हर आपदा को ‘क्लाइमेट चेंज’ कहकर आगे बढ़ जाना कहीं हमारी अपनी गलतियों पर पर्दा डालने का आसान तरीका तो नहीं?
क्या पुराने समय में बाढ़ नहीं आती थी? या पहाड़ों में सैंकड़ो साल से बुलंद ख़डी पुरानी पत्थर की इमारतें आज हमें कुछ सबक दे रही है…! जरा पढ़िए और सोचिए।
D-News Watch Special | दिग्विन्द्र राणा
नेपाल में पानी ने जो कहर बरपाया है, उसकी तस्वीरें देखकर दिल दहल जाता है। पहाड़ों से उतरता पानी, बहते रास्ते, टूटते पुल और देखते ही देखते उजड़ती बस्तियां। इंसान के सामने प्रकृति जब अपनी ताकत दिखाती है तो उसकी सारी तकनीक, सारे दावे और विकास की सारी इबारत छोटी पड़ जाती है।
लेकिन ऐसी हर तस्वीर के साथ आजकल एक वाक्य भी लगभग तय होता है—“यह Climate Change का असर है।”
ठीक है। जलवायु बदल रही है। मौसम के मिजाज में बदलाव हो रहा है। दुनिया भर में extreme weather events को लेकर वैज्ञानिक लगातार चेतावनी दे रहे हैं।
मगर मन में एक शरारती-सा सवाल फिर भी उठता है—क्या बारिश ने ही अपना घर बदला है, या हमने भी अपना घर ऐसी जगह बना लिया है जहां बारिश का आना अब आफत बन गया है?
जरा पीछे मुड़कर देखिए।
हमारे पहाड़ों में सैकड़ों साल पुरानी बस्तियां हैं। पत्थरों से बनी इमारतें हैं। मंदिर हैं। किले हैं। अंग्रेजों के जमाने की इमारतें आज भी खड़ी हैं। उन्होंने भी बारिश देखी होगी, पहाड़ों पर पानी उतरा होगा, नदियां उफनी होंगी। फिर उन इमारतों ने हर बरसात के बाद अखबारों की सुर्खियां क्यों नहीं बनाई?
इसका जवाब यह नहीं कि उस जमाने में बाढ़ आती ही नहीं थी।
बाढ़ तब भी आती थी। फर्क शायद इतना था कि इंसान ने पानी के रास्ते में अपना घर कम बनाया था।
आज कहानी कुछ अलग है।
पहाड़ दिखाई दिया—सड़क काट दो।
नदी दिखाई दी—किनारे रिसॉर्ट बना दो।
नाला दिखाई दिया—ढककर उसके ऊपर बाजार बना दो।
खाली जमीन दिखी—कॉलोनी काट दो।
और जहां प्रकृति ने बरसाती पानी के लिए रास्ता छोड़ा था, वहां कंक्रीट बिछाकर बोर्ड लगा दो—“ड्रीम सिटी।”
फिर एक दिन बादल फटता है, पानी आता है और हमारी “ड्रीम सिटी” सचमुच सपना बन जाती है।
सुबह तक घर था, शाम तक मलबा।
और अगले दिन विशेषज्ञ बताते हैं—“अत्यधिक वर्षा के कारण बाढ़।”
बिल्कुल सही।
लेकिन कहानी पूरी नहीं है।
बारिश सिर्फ ट्रिगर है, असली विस्फोट कहीं और होता है
एक ही बारिश जंगल में पड़े तो वह पानी जमीन में उतर सकता है। वही बारिश पहाड़ के कटे हुए ढलान और कंक्रीट से भरे शहर में पड़े तो पानी को जाना कहां है?
नाला हमने छोटा कर दिया।
तालाब हमने भर दिया।
Wetland हमने खत्म कर दिया।
नदी का किनारा हमने घेर लिया।
पहाड़ हमने काट दिया।
फिर पानी ने वही किया जो पानी करता है—उसने अपना रास्ता ढूंढ लिया।
और जब उस रास्ते में हमारा घर आया तो हमने उसे “प्राकृतिक आपदा” कह दिया।
यहीं से असली सवाल शुरू होता है।
Climate Change है—मान लेते हैं।
लेकिन क्या Climate Change ने नदी के floodplain में मकान बनाए?
क्या Climate Change ने बरसाती नाले पर सड़क बनाई?
क्या Climate Change ने बिना पर्याप्त drainage के नई कॉलोनी को मंजूरी दी?
क्या Climate Change ने पहाड़ काटकर होटल खड़े किए?
नहीं।
ये फैसले इंसानों ने लिए हैं।
और इन फैसलों के पीछे सिर्फ बिल्डर नहीं होते। नक्शा पास करने वाला विभाग भी होता है, स्थानीय प्रशासन भी होता है, राजनीतिक संरक्षण भी हो सकता है और हमारी अपनी वह मानसिकता भी होती है जो हर खाली जगह को “डेवलपमेंट” समझती है।
इसलिए हर हादसे में बिना सबूत “सरकार-बिल्डर की मिलीभगत” कहना भी आसान रास्ता है। असली सवाल इससे ज्यादा असहज है—
जिस निर्माण को अनुमति मिली, उसकी जिम्मेदारी किसकी थी?
और अगर नियम टूटे थे तो उन्हें टूटने किसने दिया?
पुरानी इमारतें हमें चिढ़ाती हैं
शायद सबसे बड़ा व्यंग्य यही है कि जिन पहाड़ों को हमने आधुनिक इंजीनियरिंग से जीत लेने का दावा किया, वहीं हमारे पुरखे बिना satellite, बिना AI और बिना करोड़ों के प्रोजेक्ट के सदियों तक टिकने वाली बस्तियां बना गए।
उन्होंने शायद प्रकृति को हराने की कोशिश नहीं की थी।
वे जानते थे कि नदी से बहस नहीं की जाती।
पहाड़ को चुनौती नहीं दी जाती।
पानी को रास्ता दिया जाता है।
हमने विकास की परिभाषा बदल दी।
अब नदी के किनारे जमीन महंगी है, पहाड़ पर view महंगा है और प्राकृतिक जमीन पर निर्माण सबसे ज्यादा फायदे का सौदा है।
बस एक चीज सस्ती है—इंसानी जान।
उसकी कीमत अक्सर हादसे के बाद सरकारी मुआवजे से तय होती है।
अब सवाल नेपाल से भारत तक आता है
नेपाल की त्रासदी सिर्फ नेपाल की कहानी नहीं है। हिमालय की गोद में बैठे भारत के शहर और पहाड़ी इलाके भी इसी सवाल के सामने खड़े हैं।
हर मानसून हम जलभराव की तस्वीरें देखते हैं। सड़कें नदियां बनती हैं। वाहन बहते हैं। घर डूबते हैं। फिर बारिश खत्म होती है, पानी उतरता है और हम सब कुछ भूल जाते हैं।
अगले साल फिर वही।
फिर वही बयान।
फिर वही जांच।
फिर वही आश्वासन।
और फिर अगली बरसात।
शायद अब हमें सवाल थोड़ा बदलना चाहिए।
यह पूछना काफी नहीं कि “इतनी बारिश क्यों हुई?”
यह भी पूछना होगा—
“इतनी बारिश के लिए हमने तैयारी कितनी की थी?”
क्योंकि मौसम हमारे हाथ में नहीं है।
लेकिन नदी के किनारे घर बनाना, नाले पर बाजार बनाना, पहाड़ काटना और प्राकृतिक जलनिकासी को खत्म करना—ये फैसले हमारे हाथ में हैं।
बाढ़ प्रकृति लाती है।
लेकिन बाढ़ को मौत की मशीन बनाने में कहीं न कहीं इंसान का भी हाथ होता है।
और शायद अगली बार जब हम किसी डूबते शहर की तस्वीर देखें, तो आसमान की तरफ उंगली उठाने से पहले एक बार जमीन की तरफ भी देख लें।
कहीं पानी का रास्ता हमने ही तो नहीं रोक रखा…?
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