भगवान राम ने दशरथ के लिए किया था पिंडदान, महाभारत में युधिष्ठिर को भीष्म ने समझाया श्राद्ध का महत्व; कलयुग में भी अडिग है श्रद्धा का भाव
पितृपक्ष शुरू होते ही देश के अनेक हिस्सों में लोग अपने पूर्वजों को याद करते हैं। कहीं तर्पण होता है, कहीं पिंडदान, कहीं ब्राह्मण भोजन कराया जाता है तो कहीं गरीबों और जरूरतमंदों को भोजन करवाकर अपने पितरों का स्मरण किया जाता है। लेकिन हर साल इस परंपरा के साथ एक पुरानी बहस भी लौट आती है।
क्या श्राद्ध वास्तव में जरूरी है?
करोड़ों सनातनी लोग युगों से श्राद्ध को आस्था का विषय और पूर्वजों के प्रति कृतज्ञता की परंपरा मानते हैं मगर कुछ लोग इसे सीधे-सीधे अंधविश्वास कहकर खारिज कर देते हैं। सवाल यह है कि क्या किसी परंपरा को समझे बिना उसे अंधविश्वास कह देना स्वयं एक तरह की बौद्धिक जल्दबाजी नहीं है?
आखिर श्राद्ध की परंपरा कितनी पुरानी है?
श्राद्ध कोई आधुनिक धार्मिक प्रथा नहीं है। भारतीय धर्मग्रंथों में पितृकर्म, तर्पण और श्राद्ध की चर्चा लंबे समय से मिलती है। मनुस्मृति, धर्मसूत्रों, स्मृतियों और पुराणों में पितरों के लिए किए जाने वाले कर्मों का विस्तृत उल्लेख मिलता है। महाभारत के अनुशासन पर्व में तो राजा युधिष्ठिर स्वयं भीष्म पितामह से पूछते हैं कि श्राद्ध की परंपरा की शुरुआत कैसे हुई और इसका स्वरूप क्या है। अर्थात् श्राद्ध की चर्चा केवल आज के पंडितों या टीवी चैनलों से पैदा हुई चीज नहीं है। यह भारतीय धार्मिक-सांस्कृतिक साहित्य का पुराना हिस्सा है।
भगवान राम ने भी किया था पिता दशरथ का श्राद्ध
श्राद्ध की परंपरा को समझने के लिए रामायण का प्रसंग बेहद महत्वपूर्ण है। महर्षि वाल्मीकि रामायण के अयोध्या कांड में श्री राम को वनवास के दौरान अपने पिता महाराज दशरथ के निधन का समाचार मिलता है। इसके बाद राम मंदाकिनी नदी के किनारे अपने पिता के लिए जल अर्पित करते हैं और पिंड अर्पण करते हैं। एक पारंपरिक विवरण के अनुसार राम ने वन में उपलब्ध सामग्री से ही दशरथ के लिए पिंड बनाया था। इस प्रसंग की सबसे बड़ी बात यह है कि यहां प्रश्न धन-दौलत या बड़े आयोजन का नहीं, बल्कि पुत्र द्वारा अपने पिता के प्रति श्रद्धा और कर्तव्य का है। यानी जिस परंपरा को आज कुछ लोग केवल कर्मकांड कहकर खारिज कर देते हैं, उसी परंपरा का एक महत्वपूर्ण उदाहरण रामायण जैसे महाकाव्य में मिलता है।
महाभारत में भी श्राद्ध केवल एक “रस्म” नहीं
महाभारत के अनुशासन पर्व में भीष्म पितामह युधिष्ठिर को श्राद्ध के नियम और उसके महत्व के बारे में विस्तार से बताते हैं। एक स्थान पर भीष्म विभिन्न प्रकार की श्राद्ध सामग्री और उनके धार्मिक महत्व की चर्चा करते हैं। महाभारत के दूसरे प्रसंगों में युद्ध के बाद युधिष्ठिर द्वारा युद्ध में मारे गए परिजनों और योद्धाओं के लिए श्राद्ध तथा संबंधित कर्म करवाने का उल्लेख भी मिलता है। यहां तक कि महाभारत में श्राद्ध के लिए अलग श्राद्ध पर्व का उल्लेख मिलता है।
तो सवाल फिर वही है—अगर यह परंपरा महाभारत के युगीन आख्यानों में इतनी स्पष्ट रूप से मौजूद है, तो क्या इसे समझे बिना केवल “अंधविश्वास” कह देना पर्याप्त तर्क है?
श्राद्ध का अर्थ केवल मृत व्यक्ति को भोजन पहुंचाना नहीं
श्राद्ध का धार्मिक विश्वास अपनी जगह है। सनातन परंपरा यह मानती है कि विधि-विधान से किए गए श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान का संबंध पितरों से है।लेकिन सामाजिक और मानवीय स्तर पर देखें तो इसके भीतर एक दूसरा अर्थ भी दिखाई देता है—
सनातन धर्म में मनुष्य अपने अस्तित्व को केवल अपना व्यक्तिगत अस्तित्व नहीं मानता। वह स्वीकार करता है कि उससे पहले भी पीढ़ियां थीं। उसके माता-पिता थे। उसके दादा-दादी थे।उसके परदादा-परदादी थे। किसी ने विपरीत परिस्थितियों में बच्चों को परवरिश दी तो किसी ने आने वाली पीढ़ी के लिए अपनी इच्छाएं छोड़ दीं। आज हम जिस जगह खड़े हैं, उसके पीछे अनगिनत पुरखों का जीवन और त्याग है। श्राद्ध इसी स्मृति को जीवित रखने की एक धार्मिक व्यवस्था भी है।
विज्ञान हर चीज का प्रमाण नहीं देता, लेकिन हर परंपरा को झूठा भी नहीं बनाता
किसी व्यक्ति को यह विश्वास न हो कि पिंडदान से मृत आत्मा को किसी आध्यात्मिक लोक में लाभ मिलता है—यह उसका व्यक्तिगत विचार हो सकता है। लेकिन उससे यह निष्कर्ष अपने आप नहीं निकलता कि पूरी परंपरा निरर्थक है। क्योंकि किसी परंपरा का महत्व केवल उस दावे पर निर्भर नहीं होता जिसे प्रयोगशाला में मापा जा सके। मसलन—माता-पिता के चरण छूना। पूर्वजों की तस्वीर के सामने दीप जलाना। राष्ट्रीय ध्वज को सम्मान देना। शहीदों को श्रद्धांजलि देना। किसी दिवंगत व्यक्ति की बरसी मनाना। इनमें से हर चीज को किसी वैज्ञानिक मशीन से मापकर उसका भावनात्मक मूल्य निर्धारित नहीं किया जाता। फिर भी समाज इन्हें महत्व देता है। क्योंकि मनुष्य केवल शरीर और गणना का प्राणी नहीं है। वह स्मृति, संबंध, भावना और कृतज्ञता से भी बना है।
असली सवाल उपहास की मानसिकता है
किसी व्यक्ति का नास्तिक होना उसका व्यक्तिगत अधिकार है। वह ईश्वर में विश्वास न करे—इससे किसी को आपत्ति नहीं होनी चाहिए। लेकिन समस्या वहां शुरू होती है जहां कोई व्यक्ति किसी परंपरा को जाने बिना, उसके ग्रंथ पढ़े बिना और उसके सांस्कृतिक संदर्भ को समझे बिना उसे केवल इसलिए खारिज कर देता है क्योंकि वह उसकी निजी मान्यता से मेल नहीं खाती। मगर असहमति ज्ञान का विकल्प नहीं हो सकती। अगर कोई कहता है कि “मैं श्राद्ध में विश्वास नहीं करता”, तो यह उसकी व्यक्तिगत मान्यता है।
समय के साथ सुधार की गुंजाइश हो सकती है, परंपरा को मिटा देना समाधान नहीं
यह भी जरूरी है कि श्राद्ध के नाम पर होने वाली गलत प्रथाओं, दिखावे, अनावश्यक खर्च या किसी तरह के शोषण पर सवाल जरूर उठें। सनातन परंपरा पर सवाल उठाना कोई अपराध नहीं है। लेकिन सवाल और उपहास में अंतर है। सुधार और अपमान में अंतर है। तर्क और पूर्वाग्रह में अंतर है। अगर कहीं श्राद्ध के नाम पर परिवार की आर्थिक क्षमता से बाहर खर्च करवाया जा रहा है, तो उस पर सवाल होना चाहिए। अगर कोई पुरोहित भय पैदा करके पैसा वसूलता है, तो उस पर सवाल होना चाहिए। अगर कर्मकांड का उद्देश्य ही खत्म होकर केवल दिखावा रह जाए, तो उस पर भी सवाल होना चाहिए। लेकिन इन समस्याओं के कारण पूर्वजों के प्रति श्रद्धा और कृतज्ञता की पूरी अवधारणा को ही खारिज कर देना अलग बात है।आज श्राद्ध को केवल पिंड, तर्पण और भोज तक सीमित करने के बजाय उसकी मूल भावना को भी समझने की जरूरत है। इस पितृपक्ष किसी बुजुर्ग की पुरानी तस्वीर निकालिए। अपने बच्चों को बताइए कि उनके दादा कौन थे। उनके परदादा क्या करते थे। परिवार किस संघर्ष से गुजरकर आज यहां पहुंचा। जिस खेत में आज फसल खड़ी है, उसे पहली बार किसने जोता था। जिस घर में आज बच्चे मोबाइल चला रहे हैं, उसकी नींव किसने रखी थी। संभव हो तो किसी जरूरतमंद को भोजन कराइए। किसी गरीब बच्चे की पढ़ाई में मदद कीजिए। किसी बुजुर्ग का सहारा बनिए। क्योंकि अगर हमारे पूर्वजों ने हमें जीवन दिया, तो उनके प्रति सबसे बड़ा सम्मान शायद यही है कि हम उस जीवन को बेहतर बनाने का प्रयास करें।
आज हम आधुनिक होने की दौड़ में कई बार अपनी जड़ों को ही पुराना समझने लगते हैं। लेकिन आधुनिकता का अर्थ यह नहीं कि जो कुछ पुराना है, वह गलत है। और परंपरा का अर्थ भी यह नहीं कि जो कुछ पुराना है, उस पर सवाल ही न किया जाए। सही रास्ता शायद बीच में है—पढ़िए, समझिए, सवाल कीजिए और फिर अपनी राय बनाइए। श्राद्ध करना है तो श्रद्धा से कीजिए। नहीं करना है तो अपने विचार किसी पर मत थोपिये। हजारों वर्षों की एक परंपरा को बिना समझे “अंधविश्वास” कहकर हंसी में उड़ा देना—क्या यह उस परंपरा से ज्यादा हमारी अपनी अज्ञानता का परिचय नहीं है? क्योंकि जिस समाज को अपने पूर्वज याद नहीं रहते, वह धीरे-धीरे अपनी जड़ों से कटने लगता है। और जिस समाज को अपनी जड़ों का ज्ञान नहीं होता, उसके लिए भविष्य की पहचान भी कमजोर पड़ सकती है। श्राद्ध केवल मृतकों को याद करने का दिन नहीं है। यह जीवितों को यह याद दिलाने का अवसर भी है कि हम अकेले नहीं बने—हमसे पहले भी कई पीढ़ियां थीं, और आने वाली पीढ़ियां हमें भी इसी स्मृति में देखेंगी।
यही शायद श्राद्ध का सबसे मानवीय अर्थ है…!
Discover more from D-News Watch
Subscribe to get the latest posts sent to your email.
