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हाईकोर्ट में सरकार ने माना—35,449 कैदियों में 15,768 ड्रग-डिपेंडेंट; अब सवाल सिर्फ इलाज का नहीं, नशे से मुक्ति का है

चंडीगढ़ | D-News Watch

पंजाब में नशे के खिलाफ चल रही सरकारी मुहिम के बीच जेलों से सामने आया एक आंकड़ा पूरे सिस्टम को आईना दिखाने वाला है। पंजाब सरकार ने पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट में दाखिल स्टेटस रिपोर्ट/हलफनामे में बताया है कि राज्य की जेलों में बंद 35,449 कैदियों में से 15,768 कैदी ड्रग-डिपेंडेंसी से प्रभावित हैं। यानी जेलों की कुल कैदी आबादी का करीब 44.5 प्रतिशत हिस्सा नशे की निर्भरता से जूझ रहा है।

सरकार के मुताबिक इन कैदियों को OOAT यानी Out-Patient Opioid Assisted Treatment के माध्यम से उपचार उपलब्ध कराया जा रहा है। लेकिन हाईकोर्ट में मामला केवल इस बात तक सीमित नहीं रहा कि कितने कैदी नशे पर हैं और कितनों को दवा मिल रही है। कोर्ट ने उपचार की प्रक्रिया, उसकी SOP और कैदियों को धीरे-धीरे नशे की निर्भरता से बाहर निकालने के रास्ते पर भी सरकार से जवाब मांगा है।

अमृतसर-बठिंडा के आंकड़े भी गंभीर

सरकारी आंकड़ों के मुताबिक अमृतसर सेंट्रल जेल में 4,918 कैदियों में से 2,124 ड्रग-डिपेंडेंट बताए गए हैं। बठिंडा जेल में 1,978 कैदियों में से 1,064 कैदी इस श्रेणी में हैं।

यानी समस्या किसी एक जेल या किसी एक इलाके तक सीमित दिखाई नहीं देती।

और चिंता की दूसरी वजह यह है कि ड्रग-डिपेंडेंसी से प्रभावित कैदियों में बड़ी संख्या 18 से 45 वर्ष के आयु वर्ग की है। आंकड़ों के अनुसार 18-25 वर्ष के 2,951, 26-35 वर्ष के 5,656 और 36-45 वर्ष के 4,544 कैदी इस श्रेणी में हैं।

जेल में इलाज शुरू, लेकिन आगे क्या?

यहीं से यह मामला महज एक आंकड़े की खबर नहीं रह जाता।

OOAT के जरिए कैदियों को opioid dependence नियंत्रित करने के लिए उपचार दिया जा रहा है। लेकिन हाईकोर्ट के सामने मूल सवाल यह बन रहा है कि क्या उपचार का उद्देश्य केवल निर्भरता को नियंत्रित करना है या कैदी को अंततः नशे से बाहर निकालकर सामान्य जीवन में वापस लाना भी है?

अगर कोई व्यक्ति जेल में उपचार लेता है, लेकिन रिहा होने के बाद उसके पास निरंतर उपचार, काउंसलिंग, परिवार का सहयोग और पुनर्वास की व्यवस्था नहीं है, तो उसकी दोबारा नशे की गिरफ्त में जाने की आशंका को कैसे रोका जाएगा?

मानसा की एक जेल ने बढ़ाई चिंता

इससे पहले मानसा की एक जेल को लेकर सामने आई रिपोर्ट ने भी स्थिति की गंभीरता दिखाई थी। वहां 767 कैदियों में से 530 OOAT क्लीनिक में पंजीकृत पाए गए थे। यानी करीब 69 प्रतिशत कैदी इस उपचार व्यवस्था के दायरे में थे।

यह आंकड़ा एक बड़ा सवाल छोड़ता है—क्या जेलों में नशे की समस्या इतनी गहरी हो चुकी है कि जेल प्रशासन को अब केवल सुरक्षा और कैदियों की निगरानी ही नहीं, बल्कि बड़े पैमाने पर addiction treatment system भी चलाना पड़ रहा है?

हाईकोर्ट ने अब अगला सवाल पकड़ लिया है

हाईकोर्ट ने सरकार से उपचार की Standard Operating Procedure, दवा देने की प्रक्रिया, उपचार की अवधि और कैदियों को धीरे-धीरे दवा की निर्भरता से बाहर लाने की नीति पर स्पष्टीकरण मांगा है।

इसके साथ ही जेल से रिहा होने के बाद कैदियों के follow-up treatment और rehabilitation का सवाल भी महत्वपूर्ण हो गया है।

मामले की सुनवाई आगे भी जारी रहेगी और हाईकोर्ट ने इस मामले को गंभीरता से लेते हुए नियमित सुनवाई का संकेत दिया है। अगली सुनवाई 8 सितंबर को होनी है।

बड़ा सवाल: जेल सुधार रही है या सिर्फ संभाल रही है?

पंजाब में नशे के खिलाफ लड़ाई की असली परीक्षा केवल इस बात से नहीं होगी कि कितने लोगों को दवा दी गई। असली परीक्षा यह होगी कि कितने लोग इलाज के बाद नशे से बाहर निकलकर दोबारा सामान्य जीवन में लौटे।

सरकार के अपने आंकड़े बता रहे हैं कि जेलों में बंद करीब हर दो में से एक कैदी ड्रग-डिपेंडेंसी से प्रभावित है। ऐसे में जेलों को केवल अपराधियों को बंद रखने की जगह मानकर चलना पर्याप्त नहीं होगा।

क्योंकि अगर जेल के अंदर इलाज है लेकिन बाहर निकलने के बाद पुनर्वास की मजबूत व्यवस्था नहीं है, तो समस्या जेल की चारदीवारी से बाहर निकलकर फिर उसी समाज में लौट सकती है।

इसलिए अब सबसे बड़ा सवाल यह नहीं कि जेलों में कितने कैदी नशे के आदी हैं। सवाल यह है कि जेल से बाहर निकलने के बाद उनमें से कितने सचमुच नशे से मुक्त रह पाते हैं?

यही आंकड़ा पंजाब की नशा-विरोधी मुहिम की असली सफलता या असफलता का पैमाना बन सकता है।


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