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क्या अमरिंदर के सवाल का मोदी ने दे दिया जवाब?

‘दिमागी नक्सल’ पर कैप्टन ने मांगी थी परिभाषा, कुछ ही घंटों बाद मोदी ने फिर छेड़ा वही मुद्दा

नई दिल्ली/चंडीगढ़।

राजनीति में कई बार जवाब शब्दों से नहीं, बल्कि उसी मुद्दे को दोबारा उठाकर दिया जाता है। शनिवार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के श्रीराम कॉलेज ऑफ कॉमर्स (SRCC) में दिए गए व्याख्यान ने कुछ ऐसा ही सवाल खड़ा कर दिया।

एक दिन पहले भाजपा नेता और पंजाब के पूर्व मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ‘दिमागी नक्सल’ वाले प्रयोग पर सवाल उठाते हुए पूछा था कि आखिर ‘दिमागी नक्सल’ कौन हैं और इस शब्द की स्पष्ट परिभाषा क्या है? कैप्टन ने यह भी सवाल उठाया था कि सरकार की आलोचना करने वालों को नक्सलवाद से जोड़ना लोकतांत्रिक व्यवस्था में कितना उचित है।

लेकिन इसके अगले ही दिन प्रधानमंत्री मोदी ने दिल्ली में छात्रों के बीच अपने संबोधन में एक बार फिर ‘दिमागी नक्सल’ का जिक्र कर दिया।

प्रधानमंत्री ने कहा कि लाल किले से उन्होंने जो बात कही थी, उसका असर होम्योपैथी की गोली की तरह धीरे-धीरे हुआ और इसके बाद देश में छिपे ‘दिमागी नक्सल’ सामने आने लगे। प्रधानमंत्री ने अपने आलोचकों पर तंज कसते हुए यह भी कहा कि उनके एक बयान के बाद दिल्ली में कई लोग बाहर निकल आए।

यहीं से राजनीतिक सवाल पैदा होता है—क्या प्रधानमंत्री मोदी ने कैप्टन अमरिंदर सिंह के सवाल का सीधे नाम लिए बिना जवाब दे दिया?

दिलचस्प बात यह है कि कैप्टन अमरिंदर सिंह का सवाल महज राजनीतिक विरोध तक सीमित नहीं था। उन्होंने मूल सवाल यह उठाया था कि ‘दिमागी नक्सल’ की सीमा आखिर तय कौन करेगा? क्या सरकार की आलोचना, असहमति या विरोध को इस श्रेणी में रखा जाएगा?

प्रधानमंत्री के ताजा बयान से ऐसा लगता है कि सरकार इस शब्द को केवल किसी एक व्यक्ति या संगठन के लिए इस्तेमाल करने के बजाय एक राजनीतिक-सामाजिक प्रवृत्ति के रूप में पेश कर रही है। हालांकि प्रधानमंत्री ने अपने संबोधन में कैप्टन अमरिंदर सिंह का नाम लेकर उन्हें जवाब नहीं दिया।

एक तरफ पंजाब के पूर्व मुख्यमंत्री और अब भाजपा नेता प्रधानमंत्री से ‘दिमागी नक्सल’ की परिभाषा पूछ रहे हैं, दूसरी तरफ प्रधानमंत्री उसी शब्द को दोबारा मंच से इस्तेमाल कर रहे हैं।

तो क्या यह महज संयोग है?

या फिर कैप्टन अमरिंदर सिंह के सवाल का एक राजनीतिक और खामोश जवाब?

यह सवाल अब इसलिए भी महत्वपूर्ण हो जाता है क्योंकि पंजाब विधानसभा चुनाव की राजनीतिक पृष्ठभूमि धीरे-धीरे गर्म हो रही है और कैप्टन अमरिंदर सिंह का हर राजनीतिक बयान स्वाभाविक रूप से पंजाब की सियासत में चर्चा पैदा करता है।

फिलहाल प्रधानमंत्री ने कैप्टन अमरिंदर सिंह का नाम लेकर कोई जवाब नहीं दिया है। लेकिन एक बात साफ है—‘दिमागी नक्सल’ शब्द पर शुरू हुई बहस अभी खत्म नहीं हुई। बल्कि प्रधानमंत्री के ताजा बयान के बाद यह बहस और तेज हो गई है।

क्या ‘दिमागी नक्सल’ सिर्फ एक राजनीतिक तंज है, या फिर इसकी कोई स्पष्ट वैचारिक और राजनीतिक परिभाषा भी है?

और अगर परिभाषा है, तो क्या उसे सार्वजनिक किया जाना चाहिए?

क्योंकि लोकतंत्र में सवाल सिर्फ यह नहीं होता कि कौन विरोध कर रहा है—सवाल यह भी होता है कि विरोध और ‘दिमागी नक्सल’ के बीच की रेखा आखिर खींचेगा कौन?


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By दिग्विन्द्र राणा

D-News Watch स्थानीय, राष्ट्रीय और समसामयिक मुद्दों पर समाचार, विशेष रिपोर्ट और विश्लेषणात्मक लेख प्रस्तुत करता है। D-News Watch के माध्यम से फगवाड़ा और पंजाब से जुड़ी स्थानीय खबरों के साथ-साथ जनहित के महत्वपूर्ण मुद्दों को तथ्यपरक और स्वतंत्र पत्रकारिता के दृष्टिकोण से प्रस्तुत किया जाता है। — दिग्विन्द्र राणा, संपादक

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