किसान फिर सड़क पर हैं… और फिर रास्ते बदल गए हैं। चंडीगढ़ की ओर जाने वाला आम आदमी इस दुविधा में घर से निकल रहा है कि आज किस रास्ते से मंजिल तक पहुंचा जाए। कहीं बैरिकेडिंग है, कहीं ट्रैफिक डायवर्ट है और कहीं किसानों के धरने की वजह से रास्ता बदलने की सलाह दी जा रही है।
दूसरी तरफ सड़क पर बैठे किसान अपनी मांगों को लेकर सरकार की तरफ देख रहे हैं। एक ही तस्वीर के दो पहलू हैं—एक तरफ अपनी फसल, आय और भविष्य को लेकर चिंतित किसान है, तो दूसरी तरफ रोजमर्रा के काम से निकलने वाला वह आम नागरिक है जो फिर पूछ रहा है कि आखिर कब तक उसे यूँ ही…?
पंजाब में किसान आंदोलन कोई नई तस्वीर नहीं है। पिछले कुछ वर्षों में किसानों के मुद्दे बार-बार सड़कों पर आए हैं और अब एक बार फिर संयुक्त किसान मोर्चा ने 1 से 7 सितंबर तक चंडीगढ़-मोहाली सीमा पर डेरा डाल दिया है। इस बार मुद्दों की सूची भी छोटी नहीं है—कानूनी गारंटी वाला एमएसपी, किसानों की कर्जमाफी, गन्ने का दाम, पानी के अधिकार और भारत-अमेरिका व्यापार समझौते का विरोध जैसे मुद्दे आंदोलन के केंद्र में हैं।
किसानों की मांगों को केवल राजनीति कहकर खारिज करना सही नहीं होगा। एमएसपी को लेकर किसानों की चिंता वास्तविक है। पंजाब की कृषि व्यवस्था लंबे समय से गेहूं और धान की खरीद व्यवस्था पर काफी निर्भर रही है। ऐसे में किसान जब दूसरी फसल की ओर जाने की बात करता है तो उसके सामने सिर्फ फसल बदलने का सवाल नहीं होता, बल्कि यह भी होता है कि नई फसल बिकेगी कहां, किस दाम पर बिकेगी और अगर बाजार में कीमत गिर गई तो नुकसान कौन उठाएगा।
यहीं से पंजाब की कृषि की सबसे बड़ी उलझन सामने आती है। एक तरफ लगातार यह कहा जा रहा है कि धान की खेती भूजल पर भारी दबाव डाल रही है और पंजाब को फसल विविधीकरण की ओर बढ़ना चाहिए। दूसरी तरफ गेहूं-धान में किसान को खरीद का अपेक्षाकृत निश्चित ढांचा दिखाई देता है। सरकार भी फसल विविधीकरण की योजनाएं चला रही है, लेकिन केवल यह कहना कि किसान धान छोड़ दे, पर्याप्त नहीं है। किसान को वैकल्पिक फसल के लिए बाजार, कीमत और जोखिम से सुरक्षा भी चाहिए। पंजाब कृषि विश्वविद्यालय सहित कृषि विशेषज्ञ लंबे समय से यह बात कहते रहे हैं कि लाभकारी मूल्य और बाजार की गारंटी के बिना बड़े पैमाने पर विविधीकरण आसान नहीं होगा।
लेकिन यहां किसान संगठनों से भी जनता का एक सवाल पूछना जरूरी है कि अगर पंजाब का भूजल सचमुच संकट में है और आने वाली पीढ़ियों के लिए खेती बचानी है, तो क्या आंदोलन का अगला चरण केवल सरकार से हर फसल पर एमएसपी की कानूनी गारंटी मांगने तक सीमित रहेगा, या किसान संगठनों की ओर से भी यह स्पष्ट रोडमैप आएगा कि पंजाब में किन फसलों की ओर बढ़ना चाहिए और उसके लिए व्यवहारिक मॉडल क्या होगा? किसान को अपनी फसल चुनने की स्वतंत्रता मिलनी चाहिए, लेकिन हर फसल की कीमत और पूरी खरीद की जिम्मेदारी हमेशा शासन ही उठाए—यह व्यवस्था आर्थिक रूप से कितनी टिकाऊ होगी, इस पर भी गंभीर बहस जरूरी है।
इसी तरह भारत-अमेरिका व्यापार समझौते को लेकर किसानों की आशंका को भी न तो पूरी तरह बेबुनियाद कहा जा सकता है और न ही यह कहना सही होगा कि अमेरिका के लिए भारतीय कृषि बाजार पूरी तरह खोल दिया गया है। फरवरी 2026 में घोषित अंतरिम व्यापार ढांचे में अमेरिका से कुछ कृषि और खाद्य उत्पादों के लिए बाजार पहुंच बढ़ाने की व्यवस्था हुई है, जिनमें पशु आहार के कुछ उत्पाद, नट्स, कुछ फल और सोयाबीन तेल जैसे उत्पाद शामिल हैं। दूसरी ओर सरकार का कहना है कि गेहूं, चावल, मक्का, डेयरी और कई अन्य संवेदनशील कृषि क्षेत्रों को संरक्षण दिया गया है। इसलिए असली बहस नारे के स्तर पर नहीं, बल्कि यह देखने पर होनी चाहिए कि किस उत्पाद पर कितना आयात शुल्क घटा, कितनी मात्रा में आयात संभव है और उसका भारतीय किसान पर वास्तविक प्रभाव क्या होगा।
किसानों का यह डर जरूर समझ में आता है कि अगर विदेश से सस्ता माल भारतीय बाजार में आता है तो घरेलू कीमतों पर दबाव पड़ सकता है। लेकिन इस डर को हर कृषि उत्पाद पर लागू कर देना भी तथ्यात्मक रूप से सही नहीं होगा। भारत-अमेरिका व्यापार व्यवस्था में कई उत्पादों को अलग-अलग श्रेणियों में रखा गया है और कुछ संवेदनशील उत्पादों को बाहर रखने या सीमित व्यवस्था करने की बात कही गई है। इसलिए किसान संगठनों की जिम्मेदारी है कि वे जनता के सामने ठोस आंकड़ों के साथ बताएं कि किस प्रावधान से पंजाब के किस किसान और किस फसल को कितना नुकसान हो सकता है। इससे आंदोलन की विश्वसनीयता भी बढ़ेगी।
दूसरी तरफ सरकार की जिम्मेदारी इससे कम नहीं है। अगर वह चाहती है कि किसान धान का रकबा घटाए और पानी बचाए, तो उसे केवल अपील या योजना से आगे बढ़कर वैकल्पिक फसलों के लिए मजबूत खरीद और बाजार व्यवस्था बनानी होगी। किसान जोखिम लेकर प्रयोग तभी करेगा जब उसे यह भरोसा हो कि बाजार में कीमत गिरने पर उसकी पूरी अर्थव्यवस्था नहीं डूब जाएगी। आखिरकार किसान भी अपनी आय और परिवार का भविष्य देखकर फैसला करता है।
इस पूरे विवाद का एक और पहलू आम जनता से जुड़ा है, जिसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। किसान अपनी मांगों के लिए लोकतांत्रिक तरीके से आंदोलन करें, यह उनका अधिकार है। लेकिन जब आंदोलन का असर सड़कों, यातायात, एयरपोर्ट जाने वाले यात्रियों, कारोबार और रोजमर्रा की जिंदगी पर पड़ता है तो उस असुविधा को उठाना भी जनता की मजबूरी बन जाता है। मौजूदा चंडीगढ़-मोहाली आंदोलन को लेकर भी यातायात में बदलाव और प्रतिबंध लागू किए गए हैं।
यही वह जगह है जहां आंदोलन और जनता के बीच संतुलन जरूरी हो जाता है। किसान की परेशानी वास्तविक है, लेकिन आम नागरिक की परेशानी भी काल्पनिक नहीं। किसान को सड़क पर उतरने का अधिकार है तो आम नागरिक को अपने काम, इलाज, यात्रा और कारोबार तक पहुंचने का अधिकार भी है। इसलिए सरकार को भी ऐसा रास्ता निकालना चाहिए जिसमें प्रदर्शन का लोकतांत्रिक अधिकार सुरक्षित रहे और आम जनता को अनावश्यक परेशानी कम से कम हो।
किसान संगठनों का राजनीतिक दलों से संवाद या समर्थन लेना अपने आप में उनके मुद्दों को झूठा नहीं बना देता। असली कसौटी तथ्य हैं—किसान की आय, फसल की लागत, पानी की स्थिति, सरकारी खरीद, बाजार की मांग और किसी व्यापार समझौते का वास्तविक असर।
पंजाब के सामने आज शायद सबसे बड़ी जरूरत एक और लंबे आंदोलन की नहीं, बल्कि एक टिकाऊ कृषि समझौते की है—ऐसा समझौता जिसमें किसान की आय सुरक्षित हो, भूजल बचे, सरकार पर अनिश्चित खरीद का बोझ अनंत तक न बढ़े और उपभोक्ता को भी महंगाई का सामना न करना पड़े। इसके लिए सरकार को स्पष्ट रोडमैप देना होगा और किसान संगठनों को भी यह बताना होगा कि वे पंजाब की खेती को अगले दस-बीस साल में किस दिशा में ले जाना चाहते हैं।
क्योंकि असली सवाल अब सिर्फ यह नहीं है कि किसान क्या मांग रहा है और सरकार क्या दे रही है। असली सवाल यह है कि पंजाब की खेती को ऐसा रास्ता कौन देगा, जिसमें किसान भी बचे, पानी भी बचे, बाजार भी बचे और आने वाली पीढ़ियों का भविष्य भी।
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