बच्चों, महिलाओं और बुजुर्गों की सुरक्षा पर उठाया सवाल, प्रशासन से स्थायी समाधान की मांग
फगवाड़ा। शहर से लेकर ग्रामीण क्षेत्रों तक सड़कों पर बढ़ती आवारा कुत्तों और पशुओं की संख्या अब महज असुविधा का मामला नहीं रह गई है। यह समस्या धीरे-धीरे आम लोगों की सुरक्षा और सड़क यातायात के लिए गंभीर चुनौती बनती जा रही है।
शिरोमणि अकाली दल एस.सी. विंग जिला कपूरथला के अध्यक्ष जत्थेदार सरूप सिंह खलवाड़ा ने इस मुद्दे पर चिंता जताते हुए प्रशासन से तत्काल ठोस कदम उठाने की मांग की है। जत्थेदार खलवाड़ा ने कहा कि फगवाड़ा शहर के विभिन्न हिस्सों के साथ-साथ ग्रामीण इलाकों में भी सड़कों पर आवारा पशुओं और कुत्तों के झुंड आम दिखाई देते हैं। कई बार पशु अचानक सड़क के बीच आ जाते हैं, जिससे वाहन चालकों को अचानक ब्रेक लगाने या वाहन मोड़ने पड़ते हैं। ऐसी स्थिति में दुर्घटना की आशंका बढ़ जाती है। वहीं, आवारा कुत्तों के झुंड विशेष रूप से पैदल आने-जाने वाले लोगों के लिए चिंता का कारण बने हुए हैं। बच्चों, महिलाओं और बुजुर्गों को इनसे अधिक खतरा रहता है। कई इलाकों में लोगों के बीच इस समस्या को लेकर डर का माहौल भी बना रहता है।
सवाल सिर्फ आवारा पशुओं का नहीं, व्यवस्था का भी
फगवाड़ा में आवारा पशुओं और कुत्तों की समस्या को लेकर सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर यह समस्या लगातार बढ़ती क्यों जा रही है और इसके स्थायी समाधान के लिए प्रशासनिक स्तर पर क्या व्यवस्था है? यदि सड़कों पर पशु लगातार घूम रहे हैं और कुत्तों के झुंड सार्वजनिक स्थानों पर दिखाई दे रहे हैं, तो केवल समय-समय पर कार्रवाई करने से समस्या का समाधान नहीं होगा। इसके लिए नगर प्रशासन, संबंधित विभागों और ग्रामीण स्तर की व्यवस्थाओं के बीच बेहतर तालमेल जरूरी है। जत्थेदार सरूप सिंह खलवाड़ा ने प्रशासन से मांग की कि शहर और ग्रामीण क्षेत्रों में आवारा कुत्तों तथा पशुओं की समस्या का बाकायदा सर्वे करवाकर संवेदनशील स्थानों की पहचान की जाए और उसके आधार पर प्रभावी कार्रवाई की जाए। उन्होंने कहा कि जनता की सुरक्षा प्रशासन की प्राथमिक जिम्मेदारी है। किसी दुर्घटना या अप्रिय घटना के बाद कार्रवाई करने के बजाय घटना होने से पहले रोकथाम की व्यवस्था करना जरूरी है। उन्होंने चेतावनी दी कि यदि समय रहते इस समस्या पर गंभीरता से ध्यान नहीं दिया गया तो आने वाले समय में सड़क हादसों के साथ-साथ आम लोगों की परेशानियां भी बढ़ सकती हैं।
अदालतों के आदेश के बाद भी कुछ दिनों की हलचल, फिर वही पुरानी तस्वीर
आवारा पशुओं और सड़कों पर घूमते कुत्तों की समस्या को लेकर सुप्रीम कोर्ट के साथ-साथ पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट और अन्य अदालतें भी समय-समय पर प्रशासन को जरूरी कदम उठाने के निर्देश देती रही हैं। अदालतों के आदेशों के बाद कुछ दिनों के लिए प्रशासनिक हलचल जरूर दिखाई देती है—सड़कों से पशु हटाए जाते हैं, अभियान चलाए जाते हैं और जिम्मेदार विभाग सक्रिय नजर आते हैं। लेकिन सवाल यह है कि यह कार्रवाई आखिर कुछ दिनों तक ही क्यों सीमित रह जाती है? अभियान खत्म होते ही व्यवस्था फिर उसी पुराने ढर्रे पर लौट आती है और सड़कों पर आवारा पशु तथा कुत्तों के झुंड दोबारा दिखाई देने लगते हैं। ऐसे में असली जरूरत केवल अभियान चलाने की नहीं, बल्कि अदालतों के निर्देशों को स्थायी व्यवस्था, नियमित निगरानी और जवाबदेही में बदलने की है। जनता यह जानना चाहती है कि जब न्यायालय इस समस्या को गंभीर मान चुके हैं, तो स्थानीय स्तर पर इसका स्थायी समाधान अब तक क्यों नहीं निकल पाया? जरूरत केवल आवारा पशुओं को सड़क से हटाने की नहीं, बल्कि ऐसी स्थायी और प्रभावी व्यवस्था बनाने की है जिससे शहर और गांवों की सड़कों पर लोगों की आवाजाही सुरक्षित हो सके। प्रशासन को अब इस मुद्दे को रोजमर्रा की परेशानी मानकर टालने के बजाय जन-सुरक्षा के गंभीर विषय के रूप में लेना होगा।
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