* मुद्दे बदले या सिर्फ कैमरों का फोकस
नई दिल्ली, (डी-वाच डेस्क न्यूज़) कुछ दिन पहले तक देश की राजनीति में एक ही मुद्दा गूंज रहा था। विपक्ष के लगभग सभी बड़े चेहरे एक सुर में कथित “चंदा चोरी” के आरोपों को लेकर सरकार पर हमलावर थे। प्रेस कॉन्फ्रेंस, टीवी डिबेट, सोशल मीडिया और संसद के बाहर तक यही स्वर सुनाई दे रहा था। ऐसा लग रहा था मानो देश के सामने इससे बड़ा कोई सवाल ही नहीं है..।
…लेकिन राजनीति का मंच बदला, कैमरों का रुख बदला और देखते ही देखते नेताओं की जुबान भी बदल गई। दिल्ली में नए राजनीतिक घटनाक्रम और विरोध-प्रदर्शन शुरू हुए तो कैमरे उधर घूम गए। कैमरे क्या घूमे, कैमरों के साथ ही नेताओं के बयान भी घूम गए। जो कल तक श्रद्धा से खिलवाड़ को लेकर आंसू बहा रहे थे, अचानक सब भूल कर दिल्ली में गुर्रा रहे हैं। पहले वाला मुद्दा जैसे राजनीतिक स्मृति से ही गायब हो गया..!
…यही सवाल लोकतंत्र के सामने खड़ा है कि क्या राजनीतिक दलों की प्राथमिकताएं वास्तव में जनता तय करती है, या फिर टीवी कैमरों की बदलती दिशा? यदि कोई मामला इतना गंभीर था कि उसे देश की आस्था से जोड़कर पेश किया जा रहा था, तो क्या वह कुछ ही दिनों में महत्वहीन हो गया? या फिर मुद्दे नहीं, केवल सुर्खियां बदलती हैं और उनके साथ राजनीति भी अपना चेहरा बदल लेती है?
बहरहाल, जनता सब देख रही है। उसे यह समझने में देर नहीं लगती कि कौन किसी मुद्दे के प्रति सिद्धांत के कारण खड़ा है और कौन केवल सुर्खियां बटोरने के लिए। लोकतंत्र में सत्ता की जवाबदेही जितनी जरूरी है, उतनी ही विपक्ष की निरंतरता और विश्वसनीयता भी आवश्यक है। मुद्दे बदलना राजनीति का हिस्सा हो सकता है, लेकिन हर बार कैमरों के साथ बदल जाना लोकतंत्र के लिए अच्छे संकेत कतई नहीं माने जा सकते..।
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