यूपी, पंजाब समेत पांच राज्यों के चुनाव से पहले SIR पर सियासी घमासान; मुद्दा बड़ा लेकिन सवाल यह कि क्या 14 आपत्तियों को पूरे चुनाव आयोग के संकट में बदल दिया गया?
नई दिल्ली। चुनावी मौसम आने से पहले राजनीति में कुछ मुद्दे अचानक बहुत बड़े हो जाते हैं। कुछ इसलिए कि उनमें सचमुच बड़ा खतरा छिपा होता है और कुछ इसलिए कि राजनीतिक दलों को उनमें अपने अगले चुनाव की जमीन दिखाई देने लगती है। मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को लेकर चल रहा मौजूदा विवाद इसी दूसरी श्रेणी की तरफ बढ़ता हुआ दिखाई दे रहा है। मामला शुरू हुआ SIR यानी मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण से। फिर मतदाता सूचियों से बड़ी संख्या में नाम बाहर होने की बात सामने आई। विपक्ष ने इसे मुद्दा बनाया। अब चुनाव आयोग के ही दो चुनाव आयुक्तों—सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी—की ओर से अलग-अलग मामलों में दर्ज की गई 14 लिखित आपत्तियों ने इस राजनीतिक बहस को और हवा दे दी। और देखते ही देखते सवाल यह नहीं रह गया कि SIR में क्या हो रहा है? बल्कि सवाल बदलकर यह हो गया—क्या मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के नेतृत्व में चुनाव आयोग ही सवालों के घेरे में आ गया है?
पांच राज्यों के चुनाव से पहले क्यों बढ़ा मुद्दा?
अगले साल उत्तर प्रदेश, पंजाब, उत्तराखंड, गोवा और मणिपुर में विधानसभा चुनाव होने हैं। ऐसे समय में मतदाता सूची से जुड़ा कोई भी विवाद सामान्य प्रशासनिक मामला नहीं रह जाता। जिस दल को लगता है कि मतदाता सूची में बदलाव उसके राजनीतिक समीकरण को प्रभावित कर सकता है, वह इसे चुनावी मुद्दा बनाएगा। और विपक्ष को यहां एक ऐसा मुद्दा दिखाई दे रहा है जिसमें वह एक साथ कई सवाल जोड़ सकता है— मतदाता सूची, वोट का अधिकार, चुनाव आयोग की निष्पक्षता और आने वाले चुनाव। यानी एक मुद्दा और कई राजनीतिक निशाने। इसीलिए ज्ञानेश कुमार का मामला विपक्ष के लिए अचानक इतना महत्वपूर्ण हो गया है।
14 आपत्तियां आईं तो क्या सचमुच आयोग में बगावत हो गई?
रिपोर्ट के अनुसार पिछले करीब 10 महीनों में चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने अलग-अलग मामलों में कम से कम 14 बार लिखित आपत्तियां दर्ज कीं। सवाल मतदाता जोड़ने, नाम हटाने और बहाल करने, Form-6 में बदलाव तथा चुनावी डेटा और तकनीकी व्यवस्था से जुड़े थे। यह तथ्य अपने आप में महत्वपूर्ण है। लेकिन इसके बाद जो राजनीतिक तस्वीर बनाई जा रही है, वह उससे कहीं बड़ी है। विपक्ष का आरोप है कि दो चुनाव आयुक्तों की बार-बार आपत्तियां बताती हैं कि आयोग के अंदर गंभीर मतभेद हैं। लेकिन चुनाव आयोग कहता है कि आंतरिक बैठकों में सवाल उठना, नोट लिखना या किसी प्रस्ताव पर अलग राय रखना संस्थागत प्रक्रिया का हिस्सा है। जबकि आयोग का कहना है कि अंतिम फैसले सर्वसम्मति से हुए। यानी यहां दो अलग बातें हैं। आपत्तियां हुईं—यह एक बात है। क्या उन आपत्तियों ने चुनाव आयोग को दो हिस्सों में बांट दिया—यह दूसरी बात है। और उपलब्ध जानकारी में दूसरी बात उतनी साफ नहीं है, जितनी राजनीतिक बयानबाजी में दिखाई जा रही है।
फिर विपक्ष इतना तमतमाया क्यों है?
विपक्ष के पास इस समय एक ऐसा मुद्दा है जिसे जनता को समझाना आसान है। किसी को यह समझाना मुश्किल है कि चुनाव आयोग की तकनीकी प्रक्रिया में किस फाइल पर क्या नोट लगा। लेकिन यह समझाना बहुत आसान है कि “अगर आपका नाम वोटर लिस्ट से निकल गया तो आप वोट कैसे डालेंगे?” यहीं SIR विपक्ष के लिए राजनीतिक रूप से उपयोगी हो जाता है। विपक्ष इसे सिर्फ मतदाता सूची की सफाई नहीं मान रहा। वह इसे आने वाले चुनावों के संदर्भ में देख रहा है और आरोप लगा रहा है कि बड़ी संख्या में मतदाताओं के नाम प्रभावित हो सकते हैं। इसी बीच 14 आपत्तियों की खबर आ गई। अब विपक्ष के पास कहने के लिए एक और लाइन आ गई— “हम ही सवाल नहीं उठा रहे, आयोग के अंदर भी सवाल उठे हैं।” राजनीति में इससे बड़ा हथियार और क्या चाहिए?
लेकिन 13 करोड़ नाम का मतलब क्या सचमुच तेरह करोड़ वोट खत्म?
यहीं सबसे ज्यादा भ्रम है। SIR के दौरान बड़ी संख्या में नाम ड्राफ्ट मतदाता सूचियों से बाहर किए गए हैं। विपक्ष इसे बड़े खतरे के रूप में पेश कर रहा है। लेकिन ड्राफ्ट सूची से नाम बाहर होना और स्थायी रूप से वोट का अधिकार खत्म हो जाना एक ही बात नहीं है। दावे और आपत्तियों की प्रक्रिया होती है। पात्र व्यक्ति अपना नाम वापस जुड़वाने की कोशिश कर सकता है। इसलिए “13 करोड़ वोट खत्म हो गए” और “13 करोड़ नाम ड्राफ्ट सूची से बाहर हुए” के बीच का फर्क समझना जरूरी है। यहीं से इस पूरे विवाद में राजनीति और तथ्य एक-दूसरे में घुलने लगते हैं।
फिर संधू और विवेक जोशी की आपत्तियां कितनी गंभीर हैं?
इन दोनों चुनाव आयुक्तों की आपत्तियों को पूरी तरह नजरअंदाज भी नहीं किया जा सकता। क्योंकि सवाल छोटे-मोटे प्रशासनिक फैसलों तक सीमित नहीं बताए गए हैं। Form-6 में बदलाव, मतदाता डेटा के प्रबंधन, नाम जोड़ने-हटाने और कुछ मामलों में लिए गए प्रशासनिक फैसलों को लेकर सवाल उठे। यानी सवाल वास्तविक हैं। लेकिन सवाल उठना और आरोप साबित होना दो अलग बातें हैं। यही वह जगह है जहां राजनीतिक बहस अक्सर तेजी से आगे निकल जाती है। एक तरफ विपक्ष इन आपत्तियों को “आयोग के अंदर की गंभीर दरार” के रूप में देखता है। दूसरी तरफ आयोग कहता है कि यही तो किसी संस्थान में जांच-पड़ताल और विचार-विमर्श की प्रक्रिया है। सच शायद इसी अंतर को समझने में छिपा है।
सरकार के लिए परेशानी कहां है?
सरकार के सामने भी आसान स्थिति नहीं है। चुनाव आयोग संवैधानिक संस्था है। सरकार जितना ज्यादा उसका बचाव करती दिखाई देगी, विपक्ष उतना ही यह सवाल उठा सकता है कि सरकार चुनाव आयोग का बचाव क्यों कर रही है? भाजपा का तर्क है कि चुनाव आयोग स्वतंत्र संस्था है और उसके भीतर अलग-अलग राय होना लोकतांत्रिक प्रक्रिया का हिस्सा है। पार्टी ने विपक्ष को संसद में ज्ञानेश कुमार के खिलाफ प्रस्ताव लाने की चुनौती भी दी है। “चुनाव आयोग के अंदर ही दो लोग सवाल उठा रहे हैं।” यह लाइन राजनीतिक रूप से बहुत असरदार है, चाहे उन सवालों का अंतिम निष्कर्ष कुछ भी निकले।
राजनीतिक रूप से देखें तो सरकार और भाजपा को इस मुद्दे पर सफाई देनी पड़ रही है। लेकिन इसे सीधे “सरकार बैकफुट पर है” कहना भी उपलब्ध तथ्यों से ज्यादा बड़ा निष्कर्ष होगा। असल बात यह है कि विपक्ष ने सरकार को ऐसी स्थिति में जरूर ला दिया है जहां उसे चुनाव आयोग की प्रक्रिया समझानी पड़ रही है। और चुनाव से पहले यह अपने आप में विपक्ष के लिए राजनीतिक लाभ की स्थिति बन सकती है। क्योंकि विपक्ष को हमेशा जीतने के लिए सरकार को किसी बड़े घोटाले में फंसाना जरूरी नहीं होता। कभी-कभी उसे सिर्फ इतना करना होता है कि जनता के मन में अविश्वास पैदा कर दे।
लेकिन क्या 14 आपत्तियों का मतलब यह है कि पूरा चुनाव आयोग एक व्यक्ति चला रहा है? दरअसल यह राजनीतिक आरोप है। क्या SIR में नाम ड्राफ्ट सूची से बाहर हुए? जवाब है हां। क्या इसका मतलब यह है कि उतने ही वास्तविक मतदाताओं का वोट स्थायी रूप से खत्म हो गया? यह सवाल भ्रामक है। क्या इससे यह साबित हो गया कि मुख्य चुनाव आयुक्त ने गैरकानूनी तरीके से सारे फैसले अकेले किए? किसी रिपोर्ट में तस्वीर इतनी सीधी नहीं है। और शायद यही इस पूरे विवाद की सबसे दिलचस्प बात है। तथ्य एक तरफ हैं और उन तथ्यों पर बनाई जा रही राजनीतिक कहानी दूसरी तरफ।
विपक्ष को चुनाव से पहले इससे क्या मिलेगा?
विपक्ष के लिए यह मुद्दा सिर्फ ज्ञानेश कुमार तक सीमित नहीं है। यह उसे आने वाले चुनावों के लिए एक बड़ा नैरेटिव देता है—अगर मतदाता सूची में बदलाव पर सवाल है, तो चुनाव प्रक्रिया पर सवाल है। अगर चुनाव प्रक्रिया पर सवाल है, तो चुनाव आयोग पर सवाल है। और अगर चुनाव आयोग पर सवाल है, तो चुनाव की विश्वसनीयता पर सवाल है। यह राजनीतिक श्रृंखला विपक्ष के लिए बहुत उपयोगी है।खासकर तब, जब अगले साल पांच राज्यों में चुनाव होने हैं। यानी विपक्ष के पास इस विवाद से राजनीतिक माहौल बनाने का पूरा मौका है। लेकिन राजनीतिक फायदा और आरोप की सच्चाई एक ही चीज नहीं होते।यही फर्क इस पूरी कहानी में सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण है।
CEC ज्ञानेश कुमार विवाद में राजनीति निश्चित रूप से बहुत बड़ी है। आने वाले चुनावों से पहले विपक्ष को ऐसा मुद्दा मिल गया है जिसे वह मतदाता और वोट के अधिकार से जोड़ सकता है। सरकार और भाजपा के लिए चुनौती यह है कि वह चुनाव आयोग की प्रक्रिया पर उठे सवालों का भरोसेमंद जवाब जनता तक पहुंचाए। यानी इस पूरे मामले में सवाल असली हैं, राजनीति भी असली है—लेकिन राजनीतिक शोर शायद मामले से बड़ा हो चुका है। और आने वाले पांच राज्यों के चुनावों के बीच यही शोर कितना बड़ा चुनावी मुद्दा बनता है, इस पिक्चर का कलाइमैक्स वहां से शुरू होगा।
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