विशेष राजनीतिक-सामाजिक विश्लेषण — डी न्यूज़ वॉच डेस्क
पंजाब में अगले विधानसभा चुनाव (2027) की सियासी ज़मीन अभी से तैयार होने लगी है। मुद्दों की फेहरिस्त लंबी है, लेकिन सबसे दर्दनाक और संवेदनशील यक्ष प्रश्न आज भी वही पुराना है— ‘नशा’।
भगवंत मान सरकार ने सत्ता में आते ही राज्य में ‘युद्ध नशे के विरुद्ध’ का बिगुल फूंका था। लेकिन क्या यह ‘युद्ध’ अपनी मंज़िल तक पहुँच पाया? क्योंकि, सरहद पार से आते ड्रोन, गाँव-गाँव पसरा सन्नाटा और प्रशासनिक कमियाँ आज भी कई कड़वे सवाल खड़े कर रही हैं।
इसी अनसुलझी पहेली के बीच, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का ‘नशा मुक्त भारत अभियान’ पंजाब के सियासी गलियारों में एक नई बहस को जन्म दे रहा है। क्या यह महज़ एक राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन है? या फिर पंजाब की राजनीतिक तासीर को देखते हुए इसके पीछे गहरे सामाजिक और रणनीतिक मायने छुपे हैं?
‘युद्ध नशे विरुद्ध’ बनाम जमीनी हकीकत:
आम आदमी पार्टी की सरकार ने नशे पर लगाम कसने के लिए कई दावे किए, पुलिसिया धरपकड़ तेज़ की और बड़े पैमाने पर ज़ब्तियाँ भी दिखाईं। लेकिन सवाल यह उठता है कि क्या पुलिसिया कार्रवाई से नशे की जड़ों पर प्रहार हो पाया है? ‘स्मगलर्स’ पकड़े गए या ‘सिंडिकेट’ टूटा? आम जनता में आज भी यह सवाल तैर रहा है कि क्या वाकई बड़े नशा तस्कर शिकंजे में आए हैं या सिर्फ मोहरे? पाकिस्तान की ओर से ड्रोन के ज़रिए नशे की सप्लाई रोकने में राज्य और केंद्र के बीच का तालमेल आखिर कितना कारगर साबित हो पा रहा है? दरअसल, जब राज्य सरकार के अभियानों पर जनता सवाल उठाने लगती है, तो वहीं से विपक्षी दलों के लिए नया नैरेटिव बनाने का रास्ता खुलता है।
क्या भाजपा नशे के कोर इशू के ज़रिए साधेगी 2027 का निशाना?
शिरोमणि अकाली दल से राहें जुदा होने के बाद, पंजाब में अपने दम पर ज़मीन तलाश रही भारतीय जनता पार्टी के लिए सबसे बड़ा मुद्दा क्या हो सकता है? सिख राजनीति और किसान आंदोलनों की पृष्ठभूमि के बीच, क्या नशा ही वह बड़ा मुद्दा है जो सीधे हर माँ, बहन और परिवार के दिल को छूता है? यहाँ कई ऐसे सवाल खड़े होते हैं जिन पर पंजाब के मतदाताओं को विचार करना होगा:
बड़ा सवाल: क्या पीएम मोदी का ‘नशा मुक्त भारत अभियान’ पंजाबियों को यह सोचने पर मजबूर कर रहा है कि नशे जैसी अंतरराष्ट्रीय समस्या से निपटने के लिए ‘डबल इंजन’ या केंद्रीय एजेंसियों के सीधे हस्तक्षेप की ज़रूरत है? क्या भाजपा इस अभियान के बहाने पंजाब के ग्रामीण इलाकों—मालवा, माझा और दोआबा—के उन परिवारों तक अपनी पहुँच बना रही है जो नशे की मार झेल रहे हैं? युवाओं को अपराधी के बजाय ‘पीड़ित’ बताकर उनका पुनर्वास करने का विज़न क्या भाजपा की छवि को पंजाब में एक नया मोड़ दे पाएगा? और यक्ष प्रश्न यह भी कि क्या इस अभियान के तहत बनने वाले ‘मास्टर वालंटियर्स’ और सामाजिक संगठन भविष्य में भाजपा के राजनीतिक कैडर की नींव मजबूत करेंगे?
‘रंगला पंजाब’ की उम्मीद और जनता का फैसला
पंजाब का किसान कर्ज़ और खेती के संकट से जूझ रहा है, युवा रोजगार की तलाश में कनाडा की राह देख रहे हैं और जो यहाँ रह गए हैं, वे नशे के साये में जीने को मजबूर हैं। ऐसे में सवाल उठना लाजमी है कि, क्या भगवंत मान सरकार समय रहते अपने ‘युद्ध’ का कोई ठोस नतीजा जनता के सामने रख पाएगी? क्या पंजाब की जनता सिर्फ नारों और वादों पर भरोसा करेगी या इस बार ठोस सुरक्षा और नतीजों को आधार बनाकर वोट देगी? —और यह भी कि, क्या पीएम मोदी का यह विज़न पंजाब में भाजपा के लिए 2027 का ‘गेम चेंजर’ साबित होगा या पंजाब की सियासत का ऊँट 2027 में फिर किसी और करवट बैठेगा?
नशा सिर्फ एक राजनीतिक मुद्दा नहीं, पंजाब की आने वाली पीढ़ियों के वजूद की लड़ाई है। अब देखना यह होगा कि क्या सत्ता पक्ष अपने दावों से जनता का विश्वास बहाल रख पाता है, या फिर प्रधानमंत्री मोदी के ‘नशा मुक्त भारत’ के संदेश में पंजाब के लोग अपनी भावी राजनीति का नया हल ढूँढते हैं। जवाब किसी नेता की तकरीर में नहीं, बल्कि पंजाब के आम वोटर की खामोशी में छुपा है..!
Discover more from D-News Watch
Subscribe to get the latest posts sent to your email.