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15% छूट और घर तक डिलीवरी का PSEB मॉडल बना चर्चा का विषय, निजी स्कूलों में महंगी किताबों के बोझ से परेशान अभिभावक पूछ रहे—CBSE में ऐसा मॉडल कब?

D-News Watch | विशेष रिपोर्ट

बच्चे के स्कूल जाने की खुशी हर माता-पिता के लिए खास होती है, लेकिन जैसे ही नया शैक्षणिक सत्र शुरू होता है, मध्यम वर्गीय परिवारों के सामने फीस के साथ-साथ किताबों, कॉपियों, यूनिफॉर्म, जूते और अन्य शैक्षणिक सामग्री का भारी खर्च खड़ा हो जाता है।इनमें सबसे बड़ा सवाल कई बार किताबों की कीमत और उनकी अनिवार्यता को लेकर उठता हैयही वजह है कि पंजाब स्कूल शिक्षा बोर्ड का नया ‘पुस्तक पोर्टल’ चर्चा में है। PSEB ने अपनी किताबें ऑनलाइन उपलब्ध कराते हुए प्रत्येक ऑर्डर पर 15 प्रतिशत की छूट और घर तक डिलीवरी की सुविधा शुरू की है। इंडिया पोस्ट की ज्ञान पोस्ट योजना के माध्यम से होम डिलीवरी की व्यवस्था भी की गई है

सरल शब्दों में कहें तो बोर्ड ने किताब को सिर्फ एक ‘बाजार की वस्तु’ मानने के बजाय उसे विद्यार्थी की जरूरत और अभिभावक की जेब से जोड़कर देखा है।

PSEB की पहल क्यों महत्वपूर्ण है?

पंजाब स्कूल शिक्षा बोर्ड के इस कदम का सबसे बड़ा संदेश पारदर्शिता है। जब विद्यार्थी या अभिभावक सीधे बोर्ड से किताब खरीद सकता है, कीमत पहले से स्पष्ट है और उस पर 15 प्रतिशत की छूट मिल रही है, तो बीच की कड़ी और अनावश्यक मूल्य-वृद्धि की गुंजाइश कम होती है। बोर्ड ने 97 केंद्रों के माध्यम से किताबें लेने का विकल्प भी रखा है, जबकि घर पर मंगवाने वालों के लिए डाक के जरिए डिलीवरी की व्यवस्था की गई है।

यानी अभिभावक के पास विकल्प है—ऑनलाइन खरीदिए, घर पर मंगवाइए या निर्धारित केंद्र से लीजिए। यही वह व्यवस्था है जिसकी आज निजी स्कूलों में पढ़ने वाले लाखों बच्चों के माता-पिता भी कल्पना करते हैं।

अब सवाल CBSE व्यवस्था पर

देश में CBSE से जुड़े निजी स्कूलों की संख्या बहुत बड़ी है और लाखों मध्यम वर्गीय परिवार अपने बच्चों को इन स्कूलों में पढ़ाते हैं।

अभिभावकों की सबसे बड़ी शिकायतों में से एक यह रही है कि कई निजी स्कूलों में किताबों का पूरा सेट खरीदने पर खर्च काफी बढ़ जाता है। कई मामलों में निजी प्रकाशकों की किताबों के सेट की कीमत NCERT की किताबों की तुलना में कई गुना अधिक होने की शिकायतें सामने आई हैं। 2026 में महंगी निजी प्रकाशकों की किताबों को लेकर राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने केंद्र सरकार, CBSE और राज्यों से जवाब भी मांगा। शिकायतों में यह आरोप सामने आया कि कुछ निजी स्कूल विद्यार्थियों को महंगे निजी प्रकाशकों के सेट लेने के लिए मजबूर करते हैं।

हालांकि हर निजी स्कूल या हर प्रकाशक को कटघरे में खड़ा करना उचित नहीं है। लेकिन जहां अभिभावकों को किसी खास विक्रेता से किताबें खरीदने के लिए मजबूर किया जाता है, वहां सवाल जरूर उठता है कि आखिर शिक्षा के नाम पर अभिभावक के पास स्वतंत्र विकल्प क्यों नहीं होना चाहिए? CBSE पहले भी स्कूलों को किताबों, स्टेशनरी और यूनिफॉर्म की बिक्री को लेकर चेतावनी दे चुका है और अभिभावकों को निर्धारित विक्रेता से ही सामान खरीदने के लिए मजबूर करने की प्रथा पर आपत्ति जता चुका है।

मुद्दा सिर्फ किताब का नहीं, ‘मिलीभगत’ की आशंका का है

अभिभावकों की सबसे बड़ी चिंता यह है कि यदि स्कूल किसी विशेष दुकान या विक्रेता की ओर भेजता है और वही विक्रेता स्कूल की निर्धारित सूची के अनुसार पूरा सेट बेचता है, तो कीमत तय होने की प्रक्रिया कितनी पारदर्शी है? क्या अभिभावकों को अलग-अलग दुकानों से कीमत की तुलना करने का वास्तविक अवसर मिलता है? क्या हर किताब वास्तव में अनिवार्य है? क्या उसी विषय की कम कीमत वाली वैकल्पिक पुस्तक उपलब्ध होने के बावजूद महंगी पुस्तक लेना जरूरी है?

और सबसे बड़ा सवाल—

यदि स्कूल और पुस्तक विक्रेता के बीच किसी प्रकार की व्यावसायिक व्यवस्था है, तो क्या उसकी जानकारी अभिभावकों को सार्वजनिक रूप से दी जाती है?

इन सवालों का जवाब देना केवल स्कूलों की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि नियामक व्यवस्था की भी जिम्मेदारी है।

मध्यम वर्ग आखिर जाए तो जाए कहां?

एक तरफ सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले विद्यार्थियों के लिए पंजाब सरकार पहले से मुफ्त किताबों की व्यवस्था कर रही है। PSEB ने भी स्पष्ट किया है कि सरकारी स्कूलों के विद्यार्थियों को किताबें मुफ्त मिलती रहेंगी। दूसरी ओर निजी स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चे भी इसी समाज का हिस्सा हैं। उनके माता-पिता कोई अलग आर्थिक वर्ग नहीं हैं।

खासकर मध्यम वर्ग के लिए शिक्षा का खर्च पहले ही फीस, परिवहन, यूनिफॉर्म और अन्य मदों के कारण लगातार बढ़ रहा है। ऐसे में यदि किताबों के नाम पर भी हजारों रुपये का अतिरिक्त बोझ पड़े, तो सवाल उठना स्वाभाविक है।

माता-पिता अपने बच्चे को अच्छी शिक्षा देना चाहते हैं, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि उन्हें हर उस वस्तु के लिए निर्धारित कीमत से कहीं ज्यादा भुगतान करना पड़े जिसे स्कूल अनिवार्य बता रहा है।

PSEB ने एक मॉडल सामने रख दिया है

PSEB की 15 प्रतिशत छूट वाली व्यवस्था ने कम से कम इन सवालों का जवाब दे दिया है—

क्या बोर्ड अपनी किताबें सीधे विद्यार्थी तक पहुंचा सकता है?

जवाब है—हां।

क्या किताब की कीमत में पारदर्शिता लाई जा सकती है?

जवाब है—हां।

क्या ऑनलाइन ऑर्डर और होम डिलीवरी संभव है?

जवाब है—हां।

तो फिर स्वाभाविक सवाल है—

क्या CBSE और उसके संबद्ध निजी स्कूलों के लिए भी ऐसी पारदर्शी व्यवस्था तैयार नहीं की जा सकती?

CBSE चाहे तो अपने स्तर पर एक ऐसा डिजिटल प्लेटफॉर्म विकसित करने की दिशा में विचार कर सकता है, जहां NCERT तथा स्वीकृत पाठ्यक्रम से संबंधित पुस्तकों की सूची, अधिकतम कीमत, प्रकाशक और उपलब्धता स्पष्ट रूप से दिखाई जाए।

इसके साथ यह भी सुनिश्चित किया जा सकता है कि अभिभावक को किसी एक दुकान या विक्रेता के पास जाने के लिए बाध्य न किया जाए।

CBSE से अभिभावकों की पांच सीधी अपेक्षाएं

पहली— किताबों की सूची और उनकी कीमत सार्वजनिक हो।

दूसरी— किसी खास दुकान या विक्रेता से खरीदने की बाध्यता खत्म हो।

तीसरी— जहां NCERT की पुस्तक पर्याप्त है, वहां महंगी निजी पुस्तक थोपने की प्रक्रिया की समीक्षा हो।

चौथी— स्कूल और पुस्तक विक्रेता के बीच किसी व्यावसायिक व्यवस्था की स्थिति में पारदर्शिता सुनिश्चित हो।

पांचवीं— अभिभावकों के लिए शिकायत और जांच की प्रभावी, आसान और समयबद्ध व्यवस्था हो।

सवाल शिक्षा की गुणवत्ता का नहीं, व्यवस्था की ईमानदारी का है

निजी प्रकाशकों की किताबें अच्छी हो सकती हैं। कई स्कूल अतिरिक्त अध्ययन सामग्री के लिए अलग पुस्तकें भी सुझा सकते हैं। समस्या वहां पैदा होती है जहां ‘सुझाव’ धीरे-धीरे ‘अनिवार्यता’ बन जाता है।

और जब अनिवार्यता के साथ सीमित विक्रेता, ऊंची कीमत और अभिभावक की मजबूरी जुड़ जाए, तो शिक्षा व्यवस्था पर सवाल उठना स्वाभाविक है।

PSEB का कदम इसलिए सराहनीय है कि उसने किताब खरीदने की प्रक्रिया में सीधा बोर्ड-अभिभावक संबंध बनाने की कोशिश की है।

अब गेंद CBSE के पाले में है।

देश के मध्यम वर्गीय माता-पिता यह नहीं मांग रहे कि उनके बच्चों को मुफ्त में सब कुछ दिया जाए। उनकी मांग बहुत साधारण है—

किताब वही हो जो बच्चे के लिए जरूरी है, कीमत उचित हो, खरीद की आजादी हो और किसी मजबूरी को कारोबार में बदलने की गुंजाइश न हो।

क्योंकि आखिरकार—

बच्चे की किताब ज्ञान का साधन है, किसी की कमाई का अनिवार्य जरिया नहीं।

D-News Watch का सवाल:
जब PSEB 15% छूट के साथ किताबें घर तक पहुंचा सकता है, तो क्या CBSE भी लाखों मध्यम वर्गीय अभिभावकों को ऐसी पारदर्शी और राहत देने वाली व्यवस्था देने पर विचार करेगा..?


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