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28 सितंबर को हम शहीद-ए-आजम भगत सिंह की जयंती याद करके आगे बढ़े हैं और अब 2 अक्टूबर को राष्ट्रपिता महात्मा गांधी तथा देश के दूसरे प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री की जयंती मना रहे हैं। इन तीनों महान विभूतियों को एक साथ याद करना इसलिए भी जरूरी है, क्योंकि इनके जीवन, विचारों और संघर्षों के बीच भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन और राष्ट्रनिर्माण की कई महत्वपूर्ण कड़ियां जुड़ी हुई हैं।

2 अक्टूबर भारत के इतिहास की उन तारीखों में से है, जब देश एक साथ दो अलग-अलग लेकिन गहरे प्रभाव वाले व्यक्तित्वों को याद करता है। एक तरफ महात्मा गांधी—जिन्होंने भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन को सत्य, अहिंसा और जनभागीदारी की नई भाषा दी; दूसरी तरफ लाल बहादुर शास्त्री—जिनका राजनीतिक जीवन सादगी, जिम्मेदारी और व्यक्तिगत ईमानदारी के उदाहरणों के साथ याद किया जाता है। दोनों का जन्म एक ही दिन हुआ, लेकिन दोनों की सार्वजनिक यात्राएं अलग थीं। फिर भी दोनों के जीवन में एक समान धागा दिखाई देता है—व्यक्ति से बड़ा देश और पद से बड़ी जिम्मेदारी।

वहीं, 28 सितंबर को भगत सिंह की जयंती के अवसर पर हम उस युवा क्रांतिकारी को याद कर चुके हैं, जिसने औपनिवेशिक सत्ता के खिलाफ संघर्ष को साहस, विचार और बलिदान की नई ऊंचाई दी। गांधी, भगत सिंह और शास्त्री—तीनों के रास्ते अलग थे, लेकिन भारतीय इतिहास में इनका योगदान एक-दूसरे से पूरी तरह अलग-थलग नहीं देखा जा सकता। इन तीनों को साथ रखकर देखने पर स्वतंत्रता आंदोलन, नैतिक राजनीति, क्रांतिकारी चेतना और सार्वजनिक जिम्मेदारी की एक व्यापक तस्वीर सामने आती है।

इसी संदर्भ में गांधी जी का नाम आते ही एक सवाल आज भी उठता है—अगर गांधी जी चाहते तो क्या भगत सिंह की फांसी रुक सकती थी?

यह सवाल नया नहीं है। दशकों से इतिहास, राजनीति और जनचर्चा में इस पर बहस होती रही है। इस विषय पर अपनी ओर से कोई अंतिम निष्कर्ष देने के बजाय उपलब्ध दस्तावेजों और संबंधित व्यक्तियों के कथनों को देखना अधिक उचित होगा। गांधी और तत्कालीन वायसराय लॉर्ड इरविन के बीच हुई बातचीत तथा पत्राचार से इतना स्पष्ट है कि भगत सिंह का मामला उनके संवाद का हिस्सा बना था। हालांकि इन दस्तावेजों से यह निष्कर्ष सीधे नहीं निकलता कि गांधी जी के पास फांसी रोकने की निर्णायक शक्ति थी।

दस्तावेजों में क्या दर्ज है?

18 फरवरी 1931 को गांधी और इरविन के बीच हुई बातचीत के आधिकारिक विवरण में भगत सिंह और उनके साथियों की सजा का मुद्दा दर्ज है। इस बातचीत के बाद गांधी-इरविन समझौता हुआ, लेकिन भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव की फांसी माफ नहीं हुई। इसके बाद 23 मार्च 1931 को, जिस दिन तीनों को फांसी दी गई, गांधी ने वायसराय को एक पत्र लिखा। इस पत्र में उन्होंने सजा पर पुनर्विचार और उसे स्थगित करने की अपील की। पत्र में गांधी ने यह तर्क रखा कि फांसी से देश में तनाव और अशांति बढ़ सकती है तथा यदि इन युवाओं की जान बचती है तो राजनीतिक स्थिति को संभालने में मदद मिल सकती है। इस पत्र का उल्लेख गांधी के संकलित लेखन में मिलता है। इसे The Collected Works of Mahatma Gandhi में देखा जा सकता है। इसी तरह गांधी-इरविन वार्ता का विवरण Gandhi-Irwin Pact से संबंधित सरकारी अभिलेखों और ब्रिटिश भारत के आधिकारिक दस्तावेजों में उपलब्ध है। भगत सिंह के मुकदमे और फांसी से जुड़े न्यायिक दस्तावेज Lahore Conspiracy Case के रिकॉर्ड तथा राष्ट्रीय अभिलेखागार और नेहरू मेमोरियल संग्रहालय एवं पुस्तकालय में उपलब्ध सामग्री में देखे जा सकते हैं।

इन दस्तावेजों के आधार पर इतना कहना उचित है कि गांधी जी ने भगत सिंह की सजा के संबंध में अपील की थी। लेकिन यह कहना कि उन्होंने फांसी रोकने के लिए अपनी पूरी राजनीतिक शक्ति का इस्तेमाल किया या नहीं, एक व्याख्यात्मक प्रश्न है। इस पर इतिहासकारों के मत अलग-अलग हैं। गांधी जी ने स्वयं 29 मार्च 1931 को कराची में दिए गए अपने भाषण में भगत सिंह और उनके साथियों की फांसी का उल्लेख किया था। उनके वक्तव्य का आशय यह था कि वे हिंसक तरीकों से सहमत नहीं थे, लेकिन इन युवाओं के साहस और बलिदान को नकारा नहीं जा सकता। इस संदर्भ में गांधी के अपने लेखन और भाषणों को पढ़ना अधिक विश्वसनीय होगा, बजाय इसके कि बाद की राजनीतिक धारणाओं को सीधे ऐतिहासिक तथ्य मान लिया जाए। दूसरी ओर, लॉर्ड इरविन के पत्राचार और बाद के संस्मरणों से यह संकेत मिलता है कि ब्रिटिश सरकार भगत सिंह की सजा को कानून और प्रशासनिक निर्णय का विषय मान रही थी। ब्रिटिश अधिकारियों के लिए यह मामला केवल गांधी के आग्रह से बदलने वाला राजनीतिक निर्णय नहीं था। हालांकि यह भी सच है कि औपनिवेशिक सरकार राजनीतिक दबावों से पूरी तरह मुक्त नहीं थी। 

इतिहास भावनाओं से याद किया जा सकता है, लेकिन समझा दस्तावेजों से ही जाता है।

गांधी और भगत सिंह—मतभेद भी थे, सम्मान का प्रश्न भी

गांधी और भगत सिंह के रास्ते अलग थे। गांधी अहिंसा को राजनीतिक संघर्ष का आधार मानते थे, जबकि भगत सिंह और उनके साथियों ने औपनिवेशिक सत्ता के खिलाफ क्रांतिकारी रास्ता अपनाया। गांधी ने हिंसक रास्ते की आलोचना की और भगत सिंह के तरीकों से असहमति जताई। लेकिन भगत सिंह के साहस और लोकप्रियता को नकार देना भी उस दौर की वास्तविकता नहीं थी। 23 मार्च 1931 को तीन नौजवान फांसी पर चढ़े और इसके बाद उनकी शहादत भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन की स्मृति का स्थायी हिस्सा बन गई। शायद आज गांधी जी को याद करने का अर्थ यह भी है कि उनके साथ जुड़े कठिन सवालों से भागा न जाए। और भगत सिंह को याद करने का अर्थ यह भी नहीं कि महात्मा गांधी को इतिहास से काटकर देखा जाए। दोनों अपने-अपने रास्ते पर ब्रिटिश सत्ता के विरोध में खड़े थे, लेकिन रास्तों को लेकर उनके विचार अलग थे। यही इतिहास की जटिलता है।

लाल बहादुर शास्त्री—एक ऐसा जीवन जिसमें भाषण कम और उदाहरण ज्यादा थे

2 अक्टूबर 1904 को मुगलसराय में जन्मे लाल बहादुर शास्त्री का बचपन आर्थिक कठिनाइयों में बीता। उनके पिता का निधन तब हो गया था जब वे बहुत छोटे थे। प्रधानमंत्री कार्यालय की आधिकारिक जीवनी के अनुसार, बचपन में वे गर्मियों में भी बिना जूते स्कूल तक लंबी दूरी पैदल तय करते थे। आगे चलकर काशी विद्यापीठ से मिली ‘शास्त्री’ उपाधि ही उनके नाम का स्थायी हिस्सा बन गई। उनके जीवन की एक छोटी-सी घटना आज के समय में बड़ी बात लग सकती है। उनकी शादी में दहेज के रूप में चरखा और हाथ से बुना कपड़ा दिया गया। इससे ज्यादा लेने की उन्होंने इच्छा नहीं जताई। लेकिन शास्त्री जी का असली परिचय सिर्फ सादगी नहीं था। असली परीक्षा तब सामने आई जब वे रेल मंत्री थे।

1956 में महबूबनगर रेल दुर्घटना में 112 लोगों की मौत हुई। शास्त्री जी ने नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए इस्तीफा दिया, लेकिन जवाहरलाल नेहरू ने उसे स्वीकार नहीं किया। उसी वर्ष अरियालूर की एक और रेल दुर्घटना में 144 यात्रियों की मौत के बाद शास्त्री जी ने दोबारा इस्तीफा दिया और इस बार उनका इस्तीफा स्वीकार कर लिया गया। आज जब सार्वजनिक जीवन में जिम्मेदारी अक्सर बयान और आरोप-प्रत्यारोप के बीच खो जाती है, तब शास्त्री जी का यह प्रसंग एक अलग सवाल खड़ा करता है—क्या पद पर बने रहना ही सफलता है, या किसी बड़ी विफलता की नैतिक जिम्मेदारी स्वीकार करना भी नेतृत्व का हिस्सा है?

एक प्रधानमंत्री जिसने देश को सिर्फ नारा नहीं, मनोबल दिया

1964 में देश की कमान संभालने वाले शास्त्री जी का कार्यकाल लंबा नहीं था। लेकिन 1965 के युद्ध और खाद्य संकट के दौर में उनका नेतृत्व भारतीय इतिहास का महत्वपूर्ण अध्याय बना। इसी दौर में “जय जवान, जय किसान” का संदेश देश के सैनिक और किसान—दोनों को राष्ट्रीय शक्ति के केंद्र में रखता है। उनकी सादगी को लेकर कई प्रसंग आज भी सामने आते हैं। एक प्रसिद्ध उदाहरण यह है कि जब उनके परिवार को सरकारी पेंशन से कुछ राशि बचने की जानकारी मिली तो उन्होंने उस बचत को जरूरतमंदों के लिए देने की बात कही। उनके बेटे को अनुचित पदोन्नति मिलने की जानकारी मिलने पर उसे वापस करवाने का प्रसंग भी उनके जीवन से जुड़े कम चर्चित उदाहरणों में गिना जाता है। यही वे प्रसंग हैं जिन्हें शायद आज की पीढ़ी तक सिर्फ पाठ्यपुस्तक के अध्याय की तरह नहीं, बल्कि सार्वजनिक जीवन के सवाल की तरह पहुंचाने की जरूरत है।

गांधी, भगत सिंह और शास्त्री— व्यापक संदर्भ

महात्मा गांधी, भगत सिंह और लाल बहादुर शास्त्री के बीच कई अंतर थे। गांधी स्वतंत्रता आंदोलन को सत्य, अहिंसा और जनसंगठन के माध्यम से आगे बढ़ा रहे थे। भगत सिंह औपनिवेशिक सत्ता के खिलाफ क्रांतिकारी प्रतिरोध और वैचारिक संघर्ष के प्रतीक बने। वहीं शास्त्री ने स्वतंत्र भारत में सादगी, अनुशासन और नैतिक जिम्मेदारी को सार्वजनिक जीवन का आधार बनाया। इन तीनों के जीवन को साथ रखकर देखने पर एक बात सामने आती है—राजनीति और राष्ट्रसेवा उनके लिए केवल सत्ता प्राप्त करने का माध्यम नहीं थी। गांधी ने राजनीति को नैतिकता, सत्य और जनआंदोलन के सवालों से जोड़ा। भगत सिंह ने आजादी को केवल सत्ता हस्तांतरण नहीं, बल्कि सामाजिक और वैचारिक परिवर्तन का प्रश्न माना। शास्त्री ने सत्ता में रहते हुए व्यक्तिगत सादगी और जिम्मेदारी को महत्व दिया। और भगत सिंह का प्रसंग इस तस्वीर में एक जरूरी तीसरा प्रश्न जोड़ता है—क्या हम अपने इतिहास के नायकों को उनकी पूरी जटिलता के साथ याद करने के लिए तैयार हैं?

गांधी को केवल महात्मा कहकर उनके कठिन ऐतिहासिक प्रश्नों को छोड़ देना भी अधूरा है। भगत सिंह को केवल शहीद कहकर उनके विचारों और उस समय की राजनीतिक परिस्थितियों को भूल जाना भी अधूरा है। और शास्त्री जी को केवल “जय जवान, जय किसान” तक सीमित कर देना उनके जीवन की सबसे महत्वपूर्ण सीखों को छोटा कर देता है। 2 अक्टूबर इसलिए सिर्फ दो जन्मदिनों की तारीख नहीं है। यह एक ऐसा दिन है जब हम अपने इतिहास के अलग-अलग रास्तों को याद कर सकते हैं—एक तरफ गांधी का सत्य और अहिंसा का प्रयोग, दूसरी तरफ भगत सिंह का क्रांतिकारी साहस और वैचारिक संघर्ष, और तीसरी तरफ शास्त्री का जिम्मेदारी और सादगी वाला सार्वजनिक जीवन। और इनके बीच वह साझा सवाल भी खड़ा है, जो आज भी इतिहास के पन्नों से निकलकर पूछता है—आजादी की लड़ाई और राष्ट्रनिर्माण के अलग-अलग रास्तों पर चलने वाले इन लोगों को क्या हम अपने पूर्वाग्रहों से नहीं, बल्कि पूरे इतिहास के साथ पढ़ सकते हैं?

शायद यही इतिहास की इन विभूतियों को सबसे सार्थक श्रद्धांजलि होगी।


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