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मुस्लिम पर्सनल लॉ से लेकर हिंदू कोड तक की कहानी, अब भाजपा क्यों इसे जरूरी मान रही है और UCC लागू होने पर आम आदमी की जिंदगी में क्या बदलेगा?

नई दिल्ली। समान नागरिक संहिता यानी UCC आज भाजपा और विपक्ष के बीच राजनीतिक बहस का मुद्दा है, लेकिन इसकी असली कहानी चुनावी मंच से कहीं पुरानी है। यह सवाल संविधान बनने के समय ही देश के सामने था—क्या शादी, तलाक, विरासत और गोद लेने जैसे नागरिक मामलों में धर्म के आधार पर अलग-अलग कानून चलते रहेंगे या एक दिन पूरे देश के लिए समान नागरिक कानून बनाया जाएगा? संविधान निर्माताओं ने इस सवाल को टाला नहीं था। उन्होंने इसका जवाब संविधान के अनुच्छेद 44 में दिया था, जिसमें राज्य को पूरे भारत में नागरिकों के लिए समान नागरिक संहिता सुनिश्चित करने का प्रयास करने को कहा गया। फर्क सिर्फ इतना था कि इसे मौलिक अधिकार नहीं बनाया गया, बल्कि नीति-निर्देशक तत्वों में रखा गया। यानी संविधान ने रास्ता बंद नहीं किया, बल्कि भविष्य की सरकारों के लिए एक दिशा तय कर दी।

1948 में ही बहस हो गई थी, लेकिन फैसला आधा क्यों रहा?

संविधान सभा में UCC पर बहस के दौरान सबसे बड़ी चिंता यही थी कि भारत एक बेहद विविध समाज है और धर्म से जुड़े व्यक्तिगत कानूनों को अचानक बदलना सामाजिक तनाव पैदा कर सकता है। मुस्लिम सदस्यों के एक वर्ग ने व्यक्तिगत कानूनों की सुरक्षा की मांग की और यह चिंता जताई कि राज्य धार्मिक मामलों में कितना हस्तक्षेप कर सकता है। दूसरी तरफ डॉ. बी.आर. आंबेडकर सहित कई सदस्य इस बात के पक्ष में थे कि सामाजिक सुधार के रास्ते को हमेशा के लिए बंद नहीं किया जा सकता। आंबेडकर ने 23 नवंबर 1948 की बहस में यहां तक कहा कि भारत में अपराध, संपत्ति और दूसरे अनेक नागरिक मामलों में पहले से समान कानून मौजूद हैं और असली बड़ा क्षेत्र विवाह तथा उत्तराधिकार का बचा हुआ है। अंततः समझौते का रास्ता निकला—UCC को संविधान में जगह मिली, लेकिन तत्काल लागू करने के बजाय उसे राज्य के लिए एक संवैधानिक लक्ष्य बना दिया गया।

देश बंटा, समाज को जोड़ा गया और कुछ सवाल भविष्य के लिए छोड़ दिए गए

1947 के विभाजन के बाद देश का सबसे बड़ा लक्ष्य केवल नया कानून बनाना नहीं था, बल्कि एक ऐसे समाज को साथ लेकर चलना था जो विभाजन की भयानक हिंसा से निकला था। इसलिए संविधान निर्माताओं के सामने दो चीजें एक साथ थीं—एक तरफ नागरिकों की समानता और दूसरी तरफ धार्मिक स्वतंत्रता तथा सामाजिक विश्वास। यही वह माहौल था जिसमें UCC को तत्काल लागू करने के बजाय भविष्य की जिम्मेदारी बनाया गया। यानी संविधान ने UCC को छोड़ा नहीं, बल्कि यह माना कि समाज और राजनीति को इसके लिए तैयार होने में समय लगेगा।अब सवाल यह है कि 75 साल बाद भी वह “उचित समय” आया है या नहीं?

हिंदू कानूनों में बदलाव हुआ, लेकिन पर्सनल लॉ की बहस वहीं बनी रही

आजादी के बाद सरकार ने हिंदू समाज के व्यक्तिगत कानूनों में बड़े बदलाव किए। 1950 के दशक में हिंदू विवाह, उत्तराधिकार, दत्तक और भरण-पोषण आदि से जुड़े कानूनों ने पुरानी कई सामाजिक और कानूनी व्यवस्थाओं को बदला। यही वह दौर था जब विवाह, तलाक, संपत्ति और महिलाओं के अधिकारों से जुड़े हिंदू कानूनों को आधुनिक संवैधानिक व्यवस्था के अनुरूप ढाला गया। लेकिन इसी के साथ हिंदू समाज में यह भावना भी बनी कि जब एक समुदाय के व्यक्तिगत कानूनों में राज्य सुधार कर सकता है तो दूसरे समुदायों के व्यक्तिगत कानूनों पर वही कसौटी क्यों नहीं लगाई गई? 

डॉ. आंबेडकर के लिए UCC सिर्फ धार्मिक सवाल नहीं, सामाजिक सुधार का सवाल था

UCC की बहस में डॉ. आंबेडकर को केवल संविधान निर्माता के रूप में नहीं, बल्कि सामाजिक सुधारक के रूप में भी देखना जरूरी है। उनका मूल विचार यह था कि धर्म के नाम पर समाज के हर हिस्से को हमेशा कानून से बाहर नहीं रखा जा सकता। संविधान सभा में उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि व्यक्तिगत कानूनों को हमेशा के लिए सुरक्षित कर देना सामाजिक सुधार की गुंजाइश को खत्म कर सकता है। इसलिए आज जब UCC को लेकर बहस होती है तो यह सवाल भी उठता है कि जिस संविधान ने समान नागरिक कानून की दिशा दिखाई थी, क्या सात दशक बाद भी हम उसी बहस के शुरुआती पड़ाव पर खड़े हैं?

फिर भाजपा ने इसे अपना मुद्दा कैसे बनाया?

UCC भाजपा के लिए अचानक पैदा हुआ चुनावी मुद्दा नहीं है। इसकी राजनीतिक जड़ें भारतीय जनसंघ के दौर तक जाती हैं। 1967 के जनसंघ घोषणापत्र में सभी नागरिकों के लिए विवाह, उत्तराधिकार और गोद लेने से जुड़ा समान कानून बनाने की बात स्पष्ट रूप से रखी गई थी और 1971 में भी यह मुद्दा दोहराया गया। बाद में भाजपा ने भी इसे अपने प्रमुख वैचारिक मुद्दों में शामिल किया। 1989 के भाजपा घोषणापत्र में अलग-अलग व्यक्तिगत कानूनों की समीक्षा कर समान नागरिक संहिता के लिए सहमति बनाने की बात कही गई। यानी UCC भाजपा के लिए आज का चुनावी नारा नहीं, बल्कि कई दशकों पुराना राजनीतिक एजेंडा है।

राम मंदिर और 370 के बाद UCC क्यों और महत्वपूर्ण हो गया?

भाजपा की राजनीति में लंबे समय तक तीन मुद्दे विशेष रूप से पहचाने जाते रहे—राम मंदिर, अनुच्छेद 370 और समान नागरिक संहिता। अनुच्छेद 370 में बदलाव 2019 में हुआ और अयोध्या में राम मंदिर का निर्माण भी अब वास्तविकता है। ऐसे में UCC वह बड़ा पुराना मुद्दा बचता है जिसे भाजपा अभी पूरे देश में लागू नहीं कर पाई है। यही कारण है कि पार्टी अब इसे केवल वैचारिक मांग के रूप में नहीं, बल्कि शासन और कानून के स्तर पर आगे बढ़ाने की कोशिश कर रही है। सितंबर 2026 में अमित शाह ने 2029 के लोकसभा चुनाव से पहले NDA शासित राज्यों में UCC लागू करने का लक्ष्य दोहराया है।

UCC लागू हुआ तो आम आदमी की जिंदगी में बदलेगा क्या?

UCC का मतलब यह नहीं होगा कि किसी नागरिक की पूजा-पद्धति, खान-पान या धार्मिक आस्था का कानून तय करेगा। इसका केंद्र नागरिक और पारिवारिक मामले हैं—शादी, तलाक, विरासत, उत्तराधिकार, गोद लेना और ऐसे दूसरे व्यक्तिगत नागरिक अधिकार। उत्तराखंड के मौजूदा UCC में इन्हीं क्षेत्रों को एक समान कानूनी ढांचे में रखा गया है। यानी कल को राष्ट्रीय स्तर पर इसी तरह का UCC आता है तो किसी व्यक्ति के लिए सबसे बड़ा बदलाव उसके धर्म के आधार पर अलग व्यक्तिगत कानून की जगह एक समान नागरिक कानून का लागू होना होगा।

सबसे बड़ा बदलाव महिलाओं और विरासत के मामलों में दिखाई दे सकता है

मान लीजिए किसी परिवार में पिता की मृत्यु होती है। आज अलग-अलग व्यक्तिगत कानूनों के कारण उत्तराधिकार के नियम समुदाय के हिसाब से अलग हो सकते हैं। UCC का उद्देश्य यही अंतर खत्म करके एक समान व्यवस्था बनाना है। इसी तरह विवाह और तलाक के नियम भी धर्म के आधार पर अलग रहने के बजाय एक समान कानून के तहत आ सकते हैं। UCC के समर्थक इसे महिलाओं के समान अधिकार से जोड़ते हैं, क्योंकि उनका तर्क है कि नागरिक अधिकारों का आधार व्यक्ति होना चाहिए, धर्म नहीं।

फिर मुस्लिम समाज में डर किस बात का है?

मुस्लिम समाज के एक बड़े हिस्से की चिंता यह है कि UCC लागू होने के बाद मुस्लिम पर्सनल लॉ के तहत चलने वाली कई पारंपरिक व्यवस्थाओं की कानूनी मान्यता खत्म या सीमित हो सकती है। इसलिए इसे सिर्फ “समान कानून” के रूप में नहीं, बल्कि अपनी मौजूदा व्यक्तिगत व्यवस्था में बदलाव के रूप में देखा जाता है। चिंता का केंद्र पूजा या धार्मिक आस्था नहीं, बल्कि परिवार और निजी कानूनों से जुड़े अधिकार हैं। दूसरी तरफ UCC के समर्थकों का कहना है कि जहां व्यक्तिगत कानून और लैंगिक समानता में टकराव हो, वहां संविधान के समानता के सिद्धांत को प्राथमिकता मिलनी चाहिए।

हिंदू समाज में UCC के समर्थन का एक कारण यही ऐतिहासिक अनुभव है कि हिंदू व्यक्तिगत कानूनों में आजादी के शुरुआती वर्षों में बड़े बदलाव किए गए, जबकि दूसरे व्यक्तिगत कानूनों में उतना व्यापक बदलाव नहीं हुआ। समर्थकों के लिए यह सवाल केवल मुस्लिम पर्सनल लॉ का नहीं है; उनका कहना है कि कल को समान नियम हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई, बौद्ध, जैन और अन्य सभी नागरिकों पर लागू होंगे। यानी UCC का असली दावा किसी धर्म को बदलना नहीं, नागरिक कानून को धर्म से अलग करना है।

तो क्या UCC केवल मुस्लिम पर्सनल लॉ खत्म करने का कानून है?

नहीं, अगर UCC आता है तो उसका दायरा सभी नागरिकों तक होगा। सिख, ईसाई, बौद्ध, जैन, पारसी और दूसरे समुदाय भी इसके दायरे में आएंगे, हालांकि आदिवासी समुदायों और कुछ विशेष customary laws को लेकर अलग प्रावधान किए जा सकते हैं। मौजूदा राज्यों के UCC मॉडल में भी कुछ समुदायों और प्रथाओं को लेकर अलग व्यवस्थाएं दिखाई देती हैं। इसलिए यह कहनासही नहीं कि UCC केवल मुस्लिम पर्सनल लॉ खत्म करने का कानून है।

गोवा ने देश के सामने पहले ही एक सवाल रख दिया था

UCC की बहस में गोवा का उदाहरण इसलिए दिलचस्प है क्योंकि वहां पुर्तगाली दौर से चली आ रही एक समान civil-law व्यवस्था का बड़ा हिस्सा 1961 में भारत में विलय के बाद भी जारी रहा। इसलिए गोवा में विवाह, उत्तराधिकार और पारिवारिक मामलों में देश के दूसरे हिस्सों से अलग एक साझा कानूनी परंपरा देखने को मिलती है। इसलिए, गोवा यह दिखाता है कि भारत में धर्म से अलग साझा civil-law व्यवस्था कोई बिल्कुल अनजाना प्रयोग नहीं है।

2026 में सवाल यह नहीं रह गया कि UCC संविधान के खिलाफ है या नहीं

अनुच्छेद 44 साफ तौर पर राज्य को पूरे भारत में समान नागरिक संहिता की दिशा में प्रयास करने को कहता है। इसलिए बहस यह नहीं हो सकती कि UCC का विचार संविधान में है या नहीं। वह तो है। असली बहस अब यह है कि उसे किस रूप में लागू किया जाए, किस सीमा तक लागू किया जाए और धार्मिक स्वतंत्रता तथा नागरिक समानता के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए।

सशक्त लोकतंत्र के लिए UCC क्यों जरूरी माना जा रहा है?

एक मजबूत लोकतंत्र का मूल विचार यही है कि राज्य अपने नागरिकों के साथ समान व्यवहार करे। समर्थकों का तर्क है कि जब वोट एक है, संविधान के सामने नागरिकता एक है और कानून के सामने नागरिक बराबर हैं, तो परिवार और संपत्ति से जुड़े बुनियादी नागरिक अधिकारों में धर्म के आधार पर अलग-अलग व्यवस्था कब तक रहेगी? उनके लिए UCC संविधान के उसी अधूरे लक्ष्य को पूरा करने की कोशिश है जिसे 1948 में भविष्य के लिए छोड़ दिया गया था।

दरअसल, 75 साल पहले संविधान सभा ने जिस सवाल को भविष्य के लिए छोड़ा था, वह अब फिर देश के सामने है। तब देश नया था, विभाजन का दर्द ताजा था और समाज को एक साथ रखना सबसे बड़ी चुनौती थी। आज परिस्थितियां अलग हैं। संविधान को लागू हुए 75 साल हो चुके हैं, समाज बदल चुका है और कई पुराने कानून भी बदल चुके हैं। ऐसे में यह सवाल स्वाभाविक है कि जिस UCC को संविधान ने कभी अस्वीकार नहीं किया, उसे आखिर कब तक टाला जाता रहेगा? यही वह मोड़ है जहां UCC भाजपा बनाम विपक्ष की बहस से निकलकर भारत के लोकतंत्र की बहस बन जाता है—क्या एक देश में नागरिक अधिकार भी एक जैसे होने चाहिए? 


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