“गुरु ब्रह्मा, गुरु विष्णु, गुरु देवो महेश्वरः।
गुरु साक्षात् परब्रह्म, तस्मै श्री गुरवे नमः।।”
भारतीय संस्कृति में गुरु का स्थान सदैव सर्वोच्च माना गया है। गुरु पूर्णिमा केवल एक धार्मिक उत्सव नहीं, बल्कि ज्ञान, संस्कार, आत्मचिंतन और कृतज्ञता का पावन पर्व है। यह वह दिन है जब हम उन सभी गुरुओं को नमन करते हैं जिन्होंने हमारे जीवन को दिशा दी, अज्ञान के अंधकार से निकालकर ज्ञान का प्रकाश दिखाया और हमें बेहतर मनुष्य बनने की प्रेरणा दी।
आषाढ़ मास की पूर्णिमा को मनाई जाने वाली गुरु पूर्णिमा का संबंध महर्षि वेदव्यास से है, जिन्हें भारतीय ज्ञान परंपरा का महान स्तंभ माना जाता है। उन्होंने वेदों का संकलन किया, महाभारत की रचना की तथा अनेक पुराणों के माध्यम से सनातन ज्ञान को जन-जन तक पहुँचाया। इसी कारण इस दिन को व्यास पूर्णिमा भी कहा जाता है।
भारतीय संत परंपरा में गुरु के महत्व को संत कबीरदास ने अपने प्रसिद्ध दोहे में अत्यंत सरल, किंतु गहन शब्दों में व्यक्त किया है—
“गुरु गोविंद दोउ खड़े, काके लागूं पाय।
बलिहारी गुरु आपने, गोविंद दियो मिलाय।।”
इस दोहे का भावार्थ यह है कि यदि गुरु और भगवान दोनों एक साथ सामने खड़े हों, तो सबसे पहले गुरु के चरण स्पर्श करने चाहिए, क्योंकि गुरु ही वह माध्यम हैं जो मनुष्य को ईश्वर की अनुभूति तक पहुँचाते हैं। यह केवल आध्यात्मिक संदेश नहीं, बल्कि जीवन का भी सत्य है। किसी भी क्षेत्र में सफलता का मार्ग एक योग्य गुरु ही प्रशस्त करता है।
आज का समय तकनीक और कृत्रिम बुद्धिमत्ता का युग है। मोबाइल फोन और इंटरनेट के माध्यम से जानकारी पल भर में उपलब्ध हो जाती है, लेकिन जानकारी और ज्ञान समान नहीं होते। जानकारी केवल तथ्य देती है, जबकि ज्ञान सही और गलत का विवेक, चरित्र की मजबूती, संयम, विनम्रता और जीवन जीने की कला सिखाता है। यही कार्य गुरु करते हैं।
गुरु केवल विद्यालय या महाविद्यालय में पढ़ाने वाला शिक्षक ही नहीं होता। माता-पिता हमारे प्रथम गुरु हैं, जीवन के अनुभव हमारे गुरु हैं, प्रकृति हमें धैर्य और संतुलन सिखाती है, और समाज में मिलने वाला प्रत्येक वह व्यक्ति जो हमें सही दिशा दिखाए, किसी न किसी रूप में हमारा गुरु है। सच्चा गुरु केवल सफलता का मार्ग नहीं बताता, बल्कि असफलता में भी साहस बनाए रखना सिखाता है।
आज जब समाज भौतिक उपलब्धियों की दौड़ में आगे बढ़ रहा है, तब गुरु पूर्णिमा हमें यह स्मरण कराती है कि जीवन का वास्तविक वैभव धन, पद और प्रसिद्धि से कहीं अधिक श्रेष्ठ चरित्र, नैतिकता और मानवीय मूल्यों में है। यदि हमारे भीतर सत्य, सेवा, करुणा, अनुशासन और विनम्रता जैसे गुण हैं, तो उनमें हमारे गुरुओं की अमूल्य छाप अवश्य होती है।
गुरु पूर्णिमा केवल पुष्प अर्पित करने या शुभकामनाएँ देने का अवसर नहीं, बल्कि आत्ममंथन का भी दिन है। यह संकल्प लेने का दिन है कि हम अपने गुरुजनों की शिक्षाओं को जीवन में उतारेंगे, ज्ञान का सम्मान करेंगे और आने वाली पीढ़ी को भी संस्कारों की यह अमूल्य धरोहर सौंपेंगे।
गुरु का सम्मान केवल एक दिन का उत्सव नहीं, बल्कि जीवन भर निभाया जाने वाला संस्कार है। यही गुरु पूर्णिमा का वास्तविक संदेश है।
डी-न्यूज़ वाच के सभी पाठकों को गुरु पूर्णिमा की हार्दिक शुभकामनायें।
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