BRICS में भारत-चीन की नजदीकी ने क्यों बढ़ाई हलचल?
दुनिया की कूटनीति में इन दिनों एक के बाद एक ऐसे दृश्य सामने आ रहे हैं, जिन्हें अलग-अलग घटनाएं मानकर देखना शायद पूरी तस्वीर को समझने के लिए पर्याप्त नहीं होगा। नई दिल्ली में हुए BRICS शिखर सम्मेलन में भारत और चीन एक ही मंच पर दिखाई दिए, रूस भी उसी मंच पर था और नई दिल्ली घोषणा में संयुक्त राष्ट्र तथा सुरक्षा परिषद में विकासशील देशों की बड़ी भूमिका की जरूरत पर जोर दिया गया। सबसे महत्वपूर्ण बात यह रही कि चीन और रूस ने भारत तथा ब्राजील की संयुक्त राष्ट्र, जिसमें सुरक्षा परिषद भी शामिल है, में बड़ी भूमिका निभाने की आकांक्षा के समर्थन को दोहराया। यानी जिस चीन को भारत की स्थायी सदस्यता के रास्ते में सबसे महत्वपूर्ण देशों में गिना जाता है, वही चीन अब भारत की वैश्विक भूमिका बढ़ाने की आकांक्षा के समर्थन में खड़ा दिखाई दे रहा है। हालांकि इसे भारत की स्थायी सीट या वीटो पावर के लिए चीन का सीधा समर्थन कहना अभी सही नहीं होगा, लेकिन इतना जरूर है कि BRICS के मंच से आया यह संकेत पुराने सवालों को फिर से चर्चा में लाने के लिए काफी है।
अमेरिका का दबाव और चीन के साथ बढ़ता संवाद

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दूसरी तरफ तस्वीर का दूसरा सिरा अमेरिका में दिखाई दे रहा है। रूस से तेल और गैस खरीदने वाले देशों पर 100 प्रतिशत तक टैरिफ लगाने की शक्ति देने वाले कानून पर राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप हस्ताक्षर कर चुके हैं और भारत तथा चीन दोनों इस व्यवस्था की संभावित जद में हैं। यह कदम ऐसे समय आया है जब रूस से ऊर्जा खरीदना भारत और चीन दोनों की अर्थव्यवस्थाओं के लिए महत्वपूर्ण बना हुआ है। भारत के लिए मामला और भी संवेदनशील है क्योंकि देश अपनी कच्चे तेल की जरूरत का बड़ा हिस्सा आयात करता है और रूस हाल के वर्षों में उसका प्रमुख आपूर्तिकर्ता बना है। यानी वाशिंगटन का दबाव केवल रूस पर नहीं, बल्कि रूस के साथ व्यापारिक संबंध रखने वाली बड़ी अर्थव्यवस्थाओं पर भी असर डाल सकता है।
फिर ट्रंप शी जिनपिंग के स्वागत के लिए एयरपोर्ट क्यों जा रहे हैं?
लेकिन इसी कहानी में सबसे दिलचस्प मोड़ अब सामने आया है। चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग अमेरिका की राजकीय यात्रा पर पहुंचे हैं और डोनाल्ड ट्रंप स्वयं जॉइंट बेस एंड्रयूज पर उनका स्वागत करने वाले हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति का किसी विदेशी नेता को एयरपोर्ट पर व्यक्तिगत रूप से रिसीव करना सामान्य प्रोटोकॉल नहीं माना जाता। व्हाइट हाउस के अनुसार 23 सितंबर को ट्रंप शी जिनपिंग और उनकी पत्नी पेंग लियुआन का जॉइंट बेस एंड्रयूज पर स्वागत करेंगे और 24 सितंबर को व्हाइट हाउस में औपचारिक स्टेट अराइवल सेरेमनी भी होगी। यानी जिस चीन के साथ अमेरिका की व्यापार, तकनीक, AI, दुर्लभ खनिज और भू-राजनीतिक प्रतिस्पर्धा चल रही है, उसी चीन के राष्ट्रपति के लिए अमेरिका का सर्वोच्च स्तर का राजकीय स्वागत हो रहा है।
दबाव भी, बातचीत भी—आखिर क्यों?
यही अंतरराष्ट्रीय राजनीति का शायद सबसे दिलचस्प पहलू है। अमेरिका चीन पर दबाव डालता है, व्यापार और तकनीक के मोर्चे पर प्रतिस्पर्धा करता है, रूस के साथ चीन के संबंधों पर नजर रखता है, लेकिन उसी समय बीजिंग के साथ बातचीत भी जारी रखता है। इसके पीछे कई मुद्दे हैं—टैरिफ, दुर्लभ खनिज, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, वैश्विक व्यापार और सुरक्षा से जुड़े प्रश्न। यानी बड़ी शक्तियों की राजनीति में सार्वजनिक रूप से दिखाई देने वाला टकराव और पर्दे के पीछे चलने वाली बातचीत एक साथ चल सकती है। अमेरिका-चीन संबंधों की मौजूदा स्थिति को लेकर AP ने भी व्यापार, AI और भू-राजनीतिक मुद्दों पर तनाव के साथ-साथ दोनों देशों की स्थिरता बनाए रखने की कोशिश को रेखांकित किया है।
जब भारत और चीन एक मंच पर आए

Photo: PIB, Govt. of India
इसी बदलती तस्वीर में भारत और चीन का BRICS मंच पर साथ दिखाई देना और ज्यादा महत्वपूर्ण हो जाता है। दोनों देशों के बीच सीमा विवाद और रणनीतिक प्रतिस्पर्धा खत्म नहीं हुई है, लेकिन इसके बावजूद दोनों देशों के बीच उच्चस्तरीय संवाद फिर शुरू हुआ है और बहुपक्षीय मंचों पर सहयोग के कुछ क्षेत्र दिखाई दे रहे हैं। BRICS की नई दिल्ली घोषणा ने संयुक्त राष्ट्र के व्यापक सुधार और सुरक्षा परिषद में विकासशील देशों की प्रतिनिधित्व बढ़ाने की जरूरत को दोहराया है। घोषणा में चीन और रूस ने भारत तथा ब्राजील की संयुक्त राष्ट्र, जिसमें सुरक्षा परिषद भी शामिल है, में बड़ी भूमिका की आकांक्षा के समर्थन को भी दोहराया।
क्या चीन अब भारत की वीटो पावर के रास्ते में नहीं है?
यहां एक महत्वपूर्ण अंतर समझना जरूरी है। चीन ने BRICS घोषणा में भारत की संयुक्त राष्ट्र और सुरक्षा परिषद में बड़ी भूमिका की आकांक्षा का समर्थन किया है, लेकिन दस्तावेज में यह नहीं लिखा कि चीन भारत को स्थायी सदस्य के रूप में स्वीकार करता है या भारत को वीटो पावर देने का समर्थन करता है। इसलिए इसे “चीन ने भारत की वीटो पावर को हरी झंडी दे दी” कहना तथ्य से आगे निकल जाना होगा। लेकिन कूटनीति में शब्दों का भी अपना महत्व होता है। जिस चीन के साथ भारत का लंबे समय तक सीमा तनाव रहा, उसका भारत की संयुक्त राष्ट्र और सुरक्षा परिषद में बड़ी भूमिका की आकांक्षा का समर्थन करना निश्चित रूप से उस बहस के लिए महत्वपूर्ण है, जिसमें भारत लंबे समय से सुरक्षा परिषद में सुधार की मांग करता रहा है।
1945 की दुनिया और आज का भारत
यहीं से बात संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के मूल ढांचे तक पहुंचती है। 1945 में द्वितीय विश्व युद्ध के बाद संयुक्त राष्ट्र बना तो अमेरिका, सोवियत संघ, ब्रिटेन, फ्रांस और चीन को सुरक्षा परिषद के पांच स्थायी सदस्य बनाए गए और इन्हें वीटो का अधिकार मिला। उस समय दुनिया की शक्ति-संरचना आज से बिल्कुल अलग थी। भारत उस समय स्वतंत्रता की दहलीज पर था और आज की तरह आर्थिक, सैन्य तथा कूटनीतिक शक्ति के रूप में उसकी स्थिति नहीं थी। लेकिन 81 साल बाद दुनिया बदल चुकी है। भारत दुनिया की सबसे बड़ी आबादी वाला देश है, परमाणु शक्ति है, दुनिया की प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में शामिल है और संयुक्त राष्ट्र के शांति अभियानों में लंबे समय से महत्वपूर्ण योगदान देता रहा है। ऐसे में सुरक्षा परिषद की स्थायी संरचना को लेकर सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या 1945 की शक्ति-संरचना 2026 की दुनिया का सही प्रतिनिधित्व करती है?
फिर आया नेहरू और चीन वाला पुराना सवाल
यहीं भारत में दशकों से चली आ रही एक बेहद चर्चित धारणा सामने आती है। अक्सर कहा जाता है कि भारत को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की स्थायी सीट और वीटो पावर का अवसर मिला था, लेकिन तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने चीन के लिए वह अवसर छोड़ दिया। यह बात राजनीतिक बहस और सोशल मीडिया में इतनी बार दोहराई गई है कि कई लोगों के लिए यह लगभग स्थापित ऐतिहासिक तथ्य बन चुकी है। लेकिन जब हम मूल दस्तावेजों की तरफ जाते हैं तो कहानी कहीं ज्यादा जटिल दिखाई देती है।
संसद में नेहरू ने खुद क्या कहा था?
27 सितंबर 1955 को लोकसभा में जवाहरलाल नेहरू से सीधे पूछा गया था कि क्या भारत ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में अनौपचारिक रूप से दी गई सीट को ठुकराया था। नेहरू का जवाब साफ था—उन्होंने कहा कि यह तथ्य नहीं है और भारत को ऐसी कोई औपचारिक या अनौपचारिक पेशकश नहीं हुई थी। उन्होंने यह भी कहा कि सुरक्षा परिषद की संरचना संयुक्त राष्ट्र चार्टर में निर्धारित है और किसी नए स्थायी सदस्य को जोड़ने के लिए चार्टर में संशोधन आवश्यक होगा। उसी जवाब में नेहरू ने यह भी कहा कि भारत ने चीन को संयुक्त राष्ट्र में उसका “legitimate place” दिलाने का बार-बार समर्थन किया था।
लेकिन चीन को लेकर नेहरू की नीति क्या थी?
इसका दूसरा पहलू भी उतना ही महत्वपूर्ण है। नेहरू के दौर में भारत ने चीन के संयुक्त राष्ट्र प्रतिनिधित्व का समर्थन किया था। उस समय भारत का मानना था कि चीन की वास्तविक सरकार को संयुक्त राष्ट्र में उचित प्रतिनिधित्व मिलना चाहिए। यानी यह तथ्य मौजूद है कि भारत ने चीन के संयुक्त राष्ट्र में प्रतिनिधित्व के पक्ष में सक्रिय भूमिका निभाई थी। लेकिन इसे इस निष्कर्ष में बदल देना कि “भारत की अपनी वीटो वाली सीट चीन को दे दी गई”, उपलब्ध आधिकारिक संसदीय रिकॉर्ड से साबित नहीं होता। इतिहास यहां सोशल मीडिया के एक वाक्य से कहीं ज्यादा जटिल है।
आज की दुनिया 1950 वाली दुनिया नहीं
1950 के दशक में दुनिया की राजनीति मुख्य रूप से अमेरिका और सोवियत संघ के बीच शक्ति-संतुलन से प्रभावित थी। आज तस्वीर कहीं अधिक जटिल है। अमेरिका और चीन के बीच प्रतिस्पर्धा है, रूस पश्चिमी देशों के साथ गंभीर टकराव में है, BRICS का विस्तार हुआ है, Global South अपनी भूमिका बढ़ाने की मांग कर रहा है और भारत एक साथ अमेरिका, रूस, यूरोप, जापान तथा अन्य देशों के साथ अपने अलग-अलग रणनीतिक संबंध बनाए हुए है। व्यापार, ऊर्जा, तकनीक, AI, सेमीकंडक्टर, दुर्लभ खनिज और सप्लाई चेन अब केवल आर्थिक विषय नहीं रहे, बल्कि वैश्विक शक्ति-संतुलन का हिस्सा बन चुके हैं।
टैरिफ की धमकी से लेकर राजकीय स्वागत तक
भारत के लिए अमेरिका-चीन का यह बदलता समीकरण खास तौर पर देखने लायक है। एक तरफ ट्रंप प्रशासन के पास रूस से तेल खरीदने वाले देशों पर 100 प्रतिशत तक टैरिफ लगाने की शक्ति है और भारत तथा चीन दोनों संभावित रूप से प्रभावित हो सकते हैं। दूसरी तरफ चीन के राष्ट्रपति के लिए अमेरिका में राजकीय स्वागत और ट्रंप का स्वयं एयरपोर्ट पर मौजूद रहना यह दिखाता है कि बड़ी शक्तियों के बीच संबंध केवल टकराव की एक सीधी रेखा नहीं होते। आज प्रतिस्पर्धा के साथ बातचीत भी जरूरी है और दबाव के साथ समझौते की गुंजाइश भी बनी रहती है।
भारत के लिए बदलती तस्वीर का मतलब क्या है?
भारत के लिए यह पूरा घटनाक्रम इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि नई दिल्ली अब केवल किसी एक शक्ति-गुट पर निर्भर होकर अपनी विदेश नीति नहीं चला रही। अमेरिका के साथ रक्षा, तकनीक और रणनीतिक सहयोग है, रूस के साथ ऊर्जा और पुराने रक्षा संबंध हैं, चीन के साथ सीमा विवाद के बावजूद संवाद और व्यापार है और BRICS जैसे मंच पर भारत चीन तथा रूस के साथ मिलकर वैश्विक संस्थाओं में सुधार की बात कर रहा है। यह स्थिति भारत को एक ऐसी कूटनीतिक जगह देती है जहां वह अलग-अलग मंचों पर अलग-अलग राष्ट्रीय हितों के आधार पर काम कर सकता है।
क्या सुरक्षा परिषद अब भी 1945 की दुनिया का आईना है?
यही इस पूरी बहस का सबसे बड़ा सवाल है। BRICS की नई दिल्ली घोषणा में भी संयुक्त राष्ट्र और सुरक्षा परिषद में सुधार की आवश्यकता पर जोर दिया गया है और विकासशील देशों की प्रतिनिधित्व बढ़ाने की बात कही गई है। यह केवल भारत का मुद्दा नहीं है; अफ्रीका, एशिया और लैटिन अमेरिका के कई देश भी सुरक्षा परिषद की संरचना में बदलाव की मांग करते रहे हैं। सवाल इसलिए केवल यह नहीं है कि भारत को स्थायी सीट मिले या नहीं, बल्कि यह है कि दुनिया की वर्तमान शक्ति-संरचना और संयुक्त राष्ट्र की निर्णय लेने वाली संरचना के बीच जो अंतर है, उसे कब और कैसे कम किया जाएगा।
इतिहास का सवाल बना अब, भविष्य का सवाल
इसलिए भारत की वीटो पावर पर बहस को केवल इस सवाल तक सीमित कर देना कि “नेहरू ने सीट छोड़ी थी या नहीं”, पूरी कहानी को छोटा कर देना होगा। उपलब्ध दस्तावेज यह बताते हैं कि 1955 में नेहरू ने ऐसी किसी औपचारिक या अनौपचारिक पेशकश से इनकार किया था, जबकि भारत ने उस दौर में चीन के संयुक्त राष्ट्र प्रतिनिधित्व का समर्थन किया था। आज स्थिति पूरी तरह अलग है। भारत स्वयं सुरक्षा परिषद में बड़ी भूमिका की मांग कर रहा है, चीन और रूस BRICS घोषणा में भारत की संयुक्त राष्ट्र और सुरक्षा परिषद में बड़ी भूमिका की आकांक्षा का समर्थन दोहरा रहे हैं, अमेरिका चीन पर आर्थिक और रणनीतिक दबाव के साथ-साथ बीजिंग से उच्चस्तरीय बातचीत भी कर रहा है और दुनिया बहुध्रुवीय व्यवस्था की ओर बढ़ती दिखाई दे रही है।
असली सवाल यह है कि…
तो फिर सवाल केवल यह नहीं कि भारत को वीटो पावर कब मिलेगी? बड़ा सवाल यह है कि जिस दुनिया में अमेरिका चीन को दबाव भी देता है और उसी चीन के राष्ट्रपति का एयरपोर्ट पर खुद स्वागत भी करता है, जिस दुनिया में भारत और चीन सीमा विवाद के बावजूद BRICS में एक मंच पर बैठते हैं, जिस दुनिया में रूस भारत और चीन के साथ अपने संबंध बनाए रखता है और Global South अपनी आवाज मजबूत करने की मांग कर रहा है—उस दुनिया की सुरक्षा परिषद आखिर कब बदलेगी? अगर दुनिया 1945 जैसी नहीं रही, क्या तो भी दुनिया की सबसे शक्तिशाली संस्था 1945 के ढांचे में ही चलती रहेगी?
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