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एक सप्ताह में अमृतसर काउंटर इंटेलिजेंस की चार बड़ी कार्रवाइयां; ड्रोन से सीमा पार से खेप, पंजाब में नेटवर्क और विदेशों में बैठे हैंडलर सामने आए

अमृतसर/चंडीगढ़|पंजाब में नशे के खिलाफ लड़ाई एक बार फिर उसी मोड़ पर खड़ी दिखाई दे रही है, जहां पुलिस की कार्रवाई और बरामदगी के आंकड़े तो बढ़ते हैं, लेकिन सवाल वहीं खड़ा रहता है—आखिर नशे की वह जड़ कहां है, जहां से पंजाब की तरफ इसकी सप्लाई लगातार पहुंच रही है? पिछले एक सप्ताह में अमृतसर काउंटर इंटेलिजेंस की चार बड़ी कार्रवाइयों में 74 किलो हेरोइन बरामद होने और 12 आरोपियों की गिरफ्तारी ने इस सवाल को और गंभीर कर दिया है। 16 सितंबर को 27 किलो, 18 सितंबर को 10 किलो, 19 सितंबर को 17 किलो और 23 सितंबर को 20 किलो हेरोइन बरामद हुई। 23 सितंबर की कार्रवाई में पुलिस के अनुसार खेप कथित तौर पर भारत-पाकिस्तान सीमा के पास तरनतारन के राजाताल इलाके में ड्रोन के जरिए पहुंचाई गई थी। प्रारंभिक जांच में दुबई स्थित एक कथित ड्रग तस्कर, पंजाब में उसके सहयोगियों और विदेशों में बैठे अन्य तस्करों के बीच संपर्क की बात सामने आई है।

पत्ते कितने भी तोड़ लें, जड़ बची रही तो पेड़ फिर खड़ा होगा

पुलिस ने तस्करों को पकड़ा, हेरोइन बरामद की और नेटवर्क की पिछली तथा अगली कड़ियां तलाशने की बात कही। यह कार्रवाई जरूरी है, लेकिन नशे के इस कारोबार को स्थायी रूप से रोकने का असली सवाल इससे आगे है। हम कब तक पत्ते तोड़ते रहेंगे? एक तस्कर पकड़ा गया, दूसरा पकड़ा गया, तीसरा नेटवर्क सामने आया; 10 किलो पकड़ा गया, फिर 17 किलो, फिर 20 किलो और देखते ही देखते एक सप्ताह में 74 किलो हेरोइन पुलिस के हाथ लगी। लेकिन अगर अगली खेप फिर सीमा पार से ड्रोन के जरिए पंजाब पहुंच जाती है तो सवाल यह है कि हम केवल पत्ते तोड़ रहे हैं या उस जड़ को काटने की दिशा में भी उतनी ही ताकत लगा रहे हैं, जहां से यह पूरा कारोबार चल रहा है? किसने खेप भेजी, किसने ड्रोन से गिराई, सीमा के इस पार उसे किसने उठाया, पैसा किसने दिया, पंजाब में किसने रिसीव की, विदेश में बैठकर निर्देश कौन दे रहा है और इस पूरे नेटवर्क की आर्थिक रीढ़ कहां है—इन सवालों के जवाब ही उस नेटवर्क की असली तस्वीर सामने ला सकते हैं।

ड्रोन से सीमा पार और फिर पंजाब तक—लड़ाई दो मोर्चों पर

पंजाब के अंदर पुलिस और कानून-व्यवस्था राज्य के विषय हैं, लेकिन भारत-पाकिस्तान अंतरराष्ट्रीय सीमा का सीमा प्रबंधन केंद्र सरकार के दायरे में आता है। इसलिए पंजाब में नशे के खिलाफ लड़ाई को केवल पंजाब सरकार या पंजाब पुलिस की जिम्मेदारी मानकर देखना अधूरा होगा। जहां से खेप भारत में प्रवेश करने की कोशिश कर रही है, वहां रोकथाम भी उतनी ही महत्वपूर्ण है जितनी पंजाब के अंदर तस्करों की गिरफ्तारी। केंद्र सरकार ने सीमा पार से नशीले पदार्थों की तस्करी और विदेशी तत्वों की भूमिका को लेकर संसद में जानकारी दी है तथा इसे आतंकवादी गतिविधियों के वित्तपोषण यानी नार्को-टेररिज्म के संदर्भ में भी रखा है। ऐसे में सीमा पर ड्रोन की निगरानी, तकनीकी क्षमता, खुफिया सूचनाओं का आदान-प्रदान और पंजाब के भीतर स्थानीय नेटवर्क की पहचान—इन सभी मोर्चों पर एक साथ काम करना जरूरी दिखाई देता है।

भाजपा की नशा-मुक्त यात्रा और अब असली सवाल

इसी बीच पंजाब में भाजपा ‘नशा मुक्त पंजाब यात्रा’ निकाल रही है। भाजपा का कहना है कि पंजाब में उसकी सरकार बनने पर नशे के कारोबार को पूरी तरह खत्म करने के लिए कठोर कार्रवाई की जाएगी और पार्टी ने दो साल के भीतर नशे की समस्या खत्म करने का दावा भी किया है। यह राजनीतिक दल का चुनावी वादा है, जिसकी वास्तविक कसौटी उसका अमल और परिणाम होंगे। लेकिन इसी दावे के साथ एक स्वाभाविक सार्वजनिक सवाल भी खड़ा होता है—अगर सीमा पार से ड्रोन के जरिए हेरोइन पंजाब तक पहुंच रही है तो सत्ता में आने के बाद भाजपा सरकार इसे रोकने की पूरी रणनीति क्या होगी? क्योंकि पंजाब में सरकार बनाना और पंजाब के अंदर पुलिस को मजबूत करना एक हिस्सा है, जबकि सीमा पार से आने वाली खेपों को रोकना केंद्र और केंद्रीय सुरक्षा तंत्र के साथ समन्वय का भी सवाल है। यहां चुनौती इसलिए भी महत्वपूर्ण हो जाती है क्योंकि केंद्र में भी भाजपा की सरकार है। ऐसे में पंजाब की जनता यह जानना चाहेगी कि नशा खत्म करने के दावे के पीछे केवल पंजाब पुलिस की कार्रवाई होगी या केंद्र और राज्य की एजेंसियों को जोड़कर सीमा से लेकर पंजाब की गलियों तक एक पूरी संयुक्त रणनीति भी तैयार की जाएगी।

नशे की लड़ाई को चुनावी नारे से आगे ले जाना होगा

पंजाब में नशा कोई नया चुनावी मुद्दा नहीं है। अलग-अलग सरकारों ने अलग-अलग समय पर इसके खिलाफ अभियान चलाए हैं और हर बार सवाल यही रहा है कि कार्रवाई के बावजूद नशे की सप्लाई चेन पूरी तरह क्यों नहीं टूटती। इसलिए इस बार बहस केवल इस बात पर नहीं होनी चाहिए कि कौन नशे के खिलाफ ज्यादा जोर से बोल रहा है, बल्कि इस बात पर होनी चाहिए कि सीमा पार से आने वाली खेप को कौन-सा तंत्र रोकेगा, विदेशी हैंडलरों तक जांच कैसे पहुंचेगी, नशे के कारोबार के पैसे और मनी ट्रेल को कैसे तोड़ा जाएगा, स्थानीय रिसीवर और सप्लायर नेटवर्क को कैसे खत्म किया जाएगा और नशे की चपेट में आ चुके युवाओं के पुनर्वास तथा रोजगार के लिए क्या स्थायी व्यवस्था होगी। क्योंकि पुलिस द्वारा 74 किलो हेरोइन पकड़ लेना एक बड़ी कार्रवाई है, लेकिन दूसरी तरफ यह आंकड़ा यह भी बताता है कि इतनी बड़ी मात्रा में नशीला पदार्थ पंजाब तक पहुंचाने की कोशिश की जा रही थी।

पंजाब ने आतंकवाद का दौर देखा है, अब नशे के मोर्चे पर वही गलती नहीं दोहराई जा सकती

पंजाब ने अतीत में सीमा पार से प्रायोजित हिंसा और आतंकवाद की भारी कीमत चुकाई है। आज की नशे की समस्या को उसी दौर की सीधी पुनरावृत्ति कहना सही नहीं होगा, लेकिन जब सीमा पार तस्करी, हथियार, विदेशी हैंडलर और नशीले पदार्थों से जुड़े नेटवर्क एक साथ सामने आते हैं तो राष्ट्रीय सुरक्षा के पहलू को नजरअंदाज भी नहीं किया जा सकता। केंद्र सरकार द्वारा नार्को-टेररिज्म को लेकर संसद में दी गई जानकारी भी बताती है कि नशीले पदार्थों का कारोबार केवल सामाजिक और आपराधिक समस्या तक सीमित नहीं रह सकता। इसलिए पंजाब की लड़ाई सिर्फ नशा बेचने वाले व्यक्ति को पकड़ने की लड़ाई नहीं है, बल्कि उस पूरे इकोसिस्टम को तोड़ने की लड़ाई है जो सीमा पार से खेप भेजता है, ड्रोन के जरिए उसे भारत तक पहुंचाता है, पैसा उपलब्ध कराता है, स्थानीय लोगों को नेटवर्क में जोड़ता है और अंत में पंजाब के किसी युवा तक नशा पहुंचाता है।

क्या हम हर दिन नई खेप पकड़ते रहेंगे!

74 किलो हेरोइन एक सप्ताह में पकड़ ली गई। पुलिस ने अपनी कार्रवाई की। लेकिन क्या हम हर दिन नई खेप पकड़ते रहेंगे, या कभी ऐसा भी होगा कि खेप भेजने वाले, पैसा लगाने वाले, सीमा पार बैठे हैंडलर, स्थानीय रिसीवर और पूरे नेटवर्क की जड़ एक साथ काटी जाएगी? पंजाब को केवल नशा-मुक्त यात्रा नहीं चाहिए, पंजाब को ऐसी नशा-मुक्त व्यवस्था चाहिए जिसमें सीमा पर ड्रोन रुकें, तस्कर का पैसा रुके, नेटवर्क टूटे और पंजाब का युवा उस बाजार तक पहुंचने से पहले ही सुरक्षित हो जाए। क्योंकि पत्ते तोड़ते रहने से पेड़ कुछ समय के लिए सूना जरूर दिख सकता है, लेकिन जड़ बची रही तो अगली बरसात में वही पेड़ फिर खड़ा हो जाएगा।


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