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जालंधर/चंडीगढ़, 3 अक्टूबर। भारतीय हॉकी टीम की कप्तानी से लेकर पंजाब कांग्रेस की कप्तानी तक पहुंचे परगट सिंह का राजनीतिक सफर किसी पारंपरिक कांग्रेसी नेता की कहानी नहीं है। अंतरराष्ट्रीय हॉकी के मैदान पर भारत की अगुवाई करने वाले परगट सिंह ने राजनीति में कदम शिरोमणि अकाली दल के साथ रखा, कांग्रेस में पहुंचे और अब उसी कांग्रेस की पंजाब इकाई के अध्यक्ष बन गए हैं। 2 अक्टूबर 2026 को कांग्रेस हाईकमान ने उन्हें अमरिंदर सिंह राजा वड़िंग की जगह पंजाब प्रदेश कांग्रेस कमेटी का नया अध्यक्ष नियुक्त किया। 2027 के विधानसभा चुनाव से कुछ महीने पहले हुई यह नियुक्ति इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि परगट सिंह अब सिर्फ एक विधायक या पूर्व मंत्री नहीं, बल्कि पंजाब में कांग्रेस के पूरे संगठन और चुनावी अभियान को दिशा देने की जिम्मेदारी संभालेंगे।

हॉकी के मैदान से शुरू हुई पहचान

परगट सिंह का जन्म जालंधर के मिट्ठापुर में हुआ और उन्होंने भारतीय हॉकी में डिफेंडर के रूप में अपनी अलग पहचान बनाई। वह 1992 बार्सिलोना और 1996 अटलांटा ओलंपिक में भारत का प्रतिनिधित्व कर चुके हैं और भारतीय हॉकी टीम की कप्तानी भी की। हॉकी में उनके योगदान के लिए उन्हें 1989 में अर्जुन पुरस्कार और 1998 में पद्मश्री से सम्मानित किया गया। खेल से संन्यास के बाद उन्होंने पंजाब पुलिस में भी सेवाएं दीं और खेल प्रशासन से जुड़े रहने के बाद चुनावी राजनीति में प्रवेश किया। यानी राजनीति में आने से पहले ही परगट सिंह के पास खिलाड़ी, कप्तान और प्रशासनिक अनुभव—तीनों की पृष्ठभूमि मौजूद थी।

2012: अकाली दल के टिकट पर पहली चुनावी पारी

परगट सिंह की चुनावी राजनीति की शुरुआत 2012 के पंजाब विधानसभा चुनाव से हुई, जब उन्होंने शिरोमणि अकाली दल के टिकट पर जालंधर कैंट से चुनाव लड़ा। उन्होंने कांग्रेस उम्मीदवार को छह हजार से अधिक मतों के अंतर से हराकर विधानसभा में प्रवेश किया। लेकिन अकाली दल के साथ उनकी राजनीतिक पारी लंबी नहीं चली। 2016 में उन्हें पार्टी से निलंबित किया गया और इसके बाद वह नवजोत सिंह सिद्धू के साथ ‘आवाज-ए-पंजाब’ मोर्चे से जुड़े। यह वह दौर था जब पंजाब की राजनीति में कांग्रेस, अकाली दल और आम आदमी पार्टी के बीच नई राजनीतिक जगह बनाने की कोशिशें तेज हो रही थीं।

2017: कांग्रेस में शामिल बनाई स्वतंत्र पहचान

2017 के विधानसभा चुनाव से पहले परगट सिंह ने नवजोत सिंह सिद्धू के साथ कांग्रेस का रुख किया। इसके बाद जालंधर कैंट से कांग्रेस के उम्मीदवार के रूप में चुनाव लड़ते हुए उन्होंने अकाली दल के सरबजीत सिंह मक्कड़ को 29 हजार से अधिक मतों के अंतर से हराया। जिस नेता ने 2012 में अकाली दल के उम्मीदवार के रूप में विधानसभा में प्रवेश किया था, वही पांच साल के भीतर कांग्रेस के टिकट पर उसी विधानसभा सीट से कहीं बड़े अंतर से जीत दर्ज कर चुका था। यह बदलाव केवल पार्टी बदलने की घटना नहीं थी; इसने परगट सिंह को पंजाब की राजनीति में अपनी स्वतंत्र पहचान रखने वाले नेता के रूप में स्थापित किया।

कांग्रेस में भी सवाल उठाने वाली राजनीति

परगट सिंह के अब तक के राजनीतिक सफर की एक खास बात यह रही कि पार्टी बदलने के बाद भी उनकी राजनीति का एक हिस्सा सत्ता और नेतृत्व से सवाल करने के इर्द-गिर्द रहा। अकाली दल में रहते हुए उन्होंने बादल नेतृत्व के साथ मतभेदों का सामना किया और कांग्रेस में आने के बाद कैप्टन अमरिंदर सिंह सरकार के कामकाज पर भी सवाल उठाए। बाद में आम आदमी पार्टी सरकार के खिलाफ भी वह कानून-व्यवस्था, शिक्षा, खेल और पंजाब से जुड़े विभिन्न मुद्दों को लेकर मुखर रहे। यही कारण है कि परगट सिंह की पहचान केवल किसी एक गुट या एक नेता के करीबी के रूप में नहीं, बल्कि अपनी बात रखने वाले नेता के रूप में बनी।

2021: संगठन से सरकार तक पहुंची जिम्मेदारी

2021 में नवजोत सिंह सिद्धू के पंजाब कांग्रेस अध्यक्ष बनने के बाद परगट सिंह को प्रदेश कांग्रेस कमेटी में महासचिव, संगठन की जिम्मेदारी दी गई। उसी साल सितंबर में चरणजीत सिंह चन्नी के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार में उन्हें मंत्री बनाया गया और उनके पास स्कूल शिक्षा, उच्च शिक्षा, खेल एवं युवा मामले तथा एनआरआई मामलों जैसे विभाग रहे। यह उनके राजनीतिक सफर का वह पड़ाव था जब संगठन और सरकार—दोनों स्तरों पर उन्हें बड़ी जिम्मेदारी मिली। हालांकि चन्नी सरकार का कार्यकाल छोटा रहा और मार्च 2022 में कांग्रेस सत्ता से बाहर हो गई।

2022: जब कांग्रेस सिमटी, परगट अपनी सीट बचा ले गए

2022 का विधानसभा चुनाव कांग्रेस के लिए बेहद मुश्किल रहा। राज्य की 117 सदस्यीय विधानसभा में पार्टी सिर्फ 18 सीटों पर सिमट गई, लेकिन जालंधर कैंट में परगट सिंह ने अपनी सीट बचाए रखी और लगातार तीसरी बार विधायक बने। उन्होंने आम आदमी पार्टी के उम्मीदवार को हराया। कांग्रेस के कमजोर प्रदर्शन के बीच अपनी पारंपरिक सीट बचाए रखना परगट सिंह की व्यक्तिगत चुनावी पकड़ का महत्वपूर्ण अध्याय बन गया। इसके बाद भी उन्होंने विपक्ष में रहते हुए पंजाब की AAP सरकार को विभिन्न मुद्दों पर घेरा।

2026: विधायक से प्रदेश अध्यक्ष तक

2026 में कांग्रेस के भीतर पंजाब संगठन को लेकर नए सिरे से मंथन शुरू हुआ। अमरिंदर सिंह राजा वड़िंग ने 2 अक्टूबर को प्रदेश अध्यक्ष पद से इस्तीफा दिया और उसी दिन कांग्रेस ने परगट सिंह को नया प्रदेश अध्यक्ष नियुक्त कर दिया। कांग्रेस के पंजाब प्रभारी सचिन पायलट ने राज्य के नेताओं से बातचीत के बाद हाईकमान को अपनी रिपोर्ट दी थी। नियुक्ति के समय विजय इंदर सिंगला का नाम भी प्रदेश अध्यक्ष पद के लिए चर्चा में था, लेकिन अंततः हाईकमान ने परगट सिंह को चुना। परगट सिंह की नियुक्ति को केवल एक नए प्रदेश अध्यक्ष की नियुक्ति मानना कहानी का पहला हिस्सा है तो दूसरा हिस्सा इससे बड़ा है। कांग्रेस ने ऐसे समय पर जट सिख नेता को प्रदेश संगठन की कमान दी है, जब 2027 का चुनाव सामने है और पार्टी के भीतर मुख्यमंत्री पद को लेकर कई वरिष्ठ चेहरे चर्चा में हैं। नेता प्रतिपक्ष प्रताप सिंह बाजवा, जालंधर के सांसद और पूर्व मुख्यमंत्री चरणजीत सिंह चन्नी तथा गुरदासपुर के सांसद एवं पूर्व उपमुख्यमंत्री सुखजिंदर सिंह रंधावा जैसे नाम पहले से कांग्रेस की राज्य राजनीति में महत्वपूर्ण हैं। वहीं परगट सिंह को प्रदेश अध्यक्ष बनाए जाने से संगठन की कमान और मुख्यमंत्री पद की संभावित दावेदारी तत्काल एक ही व्यक्ति के हाथ में नहीं जाती।

2027 चुनाव में सत्ता पाने की बड़ी चुनौती

यहीं से पंजाब की 2027 वाली बड़ी राजनीतिक तस्वीर सामने आती है। BJP ने मई 2026 में केवल सिंह ढिल्लों को प्रदेश अध्यक्ष बनाया था, जबकि AAP ने अपने संगठन की कमान अमन अरोड़ा को दी है और भगवंत मान को 2027 के लिए मुख्यमंत्री पद का चेहरा घोषित किया जा चुका है। इसके मुकाबले कांग्रेस ने अभी प्रदेश अध्यक्ष के तौर पर परगट सिंह को आगे किया है, लेकिन मुख्यमंत्री पद के लिए किसी एक चेहरे को घोषित नहीं किया है। इस तरह तीनों दलों के संगठन और नेतृत्व की संरचना एक जैसी नहीं है—और कांग्रेस का अगला कदम यह तय करेगा कि परगट सिंह केवल संगठन के कप्तान रहेंगे या 2027 की सत्ता की लड़ाई में उनकी भूमिका इससे आगे भी जाती है।

परगट सिंह के सामने सबसे बड़ी परीक्षा

परगट सिंह के लिए अब सबसे बड़ी चुनौती कोई एक चुनावी सीट नहीं, बल्कि पूरी पंजाब कांग्रेस को एक साथ लेकर चलने की है। उन्हें ऐसे संगठन की कमान मिली है जिसमें मुख्यमंत्री पद के कई संभावित चेहरे हैं, अलग-अलग नेताओं के अपने राजनीतिक आधार हैं और 2027 में कांग्रेस को आम आदमी पार्टी की सरकार के खिलाफ अपना स्पष्ट नैरेटिव तैयार करना है। हॉकी में कप्तान का काम केवल खुद अच्छा खेलना नहीं होता, पूरी टीम को एक रणनीति पर खेलाना होता है; राजनीति में परगट सिंह के सामने भी अब लगभग यही परीक्षा है।

बहरहाल, मुकाबला कड़ा है और इम्तिहान मुश्किल। ऐसे में अब देखना होगा कि परगट सिंह का हौसला उन्हें राजनीति के मैदान में भी विजेता कप्तान के रूप में उभार पाएगा या संघर्ष अभी लंबा है


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