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🔴 यहाँ क्लिक करके D-News Watch के मुख्य पृष्ठ (Home) पर जाएँहर संस्था झूठी, हर फैसला साजिश और हर असहमति लोकतंत्र की हत्या—क्या सत्ता पाने की राजनीति अब इसी फार्मूले पर चलेगी?
दिल्ली में मंगलवार को जो हुआ, वह सिर्फ एक राजनीतिक प्रदर्शन नहीं था। यह उस राजनीति की एक और तस्वीर थी जिसमें चुनाव आयोग पर सवाल हैं, सरकार पर सवाल हैं, पुलिस पर सवाल हैं और अंततः पूरी व्यवस्था की विश्वसनीयता पर सवाल खड़ा करने की कोशिश है। राहुल गांधी और INDIA bloc के नेताओं ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे और SIR के विरोध में संसद से निर्वाचन आयोग तक मार्च किया। पुलिस ने बैरिकेड लगाकर रास्ता रोका और कई नेताओं को हिरासत में लिया। राहुल गांधी का बैरिकेड पर चढ़ना भी इस प्रदर्शन की सबसे चर्चित तस्वीरों में रहा। विरोध लोकतंत्र का अधिकार है। चुनाव आयोग से सवाल पूछना भी अधिकार है। लेकिन यहां से एक ज्यादा बड़ा सवाल निकलता है—क्या लोकतंत्र की रक्षा का अर्थ अब यह रह गया है कि जिस संस्था का फैसला अपने पक्ष में न आए, उसे ही लोकतंत्र-विरोधी घोषित कर दिया जाए? अगर चुनाव आयोग गलत है तो प्रमाण रखिए, अगर मतदाता सूची में गड़बड़ी है तो आंकड़े रखिए, अगर SIR में खामी है तो अदालत जाइए, संसद में लड़िए, जनता के बीच जाइए। लेकिन हर संवैधानिक संस्था को पहले ही “झूठा” घोषित कर देने से क्या लोकतंत्र मजबूत होगा? आज चुनाव आयोग पर सवाल है, कल सुप्रीम कोर्ट के किसी फैसले पर सवाल उठेगा, परसों मीडिया पर, उसके बाद पुलिस पर और फिर संसद पर। धीरे-धीरे जनता के सामने यह तस्वीर खड़ी कर दी जाएगी कि सही केवल वही है जो विपक्ष कह रहा है और बाकी पूरा लोकतांत्रिक ढांचा गलत है। यही वह जगह है जहां राजनीति और राजनीतिक प्रचार के बीच की रेखा धुंधली होने लगती है।
इतिहास को केवल अपनी सुविधा से मत पढ़ाइए
आज संविधान की किताब हाथ में लेकर सड़क पर खड़े होना आसान है, लेकिन संविधान की पूरी कहानी पढ़ना कठिन है। क्योंकि इतिहास केवल वह नहीं है जिसमें आपके राजनीतिक विरोधी गलत साबित होते हैं; इतिहास वह भी है जिसमें आपके अपने राजनीतिक परिवार से कठिन सवाल पूछे जाते हैं। 1966 में दिल्ली में गौ-रक्षा के मुद्दे पर संसद की ओर हुए बड़े प्रदर्शन के दौरान हिंसा और पुलिस फायरिंग हुई। उपलब्ध संसदीय रिकॉर्ड के अनुसार सात प्रदर्शनकारी और एक पुलिसकर्मी मारे गए। उस समय इंदिरा गांधी प्रधानमंत्री थीं और घटना के बाद तत्कालीन गृह मंत्री गुलजारीलाल नंदा को इस्तीफा देना पड़ा। यानी संसद के बाहर आंदोलन, हिंसा और पुलिस कार्रवाई का इतिहास आज का नहीं है। इसी देश ने 1990 में अयोध्या में कारसेवकों पर पुलिस फायरिंग भी देखी। उस समय उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव थे और केंद्र को भेजी गई सरकारी रिपोर्ट में 30 अक्टूबर और 2 नवंबर की घटनाओं में 16 मौतों का उल्लेख है। आज उन्हीं राजनीतिक परंपराओं से निकली ताकतें लोकतंत्र की रक्षा का सबसे ऊंचा दावा करती हैं। दावा कीजिए, पूरा अधिकार है, लेकिन फिर इतिहास का आईना भी सामने रखिए। क्योंकि लोकतंत्र का सबसे पहला सिद्धांत यही है कि कसौटी सत्ता में रहते हुए भी वही हो और विपक्ष में रहते हुए भी वही।
सत्ता सड़क के टकराव से नहीं मिलती
राहुल गांधी हों, अखिलेश यादव हों या INDIA bloc का कोई और नेता—जनता ने उन्हें विपक्ष में बैठाया है। विपक्ष में बैठना लोकतंत्र की हार नहीं है। लेकिन विपक्ष में बैठकर यह मान लेना कि जनता ने हमें सत्ता नहीं दी, इसलिए व्यवस्था ही गलत है, लोकतांत्रिक राजनीति का रास्ता नहीं हो सकता। जनता इतनी भोली नहीं है। यह 1980 या 1990 का भारत नहीं है। आज मोबाइल फोन के एक क्लिक पर पुराना वीडियो सामने आ जाता है, संसद की पुरानी कार्यवाही मिल जाती है, पुराने बयान मिल जाते हैं, सरकारी रिकॉर्ड मिल जाते हैं और अदालत के फैसले मिल जाते हैं। आज किसी अखबार में कुछ छपवा देने भर से इतिहास नहीं बदलता। आज जनता खुद फैक्ट-चेक करती है। राजनीतिक दलों को यह समझना होगा कि जनता केवल आज का भाषण सुनकर कल का इतिहास भूल जाने वाली नहीं है। वह पूछेगी—आपने तब क्या कहा था? आपने तब क्या किया था? आप सत्ता में थे तो आपकी लोकतंत्र की परिभाषा क्या थी और आज विपक्ष में हैं तो वही परिभाषा कैसे बदल गई?
“गोदी मीडिया” कह देने से मीडिया झूठा नहीं हो जाता
मीडिया की आलोचना कीजिए, पूरी ताकत से कीजिए। अगर कोई चैनल पक्षपात करता है तो उसके प्रमाण दीजिए। अगर कोई पत्रकार गलत तथ्य देता है तो उसका खंडन कीजिए। लेकिन पूरे मीडिया को एक ही शब्द में खारिज कर देना क्या पत्रकारिता की आलोचना है या जनता की समझ का अपमान? किसी चैनल से असहमति हो सकती है, किसी अखबार की विचारधारा अलग हो सकती है और किसी पत्रकार की रिपोर्ट पर सवाल उठ सकता है। लेकिन लोकतंत्र में मीडिया की भूमिका को ही सामूहिक रूप से अविश्वसनीय बना देना खतरनाक खेल है। पत्रकारिता का काम किसी पार्टी को सही साबित करना नहीं, बल्कि दावे की जांच करना है। अगर मीडिया पर सवाल है तो सवाल कीजिए, लेकिन मीडिया को सामूहिक रूप से झूठा घोषित कर देना उतना ही खतरनाक है जितना किसी सरकार को उसके हर फैसले के कारण झूठा मान लेना।
हर संस्था गलत कैसे हो सकती है?
एक क्षण के लिए सोचिए। अगर सरकार गलत है, तो चुनाव आयोग भी गलत; अगर चुनाव आयोग गलत है, तो उसके फैसलों पर अदालत में चुनौती दीजिए; अगर अदालत फैसला दे, तो क्या अदालत भी गलत? अगर मीडिया आपके आरोपों को पूरी तरह स्वीकार न करे, तो क्या मीडिया भी “गोदी”? अगर पुलिस कानून-व्यवस्था बनाए, तो क्या पुलिस भी लोकतंत्र की दुश्मन? और अगर जनता चुनाव में आपको बहुमत न दे, तो क्या जनता भी गलत? फिर सही कौन है? क्या केवल वही नेता सही है जिसे जनता ने सत्ता से बाहर रखा है? यही वह सवाल है जिसे आज की पीढ़ी को पूछना चाहिए। लोकतंत्र में विपक्ष का काम संस्थाओं को खत्म करना नहीं, उन्हें जवाबदेह बनाना है। सरकार का काम विपक्ष को खत्म करना नहीं, उसके सवालों का जवाब देना है। और जनता का काम दोनों की बात सुनकर फैसला करना है। किसी संस्था की आलोचना और संस्था की वैधता को ही नकार देना—इन दोनों के बीच बहुत बड़ा फर्क है। लोकतंत्र की ताकत इसी फर्क को समझने में है।
“जनता ने हमें नहीं चुना” का इलाज जनता नहीं, राजनीति है
राजनीति में सत्ता कोई विरासत में मिली जागीर नहीं। आज आपकी सरकार है, कल किसी और की हो सकती है। आज आप विपक्ष में हैं, कल सत्ता में हो सकते हैं। इसीलिए लोकतंत्र में संस्थाओं की विश्वसनीयता को बचाना किसी एक पार्टी का काम नहीं। जिस दिन चुनाव आयोग की विश्वसनीयता केवल इसलिए स्वीकार या अस्वीकार की जाएगी कि उसने किसके पक्ष में फैसला दिया, उस दिन चुनाव आयोग संस्था नहीं रहेगा—राजनीतिक अखाड़ा बन जाएगा। जिस दिन सुप्रीम कोर्ट का फैसला केवल इसलिए सही या गलत माना जाएगा कि वह किस पार्टी के पक्ष में गया, उस दिन न्यायपालिका भी राजनीतिक खेमों में बांट दी जाएगी। और जिस दिन मीडिया को केवल इसलिए “गोदी” कहा जाएगा कि उसने आपकी कहानी नहीं चलाई, उस दिन जनता के पास सूचना नहीं, केवल प्रचार बचेगा। क्या हम सचमुच ऐसा भारत चाहते हैं? सत्ता हासिल करने का लोकतांत्रिक रास्ता जनता के बीच जाना है, चुनाव लड़ना है, भरोसा जीतना है और बहुमत हासिल करना है। बैरिकेड तोड़ना राजनीतिक तस्वीर बना सकता है, लेकिन उससे जनादेश नहीं बनता।
जनता सब देख रही है
आज की पीढ़ी को कोई यह मत समझाइए कि उसे इतिहास नहीं पता। हो सकता है उसे 1966 का पूरा घटनाक्रम न पता हो, हो सकता है उसे 1990 की अयोध्या की पूरी कहानी न पता हो, लेकिन वह पांच मिनट में खोज सकती है। पुरानी संसद की कार्यवाही देख सकती है, पुराने अखबार पढ़ सकती है, पुराने बयान सुन सकती है और फिर आज के बयान से तुलना कर सकती है। यही AI और डिजिटल युग की असली ताकत है। अब इतिहास किसी एक राजनीतिक दल की प्रेस रिलीज से नहीं लिखा जाएगा। अब जनता पूछेगी, अब जनता तुलना करेगी और अब जनता कहेगी—पहले आपने क्या कहा था? और यहीं से राजनीति का असली इम्तिहान शुरू होगा। आज कोई नेता यदि किसी संस्था को कटघरे में खड़ा करता है तो जनता यह भी देखेगी कि कल उसी नेता या उसके राजनीतिक परिवार ने उस संस्था के साथ कैसा व्यवहार किया था। डिजिटल युग ने राजनीतिक स्मृति को बदल दिया है। पुरानी बातें अब फाइलों में बंद नहीं रहतीं; वे कुछ सेकंड में सामने आ जाती हैं। इसलिए आज की राजनीति में केवल भाषण की धार काफी नहीं है, उसके पीछे तथ्य और निरंतरता भी चाहिए।
सवाल सरकार से तो विपक्ष से भी
सरकार से सवाल है—अगर चुनाव व्यवस्था को लेकर गंभीर आरोप हैं तो पारदर्शी जवाब दीजिए। केवल विपक्ष को दोषी बताकर बात खत्म मत कीजिए। विपक्ष से सवाल है—अगर आपके पास प्रमाण हैं तो देश के सामने रखिए, संसद में रखिए, अदालत में रखिए, जनता के बीच रखिए; लेकिन हर संस्था को अविश्वसनीय घोषित करके लोकतंत्र की रक्षा नहीं की जा सकती। और जनता से सवाल है—क्या हम ऐसी राजनीति स्वीकार करेंगे जिसमें चुनाव आयोग गलत हो सकता है, अदालत गलत हो सकती है, मीडिया गलत हो सकता है, पुलिस गलत हो सकती है, सरकार गलत हो सकती है—लेकिन नेता कभी गलत नहीं हो सकता? अगर जवाब नहीं है, तो फिर लोकतंत्र को बचाने की शुरुआत किसी आंदोलन से नहीं, राजनीतिक ईमानदारी से करनी होगी। क्योंकि सत्ता सड़क पर बैरिकेड तोड़कर नहीं मिलती। सत्ता जनता देती है। और जनता को अब भाषण नहीं, हिसाब चाहिए—इतिहास का भी, वर्तमान का भी और लोकतंत्र की उस परिभाषा का भी, जिसे हर पार्टी सत्ता में आते ही बदल देती है। लोकतंत्र में असली ताकत बैरिकेड के इस पार या उस पार खड़े होने में नहीं, बल्कि जनता का भरोसा जीतने में है।
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