंदू चेहरा,चुनावी अभियान — दलित चेहरा, और संगठन में प्रभावशाली जिम्मेदारियां — जाट सिख नेताओं के पास? अगर ऐसा कोई संतुलन बनता है तो पंजाब कांग्रेस की यह नई संरचना अपने आप में 2027 की राजनीति का एक बड़ा संकेत बन सकती है।
रंधावा की कहानी भी अभी खत्म नहीं हुई
इस पूरे खेल में सुखजिंदर सिंह रंधावा का नाम भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। रंधावा पहले भी पंजाब कांग्रेस अध्यक्ष पद के संभावित चेहरों में रहे हैं और जुलाई में उन्हें Core Committee की जिम्मेदारी दी गई थी। कांग्रेस के अंदर चल रही खींचतान के दौरान वह चन्नी खेमे के साथ भी दिखाई दिए। यानी अगर हाईकमान हिंदू चेहरे को प्रदेश अध्यक्ष बनाता है तो रंधावा जैसे जाट सिख नेताओं की भूमिका और महत्व अपने आप बढ़ सकता है। और यहीं से एक और सवाल निकलता है—क्या कांग्रेस एक व्यक्ति को मजबूत करने के बजाय कई चेहरों को अलग-अलग जिम्मेदारियां देकर 2027 की लड़ाई लड़ना चाहती है?
हिंदू वोट की चिंता भी कहानी का हिस्सा
पंजाब की राजनीति को सिर्फ सिख बनाम हिंदू या जाट बनाम दलित के चश्मे से देखना तस्वीर को अधूरा कर देगा। शहरी और अर्ध-शहरी पंजाब में हिंदू मतदाताओं की भूमिका महत्वपूर्ण है और कांग्रेस के सामने यह चुनौती भी है कि इस वर्ग के साथ उसका राजनीतिक जुड़ाव कितना मजबूत है। इसीलिए कांग्रेस के भीतर पहले भी हिंदू चेहरे को संगठन में महत्वपूर्ण भूमिका देने की चर्चा होती रही है। जून में भी पार्टी की नेतृत्व व्यवस्था को लेकर ऐसी खबरें आई थीं कि हाईकमान हिंदू और सिख नेतृत्व के बीच संतुलन बनाना चाहता है। अगर कांग्रेस हिंदू प्रदेश अध्यक्ष बनाती है, तो क्या इससे हिंदू वोट वापस लाने का संदेश जाएगा? या फिर पार्टी का पारंपरिक जाट सिख आधार यह सवाल पूछेगा कि संगठन की सबसे बड़ी कुर्सी उससे क्यों ली गई? और अगर जाट सिख चेहरा प्रदेश अध्यक्ष बनता है तो फिर हिंदू मतदाताओं को कांग्रेस क्या राजनीतिक संदेश देगी? यानी कुर्सी एक है, लेकिन संदेश कई निकल सकते हैं।
राजा वड़िंग का ‘बलिदान’ किसके लिए?
राजा वड़िंग को हटाने की मांग पिछले कई महीनों से कांग्रेस के अंदर चल रही थी। जुलाई में हाईकमान ने उन्हें हटाने के बजाय चन्नी को Campaign Committee की कमान, सिंगला को Election Management, रंधावा को Core Committee समेत कई नेताओं को अलग-अलग जिम्मेदारियां देकर संतुलन बनाने की कोशिश की थी। लेकिन वह फार्मूला लंबे समय तक विवाद को शांत नहीं कर सका।अब सवाल यह भी है—क्या वड़िंग को हटाना कांग्रेस के अंदर चल रही लड़ाई का अंत है या सिर्फ अगले चरण की शुरुआत? क्योंकि अगर नया प्रदेश अध्यक्ष भी किसी एक गुट के बहुत करीब माना गया, तो वही कहानी फिर दोहराई जा सकती है।
सबसे बड़ा सवाल—मुख्यमंत्री चेहरा कौन?
यहां कांग्रेस के लिए सबसे दिलचस्प राजनीतिक गणित सामने आता है। अगर प्रदेश अध्यक्ष सिंगला होते हैं, चन्नी के पास Campaign Committee रहती है, रंधावा Core Committee में हैं और प्रताप सिंह बाजवा विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष हैं, तो क्या कांग्रेस जानबूझकर किसी एक चेहरे को 2027 का मुख्यमंत्री चेहरा बनने से रोकते हुए सामूहिक नेतृत्व का मॉडल तैयार कर रही है? जून में कांग्रेस की ओर से यह संकेत भी सामने आया था कि विधानसभा चुनाव में किसी एक नेता को मुख्यमंत्री चेहरे के रूप में पेश नहीं किया जाएगा। अगर यही रणनीति आगे भी रहती है, तो प्रदेश अध्यक्ष की कुर्सी का मतलब मुख्यमंत्री पद का टिकट होना जरूरी नहीं रहेगा। और शायद यही इस पूरी कहानी का सबसे बड़ा ट्विस्ट है।
वो सवाल जिनके जवाब अभी बाकी हैं-
क्या कांग्रेस हिंदू चेहरे के जरिए अपना शहरी-सामाजिक आधार मजबूत करने की कोशिश करेगी? क्या जाट सिख नेतृत्व को दूसरी महत्वपूर्ण जिम्मेदारियों के जरिए साथ रखा जाएगा? क्या चन्नी को दलित प्रतिनिधित्व और चुनावी अभियान का बड़ा चेहरा बनाकर कांग्रेस एक अलग सामाजिक समीकरण तैयार करेगी? या फिर पंजाब कांग्रेस में गुटबाजी का मूल सवाल चेहरा बदलने के बाद भी वहीं खड़ा रहेगा? एक कुर्सी खाली हुई है, लेकिन उसके साथ पंजाब कांग्रेस की राजनीति के कई दरवाजे खुल गए हैं। अब देखना यह है कि हाईकमान इनमें से किस दरवाजे से 2027 की ओर निकलता है।
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