त्योहारों से पहले चीनी ₹65 के करीब, गुड़ के दाम भी 10–15 फीसदी तक चढ़े; सरकार के आयात फैसले से राहत की उम्मीद
फगवाड़ा/दिग्विन्द्र राणा
त्योहारों का मौसम शुरू होने से पहले आम आदमी की जेब पर मिठास की कीमत बढ़ती जा रही है। देशभर में चीनी के दाम पिछले कुछ सप्ताह में तेजी से बढ़े हैं और पंजाब में स्थिति और भी चिंता बढ़ाने वाली है। पंजाब की मंडियों में चीनी का थोक भाव करीब ₹60 प्रति किलो तक पहुंच गया है, जबकि खुदरा बाजार में उपभोक्ताओं को करीब ₹65 प्रति किलो तक भुगतान करना पड़ रहा है।
सरकारी आंकड़ों के अनुसार 20 जुलाई को देश में चीनी का औसत खुदरा भाव ₹48.18 प्रति किलो था, जो 20 अगस्त तक बढ़कर ₹55.70 प्रति किलो हो गया। यानी एक महीने में करीब 15.6 प्रतिशत की वृद्धि हुई। दिल्ली समेत कई बाजारों में खुदरा कीमतें ₹60 प्रति किलो से ऊपर पहुंच चुकी हैं।
गुड़ भी नहीं दे रहा सस्ती मिठास का विकल्प
चीनी की तेजी का असर गुड़ और शक्कर के बाजार पर भी दिखाई दे रहा है। पंजाब में गुड़, शक्कर और ब्राउन शुगर के दाम में पिछले कुछ समय में करीब 10–15 प्रतिशत की तेजी दर्ज की गई है। देश के प्रमुख गुड़ उत्पादक राज्यों महाराष्ट्र और उत्तर प्रदेश में पिछले पखवाड़े गुड़ के दाम करीब 25 प्रतिशत तक बढ़ने की रिपोर्ट है।
यानी जो उपभोक्ता महंगी चीनी से बचने के लिए गुड़ को विकल्प मानते हैं, उनके लिए भी राहत फिलहाल आसान नहीं दिखाई दे रही।
आखिर क्यों बढ़ रही है चीनी?
चीनी की मौजूदा तेजी को लेकर बाजार में कई कारण चर्चा में हैं। त्योहारों से पहले मांग बढ़ने की उम्मीद, कारोबारियों की जमाखोरी और स्पेकुलेटिव बाइंग तथा आगामी सीजन के लिए शुरुआती स्टॉक कम रहने की आशंका ने बाजार में तेजी को हवा दी है।
इंडियन शुगर एंड बायो-एनर्जी मैन्युफैक्चरर्स एसोसिएशन (ISMA) का कहना है कि देश में वास्तविक चीनी की कमी नहीं है। उसके अनुसार 2025-26 सीजन में शुद्ध उत्पादन करीब 279 लाख टन रहने का अनुमान है, जबकि खपत 280–285 लाख टन के आसपास है और सीजन के अंत में करीब 35 लाख टन स्टॉक रहने की उम्मीद है। ISMA ने मौजूदा तेजी में panic और speculative buying को महत्वपूर्ण कारण बताया है।
क्या एथेनॉल जिम्मेदार है?
चीनी की कीमतों में तेजी के बीच एथेनॉल को लेकर भी बहस तेज है। सरकार ने हालांकि स्पष्ट किया है कि मौजूदा मूल्य वृद्धि को केवल गन्ने से एथेनॉल उत्पादन के लिए चीनी के डाइवर्शन से जोड़ना सही नहीं है। दूसरी ओर, कुछ राजनीतिक दल और बाजार विश्लेषक एथेनॉल नीति को भी उपलब्धता और कीमतों पर असर डालने वाला कारक मान रहे हैं।
सरकार ने उठाया बड़ा कदम
बढ़ती कीमतों पर काबू पाने के लिए केंद्र सरकार ने करीब एक दशक बाद 10 लाख टन कच्ची चीनी के शुल्क-मुक्त आयात की अनुमति दी है। यह सुविधा 31 अक्टूबर 2026 तक लागू रहेगी। सरकार का उद्देश्य घरेलू बाजार में उपलब्धता बढ़ाना और कीमतों में तेजी पर अंकुश लगाना है।
इसके अलावा जमाखोरी और अटकल आधारित (speculative) खरीद पर नियंत्रण के लिए चीनी के स्टॉक होल्डिंग पर भी सीमा लगाई गई है। बड़े खुदरा उपभोक्ता के लिए स्टॉक को 15 दिन की खपत तक सीमित करने का प्रावधान किया गया है।
क्या दिवाली तक और महंगी होगी मिठास?
यही सबसे बड़ा सवाल है। अगले कुछ सप्ताह चीनी बाजार के लिए महत्वपूर्ण रहने वाले हैं। अगस्त से नवंबर के बीच गणेश चतुर्थी, दशहरा और दिवाली जैसे त्योहारों के कारण चीनी की मांग सामान्य से ज्यादा रहती है। ISMA का कहना है कि देश में पर्याप्त स्टॉक मौजूद है और पैनिक खरीद कम होने पर कीमतों में नरमी आ सकती है।
दूसरी ओर, पंजाब जैसे बाजारों में थोक और खुदरा कीमतों का मौजूदा स्तर बताता है कि स्थानीय उपभोक्ताओं को निकट अवधि में महंगाई से तत्काल राहत मिलना आसान नहीं है।
बड़ा सवाल यह नहीं कि मिठास महंगी हुई है—सवाल यह है कि दिवाली की मिठाई तक इसकी कीमत कितनी बढ़ेगी?
अगर आयातित चीनी समय पर बाजार में पहुंचती है और नई पेराई के साथ घरेलू आपूर्ति सुधरती है, तो तेजी पर लगाम लग सकती है। लेकिन त्योहारों की मांग और बाजार में जारी स्पेकुलेटिव बाइंग बनी रही तो सितंबर तक कीमतों पर दबाव बना रह सकता है।
आम आदमी की थाली से मिठाई की दुकान तक असर
चीनी और गुड़ के दाम बढ़ने का असर केवल घर की चाय तक सीमित नहीं रहेगा। हलवाई, मिठाई निर्माता, बेकरी, पेय पदार्थ और अन्य खाद्य उत्पाद बनाने वाले कारोबारियों की लागत भी बढ़ेगी। अंततः इसका एक हिस्सा उपभोक्ताओं तक पहुंचना तय माना जा रहा है।
यानी इस बार सवाल सिर्फ चाय कितनी मीठी होगी, इसका नहीं—दिवाली की मिठाई कितनी महंगी होगी, इसका भी है।
D-News Watch की पड़ताल:
24 अगस्त 2026 तक उपलब्ध बाजार संकेतों के आधार पर निकट अवधि में चीनी और गुड़ के भाव ऊंचे बने रहने की संभावना है। हालांकि सरकार का 10 लाख टन आयात फैसला और नई पेराई शुरू होने के बाद आपूर्ति बढ़ने से अक्टूबर-नवंबर में कीमतों पर दबाव कम हो सकता है। मौजूदा तेजी को केवल “चीनी की कमी” कहना भी सही नहीं होगा; उपलब्ध आंकड़े स्पेकुलेटिव बाइंग और त्योहारों से पहले बढ़ी मांग की भूमिका की ओर भी संकेत करते हैं।
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