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🔴 यहाँ क्लिक करके D-News Watch के मुख्य पृष्ठ (Home) पर जाएँ‘ईमानदार राजनीति’ और व्यवस्था परिवर्तन के दावे के साथ सत्ता में आई AAP सरकार में अब आरोप मुख्यमंत्री के कैंप ऑफिस तक पहुंच गए हैं; हाईकोर्ट के आदेश के बाद CBI जांच शुरू होने से मामला सिर्फ राजनीतिक नहीं, जवाबदेही का भी बन गया है
पंजाब में आम आदमी पार्टी जब सत्ता में आई थी तो उसका सबसे बड़ा दावा था—व्यवस्था बदलेगी, भ्रष्टाचार पर लगाम लगेगी और राजनीति में ईमानदारी आएगी। आम आदमी पार्टी ने खुद को पारंपरिक राजनीति से अलग बताया और जनता के सामने एक साफ-सुथरी सरकार का मॉडल रखा। जिसे पंजाब के मतदाताओं ने भी हाथो हाथ लिया और आप को ऐतिहासिक जीत के साथ सत्ता सोंपी। लेकिन अब उसी सरकार के कार्यकाल में भ्रष्टाचार के आरोप मुख्यमंत्री के कैंप ऑफिस और उनके OSD तक पहुंच गए हैं। सवाल अब यह नहीं है कि विपक्ष क्या कह रहा है और सरकार क्या जवाब दे रही है; सवाल यह है कि मुख्यमंत्री कार्यालय से जुड़े व्यक्ति पर इतने गंभीर आरोप आखिर पहुंचे कैसे और हाईकोर्ट ने इन्हें CBI जांच के लायक क्यों माना?
आखिर मामला है क्या?
ED की ओर से पंजाब में अधिकारियों की ट्रांसफर-पोस्टिंग, सरकारी टेंडर, CLU मंजूरी और दूसरे प्रशासनिक कामों में कथित भ्रष्टाचार तथा बिचौलियों की भूमिका को लेकर material सामने रखा गया। आरोपों की कड़ी मुख्यमंत्री के OSD राजबीर घुम्मन और कुछ अन्य लोगों से जुड़ती बताई गई। आरोप यह भी हैं कि सरकारी फैसलों और संवेदनशील सूचनाओं तक निजी लोगों की पहुंच बनाई गई तथा सरकारी काम करवाने के नाम पर आर्थिक लाभ लिया गया। यानी मामला किसी छोटे-मोटे विभागीय भ्रष्टाचार का नहीं, बल्कि सरकारी व्यवस्था को प्रभावित करने के कथित नेटवर्क का है।
कोर्ट के आदेश पर सीबीआई कर रही जाँच
CBI की कार्रवाई केंद्र सरकार के किसी राजनीतिक आदेश से शुरू नहीं हुई। ED की ओर से रखे गए material के बाद मामला हाईकोर्ट पहुंचा और पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने उसे गंभीरता से लेते हुए CBI को FIR दर्ज कर जांच करने का निर्देश दिया। अदालत ने उपलब्ध material को प्रथमदृष्टया संज्ञेय अपराध की जांच के योग्य माना। इसके बाद CBI ने FIR दर्ज की और तलाशी की कार्रवाई की। इसलिए सत्ता पक्ष के “केंद्र की साजिश” वाले आरोप के बीच यह तथ्य अपनी जगह कायम है कि जांच की तत्काल कानूनी वजह हाईकोर्ट का आदेश है।
CM कैंप ऑफिस में CBI क्यों पहुंची?
हाईकोर्ट के आदेश के बाद CBI ने पंजाब और चंडीगढ़ में कई ठिकानों पर तलाशी ली, जिनमें मुख्यमंत्री का कैंप ऑफिस भी शामिल था। OSD और दूसरे आरोपियों से जुड़े परिसरों की भी तलाशी हुई। हालांकि, इसका मतलब यह नहीं कि मुख्यमंत्री या पूरा मुख्यमंत्री कार्यालय दोषी साबित हो गया। तलाशी जांच का हिस्सा है। CBI यह देख रही है कि आरोपों से जुड़े दस्तावेज, डिजिटल सबूत, संपर्क या दूसरी सामग्री कहीं मौजूद है या नहीं। लेकिन राजनीतिक रूप से इतना जरूर महत्वपूर्ण है कि भ्रष्टाचार के आरोपों की जांच अब मुख्यमंत्री कार्यालय के दरवाजे तक पहुंच चुकी है।
सरकार का आरोप—केंद्र की साजिश
सरकार का कहना है कि पंजाब में चुनाव नजदीक हैं और BJP केंद्रीय एजेंसियों के जरिए AAP सरकार को बदनाम करना चाहती है। सरकार ने हाईकोर्ट के आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती भी दी है। यह सरकार का राजनीतिक और कानूनी पक्ष है। लेकिन इसके साथ दूसरा तथ्य भी देखना होगा—हाईकोर्ट ने खुद मामले में उपलब्ध material को गंभीर मानकर CBI जांच का आदेश दिया है। इसलिए केवल यह कह देना कि “CBI आई है, इसलिए केंद्र की साजिश है”, पूरे विवाद का जवाब नहीं बन सकता। सरकार को अदालत के सामने यह साबित करने का अवसर है कि हाईकोर्ट का आदेश किन आधारों पर गलत है।
विपक्ष के आरोप कितने सही
विपक्ष इसे सरकार के भ्रष्टाचार का प्रमाण बता रहा है। लेकिन हाईकोर्ट ने भ्रष्टाचार साबित नहीं किया है; उसने जांच का आदेश दिया है। इसलिए CBI की FIR और छापेमारी को दोष सिद्ध होने के बराबर मान लेना भी गलत होगा। आरोप गंभीर हैं, जांच गंभीर है, लेकिन अंतिम सच अभी जांच और अदालत की प्रक्रिया से सामने आना बाकी है।
मामला इतना राजनीतिक क्यों हो गया?
क्योंकि AAP की राजनीति की सबसे बड़ी पहचान ही भ्रष्टाचार विरोध और ईमानदारी रही है। दिल्ली में भी पार्टी ने खुद को इसी नैरेटिव के साथ स्थापित किया था। बाद में अरविंद केजरीवाल के सरकारी आवास से जुड़ा “शीश महल” विवाद हो या दिल्ली सरकार से जुड़े दूसरे भ्रष्टाचार के आरोप—इन विवादों ने AAP की उसी राजनीतिक छवि पर सवाल खड़े किए। यह अलग बात है कि दिल्ली आबकारी मामले में ट्रायल कोर्ट ने केजरीवाल और सिसोदिया को discharge किया है और उस फैसले को CBI ने चुनौती दी है। इसलिए कहा जा सकता है कि जिस पार्टी ने ईमानदारी को अपनी सबसे बड़ी पहचान बनाया, उसके लिए ऐसे आरोप सामान्य राजनीतिक आरोपों से ज्यादा संवेदनशील हो जाते हैं। सबसे बड़ा सवाल यह नहीं कि BJP सही है या AAP। सवाल यह है कि क्या मुख्यमंत्री कार्यालय से जुड़े किसी व्यक्ति ने सरकारी व्यवस्था में अपने प्रभाव का इस्तेमाल निजी लाभ के लिए किया? क्या ट्रांसफर-पोस्टिंग में पैसे का खेल था? क्या सरकारी टेंडर या मंजूरियों को प्रभावित किया गया? क्या गोपनीय सरकारी जानकारी बाहर पहुंचाई गई? और अगर ऐसा हुआ तो यह कितने बड़े नेटवर्क का हिस्सा था? इन सवालों का जवाब राजनीतिक बयान नहीं देगा। इसका जवाब मोबाइल फोन, दस्तावेज, बैंक ट्रेल, सरकारी फाइलों और दूसरे सबूत देंगे।
‘ईमानदारी’ की असली परीक्षा अब
AAP ने पंजाब की जनता से व्यवस्था बदलने और ईमानदार शासन का वादा किया था। इसलिए मुख्यमंत्री कार्यालय से जुड़े व्यक्ति पर लगे आरोप केवल एक व्यक्ति की कानूनी मुश्किल नहीं हैं। ये उस राजनीतिक दावे की भी परीक्षा हैं। अगर आरोप गलत हैं तो जांच उन्हें गलत साबित करेगी और सरकार के पास अपना पक्ष मजबूत करने का आधार होगा। अगर आरोप सही साबित होते हैं तो फिर सवाल सिर्फ OSD तक सीमित नहीं रहेगा—सवाल यह होगा कि जिस व्यवस्था को बदलने का दावा किया गया था, उसी व्यवस्था में कथित भ्रष्टाचार मुख्यमंत्री कार्यालय तक कैसे पहुंचा? क्योंकि आज सत्ता पक्ष कह रहा है—“केंद्र की साजिश।” विपक्ष कह रहा है—“भ्रष्टाचार की पोल खुल गई।” लेकिन जनता को इन दोनों नारों से आगे जाकर जवाब चाहिए। हाईकोर्ट ने मामला गंभीर मानकर CBI जांच का रास्ता खोला है। अब जांच को यह तय करना है कि आरोपों के पीछे ठोस सबूत हैं या नहीं। अगर साजिश है तो सच सामने आना चाहिए। अगर भ्रष्टाचार है तो जिम्मेदारी तय होनी चाहिए। क्योंकि आखिरकार सवाल किसी OSD का अकेला नहीं है। सवाल उस व्यवस्था का है, जिसे बदलने के नाम पर पंजाब में सत्ता बदली गई थी। बहरहाल जनता को अगली बार मतदान से पहले यह जानने का पूरा अधिकार है कि—व्यवस्था सच में बदली थी, या सिर्फ सत्ता का चेहरा बदला था?
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