पुलिस, प्रदर्शनकारी, विपक्ष और मीडिया—लोकतंत्र में अधिकार सबके हैं, लेकिन सीमाएं भी सबकी होनी चाहिए…
डी-न्यूज़ डेस्क | नई दिल्ली
जंतर-मंतर पर हुए घटनाक्रम की जांच के लिए सुप्रीम कोर्ट की ओर से हाई-लेवल कमेटी गठित करने का फैसला केवल एक घटना की जांच नहीं है। इसके भीतर लोकतंत्र के कई बुनियादी सवाल छिपे हैं—विरोध करने का अधिकार कितना है, कानून लागू करने वाली पुलिस की सीमा क्या है, राजनीतिक दलों की जिम्मेदारी कहां तक है और मीडिया की स्वतंत्रता के साथ उसकी जवाबदेही कितनी होनी चाहिए?
यही वजह है कि इस जांच का नतीजा केवल यह तय करने तक सीमित नहीं होना चाहिए कि लाठी पहले चली या पत्थर पहले चला।
असल जरूरत यह तय करने की है कि पूरे घटनाक्रम में किसकी क्या भूमिका थी, किसने अपनी सीमा लांघी और किसके खिलाफ कार्रवाई की सिफारिश होनी चाहिए।
प्रदर्शन का अधिकार है, हिंसा का नहीं
लोकतंत्र में सरकार के खिलाफ आवाज उठाना नागरिक का अधिकार है। छात्र हों, किसान हों, कर्मचारी हों या आम नागरिक—उन्हें अपनी मांगों के लिए प्रदर्शन करने का पूरा लोकतांत्रिक अधिकार है।
लेकिन यह अधिकार हिंसा का अधिकार नहीं बन सकता।
यदि प्रदर्शनकारी पुलिस पर हमला करते हैं, सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाते हैं या तय नियमों को जानबूझकर तोड़ते हैं, तो उसकी जवाबदेही तय होनी चाहिए।
लेकिन इसी सिद्धांत का दूसरा हिस्सा भी उतना ही महत्वपूर्ण है।
यदि पुलिस आवश्यकता से अधिक बल प्रयोग करती है, किसी व्यक्ति के साथ कानून से बाहर जाकर व्यवहार करती है या आत्मरक्षा और भीड़ नियंत्रण की सीमा से आगे बढ़ती है, तो पुलिसकर्मी भी जवाबदेही से बाहर नहीं हो सकते।
लोकतंत्र में अधिकार दोनों तरफ हैं, इसलिए जिम्मेदारी भी दोनों तरफ होनी चाहिए।
पुलिस की भूमिका: कानून लागू करना, गुस्सा निकालना नहीं
पुलिस के सामने भीड़ नियंत्रण आसान काम नहीं है। खासकर तब, जब प्रदर्शन उग्र हो जाए और पुलिसकर्मियों पर हमला होने लगे।
ऐसी स्थिति में पुलिस को अपने जवानों और आम नागरिकों की सुरक्षा करनी ही होगी। लेकिन बल प्रयोग का सिद्धांत फिर भी यही रहेगा कि वह आवश्यक, वैधानिक और परिस्थितियों के अनुपात में हो।
इसलिए कमेटी को हर बड़ी कार्रवाई के पीछे की परिस्थितियों को देखना चाहिए।
क्या पुलिस के पास दूसरा विकल्प था?
क्या पर्याप्त चेतावनी दी गई?
क्या बल का इस्तेमाल आवश्यकता के अनुपात में था?
क्या किसी पुलिसकर्मी ने निर्धारित प्रक्रिया से बाहर जाकर कार्रवाई की?
और अगर आत्मरक्षा में कोई कदम उठाया गया तो उससे ठीक पहले की परिस्थितियां क्या थीं?
किसी एक तस्वीर या दस सेकंड के वीडियो से फैसला नहीं हो सकता। पूरी घटनाक्रम की कड़ी देखनी होगी।
विपक्ष: सरकार को घेरना उसका धर्म, आग भड़काना नहीं
इस पूरे मामले का राजनीतिक पक्ष भी उतना ही महत्वपूर्ण है।
मजबूत विपक्ष लोकतंत्र के लिए जरूरी है। विपक्ष सरकार से सवाल करे, उसकी नीतियों की आलोचना करे, जनता के आंदोलनों के साथ खड़ा हो और सरकार पर दबाव बनाए—इसमें कोई आपत्ति नहीं हो सकती।
बल्कि स्वस्थ लोकतंत्र में यह जरूरी है।
लेकिन विपक्ष का दायित्व केवल सरकार के खिलाफ माहौल बनाना नहीं है। यदि किसी आंदोलन की स्थिति हिंसक होने लगे तो राजनीतिक नेतृत्व की जिम्मेदारी उसे और भड़काने की नहीं, बल्कि नियंत्रित करने की भी होनी चाहिए।
जलती आग में तेल डालना राजनीति हो सकती है, लेकिन आग बुझाने की जिम्मेदारी नेतृत्व की पहचान है।
सरकार की हर गलती को मुद्दा बनाना विपक्ष का अधिकार है, लेकिन हर आंदोलन को राजनीतिक लाभ के लिए अधिक से अधिक उग्र बनाना लोकतांत्रिक जिम्मेदारी नहीं कही जा सकती।
विपक्ष आज विपक्ष में है, कल सत्ता में हो सकता है। इसलिए उसे भी वही लोकतांत्रिक संस्थाएं और कानून चाहिए होंगे, जिनकी रक्षा की अपेक्षा वह आज सरकार से करता है।
किसान आंदोलनों से निकला बड़ा सबक
भारत में किसान आंदोलनों सहित कई बड़े जनआंदोलनों ने यह दिखाया है कि सड़क का आंदोलन जब बड़ा होता है तो वह केवल प्रदर्शनकारियों और सरकार के बीच का मामला नहीं रहता।
उसमें राजनीतिक दल, सामाजिक संगठन, सोशल मीडिया और मीडिया—सभी की भूमिका बढ़ जाती है।
ऐसे समय में आंदोलन का नेतृत्व करने वालों की जिम्मेदारी और बढ़ जाती है।
आंदोलन लंबा चले, सरकार पर दबाव बने, देश में चर्चा हो—यह लोकतंत्र है।
लेकिन आंदोलन में हिंसा बढ़े और राजनीतिक नेतृत्व उसे रोकने के बजाय उससे राजनीतिक लाभ लेने लगे—यह लोकतंत्र की स्वस्थ तस्वीर नहीं है।
मीडिया: ‘नैरेटिव’ की ताकत के साथ जवाबदेही भी
इस पूरी बहस का एक महत्वपूर्ण पक्ष मीडिया भी है।
जो मीडिया एक दूसरे मीडिया संस्थानों को ‘गोदी मीडिया’ और ‘दरबारी मीडिया‘ कहकर उनकी निष्पक्षता पर सवाल करता है, उससे भी यही अपेक्षा होनी चाहिए कि वह अपनी पत्रकारिता को भी उसी कसौटी पर परखे।
यदि किसी पुलिसकर्मी के सिर में डंडा लगता है, वह घायल होता है या पुलिस पर हमला होता है, तो वह भी खबर है।
यदि पुलिस किसी प्रदर्शनकारी पर अत्यधिक बल प्रयोग करती है, तो वह भी खबर है।
लेकिन समस्या तब पैदा होती है जब किसी घटना के केवल एक हिस्से को लगातार दिखाया जाए और दूसरे हिस्से को लगभग गायब कर दिया जाए।
मान लीजिए किसी तनावपूर्ण स्थिति में पुलिस की ओर से कोई फायरिंग हुई। तब पत्रकारिता का सवाल केवल यह नहीं होना चाहिए कि “गोली चली”। सवाल यह भी होना चाहिए कि उससे पहले क्या हुआ? क्या पुलिस पर हमला हो रहा था? क्या वह आत्मरक्षा थी? क्या कोई दूसरा विकल्प उपलब्ध था? क्या कार्रवाई निर्धारित नियमों के अनुसार हुई?
उसी तरह यदि प्रदर्शनकारियों पर लाठीचार्ज हुआ तो केवल लाठीचार्ज का दृश्य दिखाना पर्याप्त नहीं। उससे पहले प्रदर्शनकारी क्या कर रहे थे, पुलिस ने क्या चेतावनी दी और हालात किस तरह बिगड़े—यह भी जनता को दिखाना चाहिए।
एक दृश्य सनसनी पैदा कर सकता है; पूरा संदर्भ सत्य के करीब ले जाता है।
मीडिया की स्वतंत्रता पर कोई सवाल नहीं होना चाहिए, लेकिन स्वतंत्रता का अर्थ जवाबदेही से मुक्ति भी नहीं हो सकता।
सोशल मीडिया ने जिम्मेदारी को और बड़ा कर दिया
आज कोई भी वीडियो कुछ ही मिनटों में लाखों लोगों तक पहुंच सकता है। आधा वीडियो, पुराना वीडियो या संदर्भ से काटा गया वीडियो भी जनभावना को प्रभावित कर सकता है।
इसलिए मीडिया और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर सक्रिय पत्रकारों की जिम्मेदारी पहले से कहीं ज्यादा बढ़ गई है।
क्या वीडियो पूरा है?
कब का है?
किस घटना का है?
दूसरा पक्ष क्या कह रहा है?
क्या वीडियो की स्वतंत्र पुष्टि हुई है?
इन सवालों के बिना केवल भावनात्मक तस्वीरें चलाना समाज में तनाव बढ़ा सकता है।
सुप्रीम कोर्ट की कमेटी को क्या देखना चाहिए?
यही इस पूरी जांच का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा होना चाहिए।
कमेटी यदि वास्तव में निष्पक्ष और व्यापक जांच करती है तो उसे चारों पक्षों की भूमिका देखनी चाहिए—
पहला—प्रदर्शनकारी:
किसने हिंसा की, किसने कानून तोड़ा और किसने शांतिपूर्ण प्रदर्शन की मर्यादा बनाए रखी?
दूसरा—पुलिस:
किसने कानून के अनुसार बल प्रयोग किया और किसने अपनी शक्ति की सीमा पार की?
तीसरा—राजनीतिक नेतृत्व:
किसने आंदोलन को लोकतांत्रिक दिशा दी और किसने उसे राजनीतिक लाभ के लिए उग्र बनाने में भूमिका निभाई?
चौथा—मीडिया:
किसने पूरी घटना सामने रखी और किसने अधूरी तस्वीर या एकतरफा नैरेटिव के जरिए जनभावना को प्रभावित किया?
यह जांच किसी को दोषी साबित करने के लिए नहीं, बल्कि जिम्मेदारी की पूरी श्रृंखला सामने लाने के लिए होनी चाहिए।
जांच का सबसे बड़ा नतीजा: सीमाएं तय हों
इस कमेटी का सबसे महत्वपूर्ण योगदान शायद किसी एक व्यक्ति या संस्था को दोषी ठहराना नहीं, बल्कि भविष्य के लिए स्पष्ट सीमाएं निर्धारित करना होगा।
प्रदर्शनकारी जानें कि उनका अधिकार कहां तक है।
पुलिस जाने कि बल प्रयोग की सीमा क्या है।
राजनीतिक दल समझें कि आंदोलन का समर्थन और आंदोलन को भड़काने के बीच अंतर क्या है।
मीडिया समझे कि स्वतंत्र पत्रकारिता और उत्तेजक नैरेटिव के बीच एक महीन लेकिन महत्वपूर्ण रेखा है।
और जो भी उस सीमा को पार करे—चाहे वह प्रदर्शनकारी हो, पुलिसकर्मी हो, राजनीतिक कार्यकर्ता हो या कोई जिम्मेदार मीडिया संस्था—उसके खिलाफ कानून और नियमों के अनुसार कार्रवाई की सिफारिश हो।
निष्कर्ष: लोकतंत्र में किसी को भी ‘फ्री पास’ नहीं
जंतर-मंतर की घटना का सबसे बड़ा सबक यही होना चाहिए कि लोकतंत्र में किसी भी पक्ष को फ्री पास नहीं मिल सकता।
सरकार से सवाल होंगे।
पुलिस से जवाब मांगा जाएगा।
विपक्ष से भी जिम्मेदारी की अपेक्षा होगी।
प्रदर्शनकारियों से भी कानून के सम्मान की उम्मीद होगी।
और मीडिया से भी निष्पक्षता, तथ्य और संदर्भ की।
सुप्रीम कोर्ट की प्रस्तावित हाई-पावर्ड कमेटी की जांच का असली मायना तभी निकलेगा, जब उसकी नजर केवल एक पक्ष पर नहीं, बल्कि पूरे घटनाक्रम पर हो।
क्योंकि लोकतंत्र का मतलब यह नहीं कि हर पक्ष को केवल अधिकार मिले।
लोकतंत्र का असली अर्थ है—अधिकार के साथ जिम्मेदारी, स्वतंत्रता के साथ मर्यादा और शक्ति के साथ जवाबदेही।
जंतर-मंतर की जांच अगर इन चारों बातों को स्थापित कर पाती है, और हर उस व्यक्ति या संस्था के खिलाफ कार्रवाई की सिफारिश करती है जिसने अपनी निर्धारित सीमा पार की, तो यह केवल एक विवाद का समाधान नहीं होगा।
यह आने वाले हर आंदोलन, हर पुलिस कार्रवाई, हर राजनीतिक हस्तक्षेप और हर मीडिया कवरेज के लिए एक महत्वपूर्ण लोकतांत्रिक मर्यादा तय करने वाली मिसाल बन सकती है।
आखिर सवाल यह नहीं कि कौन सत्ता में है और कौन विपक्ष में।
सवाल यह है कि जब लोकतंत्र की सीमा टूटे, तो कानून किसके खिलाफ खड़ा होगा—और क्या वह सबके लिए समान होगा?
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