जरा सोचिए…जन्म के समय नाम के साथ अगर आपके लिए एक खास धुन भी बनाई जाए, तो कैसी होगी आपकी पहचान? जरा सोचिए…
आपके मोहल्ले में किसी बच्चे का जन्म होता है। परिवार उसका नाम रखता है और कुछ दिनों बाद पूरा मोहल्ला उसे उसी नाम से पहचानने लगता है। अब कल्पना कीजिए कि उसी बच्चे के लिए उसके नाम के साथ एक खास धुन भी बनाई जाए। ऐसी धुन कि, अगर आप उसे कहीं दूर से बुलाना चाहें तो उसका नाम पुकारने के बजाय वही धुन गुनगुना दें।
अजीब लगता है न? लेकिन यह कोई काल्पनिक लोक कथा नहीं है। बल्कि भारत के मेघालय में कोंगथोंग नाम का एक गांव है, जहां इंसानों की पहचान से जुड़ी ऐसी अनोखी परंपरा आज भी जीवित है।
दुनिया में इसे ‘व्हिसलिंग विलेज’ यानी सीटी वाला गांव भी कहा जाता है। लेकिन कहानी सिर्फ इतनी नहीं है कि यहां लोग सीटी बजाकर एक-दूसरे को बुलाते हैं। इसके पीछे पीढ़ियों से चली आ रही एक सांस्कृतिक परंपरा की कहानी छिपी है।
बच्चे के लिए मां बनाती है एक खास धुन
कोंगथोंग की इस परंपरा को खासी भाषा में ‘जिंगरवाई लावबेई’ कहा जाता है। परंपरा के अनुसार, बच्चे के जन्म के बाद मां उसके लिए एक विशेष धुन बनाती है। यह धुन उस व्यक्ति की पहचान का हिस्सा बन जाती है और रोजमर्रा की जिंदगी में उसे पुकारने के लिए इस्तेमाल की जाती है। यानी एक मां अपने बच्चे को सिर्फ नाम नहीं देती…वह उसके लिए एक आवाज भी चुनती है। और यही आवाज आगे चलकर उस व्यक्ति की एक अलग पहचान बन जाती है।
लेकिन क्या सच में यहां किसी का नाम नहीं होता?
सोशल मीडिया और कई वायरल पोस्टों में कोंगथोंग को अक्सर ऐसे गांव के रूप में बताया जाता है “जहां किसी का नाम नहीं होता।” लेकिन पूरी तस्वीर थोड़ी अलग है। कोंगथोंग के लोगों के सामान्य नाम भी होते हैं। खास धुन उनके नाम का पूरी तरह विकल्प नहीं है, बल्कि एक अतिरिक्त और विशिष्ट पहचान है। यानी अगर कागज पर किसी व्यक्ति की पहचान पूछी जाए तो उसका नाम मौजूद होगा। लेकिन गांव की रोजमर्रा की जिंदगी में…उसकी धुन भी उसे पहचानने का एक तरीका है। यही बात कोंगथोंग को इतना अनोखा बनाती है।
पहाड़ों में गूंजती है इंसानों की पहचान
कल्पना कीजिए—आप मेघालय की हरी-भरी पहाड़ियों में खड़े हैं। आसपास जंगल हैं। घरों के बीच दूरी है। और अचानक कहीं दूर से एक खास आवाज सुनाई देती है। वह किसी पक्षी की आवाज नहीं। वह किसी इंसान की बनाई हुई धुन है। जिस व्यक्ति के लिए वह धुन बनाई गई है, वह उसे सुनकर समझ सकता है कि कोई उसे बुला रहा है। कई बार यही धुन परिवार के किसी सदस्य या गांव के दूसरे व्यक्ति को दूर से पुकारने का माध्यम बन जाती है। मोबाइल फोन और इंटरनेट से बहुत पहले से चली आ रही यह परंपरा आज आधुनिक दुनिया के बीच भी अपनी जगह बनाए हुए है।
आखिर नाम की जगह धुन की जरूरत क्यों पड़ी?
यह सवाल भी कम दिलचस्प नहीं है। कोंगथोंग पहाड़ियों और जंगलों के बीच बसा इलाका है। ऐसे वातावरण में आवाज दूर तक जा सकती है। लेकिन इसे केवल “पुराने जमाने का संचार माध्यम” मान लेना भी अधूरा होगा। इस धुन में मां और बच्चे का रिश्ता, परिवार की स्मृति और खासी समुदाय की सांस्कृतिक परंपरा भी जुड़ी हुई है। यानी धुन सिर्फ आवाज नहीं है। यह विरासत भी है।
जब मोबाइल नहीं था, तब धुन थी
आज किसी को बुलाना हो तो फोन निकालिए। कॉल कीजिए। फोन न उठे तो संदेश भेजिए। और फिर भी जवाब न मिले तो व्हाट्सऐप पर संदेश लिख दीजिए—लेकिन पहाड़ी गांवों में आधुनिक संचार साधनों के आने से पहले लोगों के पास अपनी अलग दुनिया थी। आधुनिक जीवनशैली के कारण दुनिया की अनेक स्थानीय परंपराएं धीरे-धीरे कमजोर हुई हैं। लेकिन कोंगथोंग की विशेषता यह है कि उसकी धुनों की परंपरा आज भी उसकी सांस्कृतिक पहचान का हिस्सा है। मेघालय पर्यटन विभाग भी कोंगथोंग को इसी अनूठी परंपरा के लिए पहचानता है और इसे ‘व्हिसलिंग विलेज’ के रूप में प्रस्तुत करता है। गांव में खेती और मधुमक्खी पालन जैसी गतिविधियां भी स्थानीय जीवन का हिस्सा हैं। यानी कोंगथोंग केवल कोई वायरल इंटरनेट कहानी नहीं है। यह एक जीवित समुदाय है, जिसकी अपनी संस्कृति और अपनी आवाज है।
दुनिया के लिए अजीब, गांव के लिए बिल्कुल सामान्य
बाहर से देखने वाले व्यक्ति के लिए किसी को नाम के बजाय धुन से पुकारना अजीब लग सकता है। लेकिन कोंगथोंग के लोगों के लिए यह उनकी रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा है। यही किसी भी संस्कृति को समझने की सबसे जरूरी बात है। जो चीज बाहर से हमें अजीब लगती है, वह किसी दूसरे समुदाय के लिए बिल्कुल सामान्य हो सकती है। और शायद यही वजह है कि कोंगथोंग की कहानी सिर्फ “सीटी बजाने वाले गांव” की कहानी नहीं है। यह हमें यह सोचने पर मजबूर करती है कि—आखिर किसी इंसान की पहचान बनती किससे है? नाम से? चेहरे से? आवाज से? या उस रिश्ते और याद से, जो उसे दूसरों से जोड़ती है?
कोंगथोंग की सबसे खूबसूरत बात
एक बच्चे के जन्म पर मां द्वारा बनाई गई वह छोटी-सी धुन आगे चलकर उसके जीवन का हिस्सा बन जाती है। समय गुजरता है। बच्चा बड़ा होता है। वह गांव से बाहर भी जा सकता है। दुनिया बदल जाती है। मोबाइल आ जाता है। इंटरनेट आ जाता है। लेकिन उसकी वह धुन…उसकी पहचान के साथ बनी रहती है। यही वजह है कि कोंगथोंग की कहानी सुनकर शायद सबसे ज्यादा याद रहने वाली बात “सीटी” नहीं, बल्कि वह भाव है कि किसी मां ने अपने बच्चे को पुकारने के लिए एक ऐसी धुन बनाई, जो उसके साथ जीवन भर चलती रही।
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