नई दिल्ली|डी-न्यूज डेस्क
राजधानी में एक इमारत का गिरना सिर्फ हादसा नहीं, उस पूरी व्यवस्था पर सवाल है जो खतरा सामने आने के बाद जागती है
सत्य निकेतन में इमारत गिरने से हुई मौतों ने दिल्ली को एक बार फिर झकझोर दिया है। ताजा जानकारी के मुताबिक इस हादसे में छह लोगों की जान जा चुकी है, जबकि राहत और बचाव अभियान के बाद भी इस त्रासदी से जुड़े सवाल खत्म नहीं हुए हैं। सबसे पहले उन परिवारों के प्रति संवेदना, जिन्होंने अपने किसी प्रियजन को इस हादसे में खो दिया। घायलों के शीघ्र स्वस्थ होने की कामना और उन सभी लोगों के प्रति सम्मान, जिन्होंने मलबे के बीच जिंदगी बचाने के लिए काम किया। लेकिन सवाल यह है कि क्या छह मौतों के बाद सिर्फ संवेदना और जांच से बात खत्म हो जाएगी? क्योंकि मलबा हट जाने के बाद भी इस हादसे के पीछे छिपे कई सवाल वहीं रहेंगे।
आखिर इमारत गिरी कैसे?
रिपोर्टों के अनुसार हादसे के समय इमारत के बेसमेंट में निर्माण या मरम्मत का काम चल रहा था। बेसमेंट में पानी जमा होने और वहां किए जा रहे काम को भी जांच के महत्वपूर्ण पहलुओं के रूप में देखा जा रहा है। तकनीकी रूप से किसी मौजूदा बहुमंजिला इमारत के नीचे या उसके आसपास खुदाई बेहद संवेदनशील काम होता है। इमारत का भार स्लैब और बीम से होकर कॉलम तक और फिर नींव के जरिए जमीन में जाता है। अगर नींव के आसपास की मिट्टी का सहारा कमजोर हो, खुदाई से जमीन की स्थिरता प्रभावित हो, पानी जमा हो या संरचना के किसी हिस्से में अनधिकृत बदलाव किया जाए, तो इमारत की स्थिरता पर असर पड़ सकता है। लेकिन यहां एक महत्वपूर्ण सावधानी जरूरी है—अभी यह कहना सही नहीं होगा कि बेसमेंट की खुदाई ही हादसे का निश्चित कारण थी। यह जांच का एक महत्वपूर्ण कोण है। अंतिम निष्कर्ष के लिए स्ट्रक्चरल ऑडिट, नींव और मिट्टी की स्थिति, मूल भवन नक्शा, वास्तविक निर्माण, किए गए बदलाव और मलबे की तकनीकी जांच जरूरी होगी।
लेकिन इससे बड़ा सवाल है—इमारत वहां तक पहुंची कैसे?
रिपोर्टों में सामने आया है कि इलाके में मूल भवन मानकों के तहत निर्माण की सीमा काफी कम थी और इस इमारत को G+1 की अनुमति होने की बात कही गई है, जबकि मौके पर इससे कहीं अधिक मंजिलों वाली संरचना थी। हादसे के बाद MCD ने चार मंजिल से ऊपर के अवैध निर्माणों को सील करने के निर्देश भी दिए हैं। तो सवाल सीधा है—
अगर निर्माण नियमों से बाहर था, तो इतने वर्षों तक वह दिखाई क्यों नहीं दिया?
किस अधिकारी ने निरीक्षण किया? किस अधिकारी की जिम्मेदारी उस क्षेत्र की निगरानी की थी? क्या कभी नोटिस दिया गया? अगर नोटिस दिया गया था तो कार्रवाई क्यों नहीं हुई? और अगर कार्रवाई नहीं हुई तो क्यों नहीं हुई? अगर कोई निर्माण अनुमति के विपरीत बढ़ता रहा, तो वह केवल मालिक की जिम्मेदारी कैसे हो सकती है? निगरानी व्यवस्था की जिम्मेदारी भी तय करनी होगी।
सिर्फ मालिक को दोषी ठहराकर क्या व्यवस्था बच जाएगी?
दिल्ली सरकार ने मजिस्ट्रियल जांच के आदेश दिए हैं और भवन मालिक के खिलाफ FIR की बात सामने आई है। यह जरूरी कदम है। लेकिन जांच की दिशा केवल यह पता लगाने तक सीमित नहीं होनी चाहिए कि “गलती किसने की?” जांच को यह भी पूछना चाहिए कि “गलती होने से पहले उसे रोकने की जिम्मेदारी किसकी थी?” मालिक दोषी है तो कार्रवाई होनी चाहिए। निर्माणकर्ता या ठेकेदार दोषी है तो उस पर कार्रवाई होनी चाहिए। स्ट्रक्चरल सुरक्षा से जुड़े किसी विशेषज्ञ ने लापरवाही की है तो उसकी भी जवाबदेही तय होनी चाहिए। और यदि MCD के किसी अधिकारी ने अवैध निर्माण देखा, फिर भी कार्रवाई नहीं की, तो उस अधिकारी की जिम्मेदारी भी तय होनी चाहिए।
लेकिन यदि निगरानी तंत्र में ही चूक हुई है तो केवल मकान मालिक को गिरफ्तार कर देने से व्यवस्था की जवाबदेही पूरी नहीं हो जाती।
दिल्ली सरकार से भी सवाल बनता है
यहां दिल्ली सरकार से सवाल पूछना भी जरूरी है। सरकार को यह बताना होगा कि राजधानी में भवन सुरक्षा की निगरानी का मौजूदा सिस्टम कितना प्रभावी है। क्या सरकार के पास ऐसे भवनों का कोई सक्रिय डेटाबेस है जिनमें—
मंजूर नक्शे से ज्यादा मंजिलें बनी हैं? बेसमेंट में अनधिकृत निर्माण हुआ है? PG या हॉस्टल के रूप में इस्तेमाल हो रहे पुराने भवन हैं? मूल संरचना में कॉलम, बीम या नींव से जुड़े बदलाव किए गए हैं? छोटे प्लॉटों पर अत्यधिक ऊंचे निर्माण खड़े हो चुके हैं? अगर ऐसा कोई व्यवस्थित रिकॉर्ड नहीं है, तो सवाल है कि सरकार और स्थानीय निकाय खतरे की पहचान कैसे करते हैं? और अगर रिकॉर्ड है, तो फिर सत्य निकेतन जैसी इमारतें कार्रवाई की सूची से बाहर कैसे रह जाती हैं?
हादसे के बाद जागना कब बंद होगा?
यह शायद इस पूरी घटना का सबसे बड़ा सवाल है। दिल्ली में किसी इमारत के गिरने के बाद निरीक्षण शुरू होता है। नोटिस जारी होते हैं। अवैध निर्माण सील करने की बात होती है। जांच समिति बनती है। राजनीतिक बयान आते हैं। फिर कुछ दिन गुजरते हैं और मामला धीरे-धीरे खबरों से बाहर हो जाता है। सत्य निकेतन के बाद भी यही हुआ तो इस हादसे से हमने कुछ नहीं सीखा। दिल्ली में अब हादसे के बाद सर्वे नहीं, हादसे से पहले सुरक्षा ऑडिट की जरूरत है। MCD ने अब चार मंजिल से ऊपर के अवैध निर्माणों पर कार्रवाई के निर्देश दिए हैं और दिल्ली में अवैध इमारतों का सर्वे शुरू किए जाने की खबर भी सामने आई है। सवाल यह है कि यह अभियान कितने दिन चलेगा और क्या यह सिर्फ इस हादसे की प्रतिक्रिया बनकर रह जाएगा?
और अगर राजधानी का यह हाल है तो देश का क्या हाल होगा?
यह सवाल दिल्ली से बाहर भी जाता है। अगर देश की राजधानी में, जहां केंद्र और राज्य सरकारों के बड़े-बड़े प्रशासनिक तंत्र मौजूद हैं, एक इमारत नियमों से आगे बढ़ती रहती है, PG के रूप में इस्तेमाल होती है और फिर हादसा हो जाता है—तो देश के दूसरे शहरों में क्या स्थिति होगी? कितने शहरों में पुराने मकानों को PG और हॉस्टल में बदल दिया गया है? कितने भवनों में बिना विशेषज्ञ जांच के बेसमेंट खोदे जा रहे हैं? कितने मकान मंजूर नक्शे से ज्यादा मंजिलों तक पहुंच चुके हैं? कितने भवनों में रहने वाले लोगों को खुद पता नहीं कि जिस इमारत में वे रह रहे हैं, वह संरचनात्मक रूप से सुरक्षित भी है या नहीं?
इन सवालों का जवाब किसी अगली त्रासदी के बाद क्यों खोजा जाए?
राजनीति बाद में, जवाबदेही पूरी होनी चाहिए
इस समय सबसे जरूरी है कि राहत और बचाव अभियान तथा प्रभावित परिवारों की मदद पूरी प्राथमिकता से हो। राजनीतिक दलों को भी इस वक्त आरोप-प्रत्यारोप से ज्यादा पीड़ित परिवारों और राहत कार्यों के साथ खड़ा होना चाहिए। लेकिन इसके बाद जांच ऐसी होनी चाहिए जिसमें जवाबदेही की पूरी श्रृंखला सामने आए। मकान मालिक से लेकर ठेकेदार तक। निर्माण कराने वाले से लेकर तकनीकी विशेषज्ञ तक। स्थानीय निरीक्षण अधिकारी से लेकर enforcement व्यवस्था तक। और जहां प्रशासनिक या नीतिगत स्तर पर चूक सामने आए, वहां संबंधित सरकार और विभाग भी सवालों से बाहर नहीं हो सकते। क्योंकि जवाबदेही का मतलब सिर्फ किसी एक व्यक्ति को पकड़ लेना नहीं है। जवाबदेही का मतलब उस पूरी कड़ी को पहचानना है जिसके कारण खतरा पैदा हुआ, खतरा दिखाई दिया या दिखाई देने के बावजूद उसे रोका नहीं गया।
सवाल जो जवाब मांगते हैँ
सत्य निकेतन में छह लोगों की मौत के बाद अगर फिर सिर्फ सर्वे, सीलिंग, जांच और कुछ गिरफ्तारियों तक मामला सीमित रह गया, तो क्या अगली इमारत का इंतजार ही होगा? दिल्ली सरकार क्या पूरे राजधानी क्षेत्र में एक समयबद्ध, पारदर्शी और सार्वजनिक भवन-सुरक्षा ऑडिट कराएगी? क्या PG, हॉस्टल, पुराने बहुमंजिला भवन, अवैध अतिरिक्त मंजिलों, बेसमेंट निर्माण और बड़े संरचनात्मक बदलावों की पहचान कर उनके खिलाफ हादसा होने से पहले कार्रवाई होगी? और क्या देश की बाकी राज्य सरकारें भी दिल्ली की इस त्रासदी से सबक लेकर अपने शहरों में ऐसा अभियान शुरू करेंगी? क्योंकि सवाल सिर्फ यह नहीं है कि सत्य निकेतन की इमारत क्यों गिरी। सबसे बड़ा सवाल तो यह है कि —क्या अगले हादसे से पहले हमारी व्यवस्था जागेगी? या फिर हर बार की तरह सरकारें और प्रशासन हादसे के बाद ही जागेंगे?…
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