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दिग्विन्द्र राणा, संपादक।

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देश का भविष्य युवाओं के सपनों पर टिका होता है। जब वही युवा प्रतियोगी परीक्षाओं की पारदर्शिता पर सवाल उठाते हुए सडक़ों पर उतरने को मजबूर हों, तो यह केवल एक विरोध प्रदर्शन नहीं, बल्कि व्यवस्था के प्रति बढ़ते अविश्वास का संकेत भी होता है। हाल के दिनों में नीट परीक्षा को लेकर उठे विवाद और उसके विरोध में हुए प्रदर्शनों ने शिक्षा व्यवस्था, प्रशासन और लोकतांत्रिक संवाद—तीनों को कठघरे में खड़ा कर दिया है। यह निर्विवाद है कि किसी भी लोकतांत्रिक देश में नागरिकों को शांतिपूर्ण ढंग से अपनी बात रखने का संवैधानिक अधिकार प्राप्त है। यदि लाखों छात्र वर्षों की मेहनत के बाद भी परीक्षा प्रक्रिया पर भरोसा खोने लगें, तो सरकार का पहला दायित्व उनकी चिंताओं को गंभीरता से सुनना और पारदर्शी जांच के साथ आवश्यक सुधार करना होना चाहिए। शिक्षा व्यवस्था में विश्वास बनाए रखना किसी भी सरकार की प्राथमिक जिम्मेदारी है। लेकिन इस पूरे घटनाक्रम का एक दूसरा पक्ष भी उतना ही महत्वपूर्ण है। विरोध प्रदर्शन की आड़ में यदि कानून हाथ में लिया जाए, सुरक्षा घेरा तोडऩे का प्रयास हो, प्रधानमंत्री आवास जैसी अति-सुरक्षित जगह की सुरक्षा को खतरे में डाला जाए या ड्यूटी पर तैनात सुरक्षा बलों के साथ मारपीट की जाए, तो इसे किसी भी परिस्थिति में उचित नहीं ठहराया जा सकता। लोकतंत्र विरोध का अधिकार देता है, लेकिन हिंसा, अराजकता और सुरक्षा व्यवस्था को चुनौती देने का अधिकार नहीं देता। सुरक्षा बल अपना संवैधानिक दायित्व निभाते हैं और उन पर हमला लोकतांत्रिक मर्यादाओं का उल्लंघन है, जिसकी स्पष्ट शब्दों में निंदा होनी चाहिए। दूसरी ओर, प्रशासन और पुलिस की भूमिका भी केवल बल प्रयोग तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। यदि हालात बिगड़ते हैं तो कानून-व्यवस्था बनाए रखना आवश्यक है, लेकिन हर आंदोलन का पहला समाधान संवाद होना चाहिए, न कि केवल लाठी और आंसू गैस। बल प्रयोग अंतिम विकल्प हो सकता है, पहला नहीं। लोकतंत्र की असली ताकत संवाद, धैर्य और संवेदनशीलता में निहित होती है। आज आवश्यकता इस बात की है कि सरकार परीक्षा प्रणाली को पूरी तरह पारदर्शी और जवाबदेह बनाए, ताकि पेपर लीक, धांधली और अनियमितताओं पर हमेशा के लिए विराम लगाया जा सके। साथ ही, प्रदर्शन करने वाले संगठनों और युवाओं को भी यह समझना होगा कि उनकी नैतिक शक्ति शांतिपूर्ण और अनुशासित आंदोलन में ही निहित है। हिंसा किसी भी न्यायपूर्ण मांग की नैतिक बढ़त को कमजोर कर देती है। लोकतंत्र तभी मजबूत होगा जब सरकार जनता की आवाज सुने, प्रशासन संयम रखे और नागरिक भी कानून एवं संवैधानिक मर्यादाओं का पालन करें। युवाओं के सपनों की रक्षा भी जरूरी है और देश की सर्वोच्च सुरक्षा व्यवस्था की गरिमा भी। इन दोनों के बीच संतुलन ही एक परिपक्व लोकतंत्र की पहचान है।


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