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पंजाब के पुनर्गठन के करीब छह दशक बाद भी कंडी क्षेत्र विकास की मुख्यधारा से पीछे, सवाल यह कि आखिर कमी कहां रह गई?

होशियारपुर। पंजाब की कहानी अगर पिछले छह दशकों की विकास यात्रा के रूप में लिखी जाए तो इसमें हरित क्रांति से लेकर कृषि, उद्योग, शिक्षा, सड़क, परिवहन और शहरों के विस्तार तक कई बड़े अध्याय मिल जाएंगे। पंजाब के कई हिस्सों ने इस दौरान ऐसी तरक्की की कि गांव और शहर के बीच का अंतर तक तेजी से कम होता चला गया। लेकिन इसी पंजाब में एक ऐसा इलाका भी है, जो आज भी विकास की उसी रफ्तार का इंतजार करता दिखाई देता है।यह इलाका है कंडी क्षेत्र।

1966 में पंजाब के पुनर्गठन के बाद से लेकर आज तक लगभग छह दशक गुजर चुके हैं। इस दौरान सरकारें बदलीं, नीतियां बदलीं, योजनाएं बनीं, बजट आए और कई परियोजनाएं शुरू हुईं। कंडी क्षेत्र के लिए अलग-अलग समय में विशेष विकास योजनाओं, सिंचाई परियोजनाओं, सड़कों, पेयजल और अन्य बुनियादी सुविधाओं पर भी काम हुआ। फिर भी सवाल अपनी जगह खड़ा है—अगर पंजाब के दूसरे इलाके विकास की दौड़ में इतनी दूर निकल गए तो कंडी क्षेत्र आज भी उस रफ्तार से क्यों नहीं चल पाया? यही सवाल आज 2026 जाते-जाते कंडी के संदर्भ में सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण हो गया है।

कंडी की कहानी सिर्फ पानी की कमी की कहानी नहीं

कंडी क्षेत्र की सबसे बड़ी समस्या लंबे समय तक पानी और सिंचाई रही है। होशियारपुर जिला प्रशासन के अनुसार कंडी क्षेत्र शिवालिक की तलहटी में स्थित ऊबड़-खाबड़ भूभाग है, जहां पानी की कमी, मिट्टी के कटाव और बरसाती छोहों की समस्या रही है। इस क्षेत्र का बड़ा हिस्सा लंबे समय तक वर्षा आधारित खेती पर निर्भर रहा। लेकिन अगर आज भी कंडी के विकास की चर्चा केवल पानी तक सीमित कर दी जाए तो शायद तस्वीर अधूरी रह जाएगी। क्योंकि विकास केवल खेत तक पानी पहुंचाने का नाम नहीं है। विकास का मतलब है—सड़क, बाजार, उद्योग, रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य, परिवहन, जमीन का बेहतर उपयोग और स्थानीय अर्थव्यवस्था में लगातार पैसा आना। कंडी की असली चुनौती यही है कि इन सभी चीजों का विकास एक साथ उस गति से नहीं हो पाया, जिस गति से पंजाब के कई अन्य हिस्सों में हुआ।

कंडी नहर की कहानी भी बहुत कुछ कहती है

कंडी क्षेत्र को सिंचाई सुविधा देने के लिए कंडी नहर परियोजना शुरू की गई थी। लेकिन इस परियोजना की कहानी अपने आप में बताती है कि इस क्षेत्र के विकास की गति कितनी धीमी रही। रिपोर्टों के अनुसार कंडी नहर परियोजना 1978 में शुरू हुई और लगभग चार दशक बाद जाकर पूरी हुई। लगभग 130 किलोमीटर लंबी इस परियोजना के दो चरणों में पहला चरण 1998-99 में पूरा हुआ, जबकि दूसरा चरण पूरा होने में करीब 18 वर्ष और लगे। यानी जिस परियोजना का उद्देश्य कंडी के खेतों तक पानी पहुंचाकर इलाके की कृषि तस्वीर बदलना था, उसे पूरा होने में ही कई पीढ़ियां निकल गईं। आज स्थिति यह है कि कंडी नहर और उससे जुड़ी सिंचाई व्यवस्था को और मजबूत करने के लिए भी नए काम चल रहे हैं। यह बताता है कि काम रुका नहीं है। लेकिन सवाल फिर वही है—क्या इसकी रफ्तार पर्याप्त है?

योजनाएं आती रहीं, लेकिन कंडी की तस्वीर क्यों नहीं बदली?

अलग-अलग सरकारों के समय कंडी और सीमावर्ती क्षेत्रों के लिए विशेष योजनाएं बनीं। सिंचाई, सड़क, पुल, पेयजल और दूसरे बुनियादी ढांचे पर काम हुआ। आज भी कई प्रोजेक्ट चल रहे हैं। इसलिए सवाल सरकारों द्वारा किए गए काम को नकारने का नहीं है। सवाल यह है कि इतने कामों के बावजूद कंडी क्षेत्र अभी तक अपनी वास्तविक क्षमता तक क्यों नहीं पहुंच पाया?

जमीन है, लेकिन क्या जमीन का पूरा इस्तेमाल हो पा रहा है?

कंडी की विकास कहानी में एक और पहलू शायद उतना ज्यादा चर्चा में नहीं आता—जमीन का बिखराव। कई गांवों में जमीन पीढ़ियों की हिस्सेदारी के बाद छोटे-छोटे टुकड़ों में बंटती चली गई है। कहीं कई वारिस हैं, कहीं हिस्सेदारी का विवाद है और कहीं जमीन का ऐसा स्वरूप है कि उसका एक साथ आर्थिक उपयोग करना आसान नहीं। नतीजा यह कि जमीन मौजूद होने के बावजूद उसका इस्तेमाल उस पैमाने पर नहीं हो पाता, जिस पैमाने पर वह क्षेत्र की अर्थव्यवस्था को बदल सकता है। किसान या जमीन का मालिक भी कई बार अपनी जमीन पर बड़ा निवेश करने की स्थिति में नहीं होता, क्योंकि जमीन के टुकड़े छोटे हैं और हिस्सेदारी की जटिलताएं अलग। यही वजह है कि कंडी की जमीन का सवाल केवल “जमीन कितनी है?” का सवाल नहीं है। असल सवाल है— “जमीन का आर्थिक उपयोग कितना हो पा रहा है?”

क्या जमीन को पर्यटन और ग्रामीण अर्थव्यवस्था से जोड़ना एक रास्ता हो सकता है?

नवंबर 2025 में पंजाब मंत्रिमंडल ने कंडी क्षेत्र में पंजाब भूमि संरक्षण अधिनियम के दायरे से बाहर की जमीन पर फार्महाउस के लिए नीति को मंजूरी दी थी। इस नीति में कम प्रभाव वाले आवासीय फार्महाउस के लिए न्यूनतम 4,000 वर्ग गज भूखंड, सीमित निर्माण और पर्यावरणीय नियंत्रण जैसी शर्तें रखी गई थीं। इसके बाद मई 2026 में पंजाब सरकार ने नई फार्म स्टे नीति भी अधिसूचित की, जिसके तहत कृषि फार्मों पर पर्यटकों के ठहरने और ग्रामीण जीवन का अनुभव कराने की व्यवस्था को बढ़ावा दिया गया है। पंजाब सरकार की पर्यटन विभाग की वेबसाइट पर फार्म टूरिज्म योजना के तहत फार्महाउसों में पर्यटकों के ठहरने और स्थानीय ग्रामीण अनुभव उपलब्ध कराने का प्रावधान भी दर्ज है। तो फिर सवाल यह है कि— क्या कंडी की प्राकृतिक खूबसूरती, बिखरी हुई जमीन और ग्रामीण वातावरण को एक व्यवस्थित पर्यटन अर्थव्यवस्था से नहीं जोड़ा जा सकता?

अगर कहीं जमीन के बड़े हिस्से मालिकों के लिए आर्थिक रूप से उपयोगी नहीं रह गए हैं, तो क्या सरकार की भूमिका केवल जमीन का रिकॉर्ड संभालने तक सीमित रहनी चाहिए? या फिर ऐसी नीतियां बनाई जा सकती हैं, जिनमें इच्छुक जमीन मालिक अपनी जमीन को पर्यटन, फार्म स्टे, बागवानी या ग्रामीण अनुभव आधारित गतिविधियों से जोड़कर नियमित आय का साधन बना सकें? यह सवाल इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे जमीन मालिक, सरकार और निवेशक—तीनों के हित एक साथ जुड़ सकते हैं।

क्या सरकार खुद जमीन लेकर उसे विकसित कर सकती है?

यह विचार बहस योग्य जरूर है, लेकिन इसे सिर्फ जमीन अधिग्रहण के रूप में देखना शायद सही नहीं होगा। कल्पना कीजिए कि कंडी के ऐसे इलाके, जहां जमीन लंबे समय से बिखरी हुई है और उसका उपयोग सीमित है, वहां इच्छुक जमीन मालिकों के साथ सहमति आधारित मॉडल विकसित किया जाए। सरकार चाहे तो कुछ क्षेत्रों में जमीन का समेकन करके बुनियादी सुविधाएं विकसित कर सकती है। सड़क पहुंचे। बिजली पहुंचे। पानी और इंटरनेट पहुंचे। बागवानी और फार्म गतिविधियां विकसित हों। और जहां पर्यावरणीय एवं कानूनी रूप से उपयुक्त हो, वहां फार्म स्टे या ग्रामीण पर्यटन जैसी गतिविधियों के लिए निवेश आए। इससे जमीन मालिक को उसकी जमीन का बेहतर आर्थिक मूल्य मिल सकता है, सरकार को विकास और करों से राजस्व मिल सकता है और निजी निवेशक को एक नया क्षेत्र मिल सकता है। लेकिन यह सब स्वैच्छिक भागीदारी, उचित मुआवजे, पारदर्शी भूमि रिकॉर्ड और पर्यावरणीय नियमों के साथ ही संभव होगा। क्योंकि कंडी का विकास उसकी प्राकृतिक खूबसूरती खत्म करके नहीं, बल्कि उसे बचाते हुए होना चाहिए।

हिमाचल ने बंजर और पहाड़ी जमीन को आर्थिक गतिविधि से जोड़ा

कंडी के ठीक दूसरी तरफ हिमाचल का उदाहरण इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि वहां भी भौगोलिक परिस्थितियां आसान नहीं हैं। हिमाचल सरकार के आर्थिक सर्वेक्षण में ऊना के हरोली में 1,405 एकड़ के बल्क ड्रग पार्क जैसी बड़ी औद्योगिक परियोजना का उल्लेख है। वहां सड़क और बिजली जैसी आधारभूत सुविधाओं के विकास पर भी काम शुरू होने की जानकारी दी गई है। यानी पहाड़ी या कम अनुकूल समझी जाने वाली जमीन को भी सरकारें अलग आर्थिक उपयोग के लिए विकसित कर सकती हैं। फिर पंजाब के कंडी क्षेत्र के बारे में सवाल क्यों न पूछा जाए? क्या कंडी की जमीन हमेशा केवल कम उत्पादक कृषि भूमि के रूप में ही देखी जाती रहेगी? या इसे उसकी प्राकृतिक खूबसूरती और भौगोलिक स्थिति के आधार पर पंजाब की ग्रामीण अर्थव्यवस्था का नया चेहरा बनाया जा सकता है?

कंडी सिर्फ पिछड़ा इलाका नहीं, पंजाब की सबसे बड़ी संभावनाओं में से एक हो सकता है

कंडी में वह सब कुछ है, जिसकी तलाश आज बड़े शहरों में रहने वाला व्यक्ति करता है। खुला वातावरण।हरियाली।शिवालिक की तलहटी। बाग। पानी की प्राकृतिक धाराएं और बरसाती छोहें। गांवों का वातावरण और शहरों से बहुत ज्यादा दूर नहीं। अगर इन प्राकृतिक खूबियों के साथ सड़क, बिजली, पानी, इंटरनेट और सुरक्षित पर्यटन सुविधाएं जुड़ जाएं तो कंडी की तस्वीर बदल सकती है। यहां केवल उद्योग ही विकास का रास्ता नहीं है। कृषि, बागवानी, ग्रामीण पर्यटन, फार्म स्टे, स्थानीय उत्पाद, छोटे व्यवसाय और रोजगार—ये सभी मिलकर कंडी की अर्थव्यवस्था बना सकते हैं।

विकास की दौड़ के लिए तैयार, कंडी की पुकार

पंजाब ने पिछले छह दशकों में बहुत कुछ बदला है। शहर बदले। सड़कें बदलीं। उद्योग बढ़े। खेती बदली। नई पीढ़ी की जरूरतें बदलीं। लेकिन कंडी के बारे में सबसे बड़ा सवाल आज भी वही है—इतने वर्षों की योजनाओं, बजटों और परियोजनाओं के बाद भी यह क्षेत्र पंजाब की विकास यात्रा की उसी रफ्तार से क्यों नहीं चल पाया? और दूसरा सवाल यह कि —जब कंडी की जमीन का एक बड़ा हिस्सा अपनी पूरी आर्थिक क्षमता में इस्तेमाल नहीं हो पा रहा, जब पंजाब खुद फार्महाउस और फार्म स्टे जैसी नीतियों के जरिए ग्रामीण पर्यटन की संभावनाएं खोल रहा है, तो क्या कंडी को इसी दिशा में एक बड़े आर्थिक अवसर के रूप में देखने का समय नहीं आ गया? कंडी को किसी सरकार की दया नहीं चाहिए। कंडी के लोगों को सिर्फ चुनावी वादे भी नहीं चाहिए। उन्हें ऐसा विकास चाहिए जिसमें उनकी जमीन, उनकी प्राकृतिक खूबसूरती और उनके बच्चों का भविष्य—तीनों सुरक्षित रहें। क्योंकि जिस कंडी को दशकों तक पंजाब का पिछड़ा इलाका समझा गया, वही कंडी अपनी प्राकृतिक खूबसूरती और भौगोलिक स्थिति के कारण पंजाब का सबसे आकर्षक ग्रामीण-पर्यटन और आर्थिक क्षेत्र बन सकता है। सवाल यह भी कि—पंजाब उसकी इस संभावना को पहचानने में और कितने साल लगाएगा?


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