आम धारणा यही है कि 2024 के लोकसभा चुनाव में अलग-अलग लड़े BJP-SAD के वोट अगर एक साथ होते तो कई विधानसभा क्षेत्रों में तस्वीर बदल जाती—क्या यही गणित 2027 की नई राजनीतिक बिसात का आधार बनेगा…
डी न्यूज वाच | कवर स्टोरी
पंजाब की राजनीति में इन दिनों एक सवाल फिर सिर उठा रहा है, जिसका जवाब आने वाले विधानसभा चुनाव की पूरी तस्वीर बदल सकता है।
वह सवाल है कि क्या शिरोमणि अकाली दल और भारतीय जनता पार्टी एक बार फिर एक ही चुनावी मंच पर आने वाले हैं?
हालांकि, आधिकारिक घोषणा नहीं हुई है, लेकिन दोनों दलों के नेताओं की गतिविधियां, बातचीत के संकेत और सीटों के बंटवारे को लेकर चल रही चर्चाओं ने इस सवाल को महज अटकल नहीं रहने दिया है।
यह भी चर्चा है कि गठबंधन के बाद सुखबीर बादल को केंद्रीय मंत्री पद की पेशकश हो सकती है, जबकि सीटों के बंटवारे में BJP की बड़ी हिस्सेदारी की मांग चर्चा में है।
यानी कहानी अब सिर्फ यह नहीं रह गई कि “BJP और अकाली दल फिर साथ आएंगे या नहीं?”
असल सवाल इससे आगे निकल चुका है—
“अगर साथ आ गए तो पंजाब की 117 सीटों की राजनीति में क्या बदलेगा?”
और इस सवाल का जवाब तलाशने के लिए सबसे पहले हमें पीछे मुड़कर 2024 के लोकसभा चुनाव को देखना होगा।
2024 में अलग-अलग लड़े, लेकिन वोटों ने क्या संकेत दिया?
2024 में दोनों अलग थे, लेकिन वोट अलग-अलग होकर भी क्या संदेश दे गए?
2024 के लोकसभा चुनाव में BJP और SAD ने अलग-अलग चुनाव लड़ा था। नतीजा सामने आया तो BJP को पंजाब में 18.56 प्रतिशत वोट मिले, लेकिन पार्टी एक भी लोकसभा सीट नहीं जीत सकी।
दूसरी तरफ SAD को 13.42 प्रतिशत वोट मिले और वह केवल बठिंडा सीट ही जीत सकी।
यानी दोनों को अलग-अलग मिले वोटों को जोड़ दें तो आंकड़ा लगभग 31.98 प्रतिशत बैठता है।
यहीं से 2027 के चुनाव का पहला बड़ा सवाल पैदा होता है—
क्या 31.98 प्रतिशत केवल कागज का आंकड़ा है या इसके भीतर कोई ऐसा चुनावी आधार छिपा है जो गठबंधन होने पर जमीन पर भी असर डाल सकता है?
क्योंकि लोकसभा चुनाव के आंकड़े विधानसभा चुनाव का सीधा परिणाम नहीं बताते। लेकिन वे राजनीतिक संकेत जरूर देते हैं।
बठिंडा अर्बन : एक सीट, जो पूरा गणित समझाती है
एक सीट का उदाहरण पूरे खेल को समझने के लिए काफी है।
2024 में बठिंडा अर्बन विधानसभा क्षेत्र में BJP को 36,287 और SAD को 35,769 वोट मिले थे।
अलग-अलग लड़ते हुए BJP पहले और SAD दूसरे स्थान पर रहा।
दोनों के वोट जोड़ दें तो आंकड़ा 72 हजार से ऊपर चला जाता है।
दूसरी तरफ AAP को 32,780 वोट मिले थे।
अब जरा कल्पना कीजिए—
अगर उस दिन BJP और SAD एक उम्मीदवार के पीछे खड़े होते तो क्या मुकाबला वही रहता?
निश्चित रूप से यह नहीं कहा जा सकता कि सारे वोट एक-दूसरे को ट्रांसफर हो जाते। लेकिन इतना जरूर कहा जा सकता है कि मुकाबले का गणित पूरी तरह बदल जाता।
और यही बात बठिंडा की अकेली सीट तक सीमित नहीं है।
आंकड़ों में एक चीज साफ दिखाई देती है—SAD के पास ग्रामीण आधार है और BJP कुछ इलाकों में अपना अलग प्रभाव रखती है।
अगर दोनों आधार किसी एक चुनावी उम्मीदवार के पीछे खड़े होते हैं तो मुकाबले का स्वरूप बदलना स्वाभाविक है।
लेकिन यहां फिर वही सवाल—
क्या दोनों के वोट वास्तव में एक-दूसरे में ट्रांसफर होंगे?
यही 2027 की सबसे बड़ी पहेली होगी।
BJP के लिए पंजाब अब 2019 वाला पंजाब नहीं
इस गठबंधन की बातचीत को समझने के लिए BJP की बदली हुई स्थिति को भी देखना होगा।
2019 में पंजाब में BJP का वोट शेयर 9.63 प्रतिशत था।
लेकिन जब 2024 में BJP अकेले सभी 13 लोकसभा सीटों पर उतरी तो उसका वोट शेयर बढ़कर 18.56 प्रतिशत हो गया।
यानी पांच साल में BJP ने पंजाब में अपना चुनावी आधार काफी बढ़ाया।
यही कारण है कि इस बार अगर गठबंधन की बातचीत हो रही है तो BJP पहले वाला सीट बंटवारा स्वीकार करने की स्थिति में शायद खुद को नहीं देखती।
चर्चा 50 से ज्यादा सीटों की मांग तक पहुंच रही है।
दूसरी तरफ अकाली दल के लिए सवाल यह है कि अगर BJP को इतनी बड़ी हिस्सेदारी दी जाती है तो फिर 117 सीटों वाले पंजाब में SAD की भूमिका क्या रह जाएगी?
यहीं से बातचीत का असली पेच निकलता है—
गठबंधन होगा तो कौन होगा ‘बड़ा भाई’?
पुराने गठबंधन का समीकरण अब बदल चुका है
पुराने गठबंधन में तस्वीर काफी स्पष्ट थी।
अकाली दल पंजाब की राजनीति में बड़ा खिलाड़ी था और BJP सहयोगी की भूमिका में।
लेकिन 2024 ने राजनीतिक समीकरण बदल दिए।
BJP का वोट शेयर SAD से करीब पांच प्रतिशत ज्यादा रहा।
इसलिए BJP अब यह कह सकती है—
“हमारा अपना वोट बैंक बन चुका है, हमें पुराने फार्मूले में क्यों बांधा जाए?”
लेकिन SAD का सवाल भी उतनी ही दृढ़ता से महत्वपूर्ण है—
“पंजाब की ग्रामीण राजनीति में हमारी मौजूदगी और संगठन को नजरअंदाज करके क्या BJP अकेले वही परिणाम दे सकती है?”
यानी दोनों को एक-दूसरे की जरूरत है और शायद यही कारण है कि गठबंधन की चर्चा इतनी तेजी से आगे बढ़ रही है।
BJP + SAD = अपने आप जीत नहीं
लेकिन 2024 का गणित एक और बड़ी कहानी बताता है।
कई जगह दोनों को जोड़ने के बाद भी AAP, कांग्रेस या किसी स्वतंत्र उम्मीदवार से वे पीछे रह जाते।
उदाहरण के लिए खडूर साहिब के कई विधानसभा क्षेत्रों में BJP और SAD के वोट जोड़ने के बावजूद अमृतपाल सिंह की बढ़त इतनी बड़ी थी कि गठबंधन भी उसे पार नहीं कर पाता।
यानी—
BJP + SAD = अपने आप जीत नहीं।
और यही बात इस पूरे विश्लेषण को दिलचस्प बनाती है।
कांग्रेस के लिए खतरा क्या है?
कांग्रेस के सामने सबसे बड़ा खतरा यह नहीं होगा कि BJP और SAD का वोट प्रतिशत जोड़कर कोई जादुई आंकड़ा तैयार हो जाएगा।
खतरा यह होगा कि विपक्षी वोटों का बिखराव कम हो सकता है।
2024 में कांग्रेस पंजाब में 26.30 प्रतिशत वोट के साथ सबसे ज्यादा लोकसभा सीटें जीतने वाली पार्टी बनी और सात सीटें जीतीं।
AAP को 26.02 प्रतिशत वोट मिले और उसे तीन सीटें मिलीं।
अगर 2027 में BJP और SAD एक साथ मैदान में उतरते हैं तो कांग्रेस के सामने कई सीटों पर यह सवाल होगा कि वह किस सामाजिक और राजनीतिक समीकरण के सहारे अपना आधार बचाएगी।
और सबसे महत्वपूर्ण—
क्या कांग्रेस AAP से अलग लड़कर BJP-SAD के सामने अपना फायदा उठा पाएगी या विपक्ष के बंटे वोटों का लाभ इस बार उसे नहीं मिलेगा?
AAP के लिए मामला और भी गंभीर क्यों हो सकता है?
2022 में AAP ने 117 में से 92 सीटें जीतकर पंजाब की राजनीति को ही बदल दिया था।
लेकिन 2024 के लोकसभा चुनाव में तस्वीर बिल्कुल अलग थी।
AAP 26.02 प्रतिशत वोट के बावजूद केवल तीन लोकसभा सीटें जीत सकी।
कांग्रेस ने लगभग समान वोट प्रतिशत के साथ सात सीटें जीत लीं।
इसका मतलब साफ है कि वोट प्रतिशत और सीटों के बीच का संबंध पंजाब में बहुत सीधा नहीं है।
अगर BJP-SAD का गठबंधन बनता है तो AAP के सामने चुनौती यह होगी कि वह 2022 जैसी व्यापक सामाजिक और राजनीतिक पकड़ दोबारा बना पाए।
सबसे बड़ा सवाल—क्या SAD का वोट BJP को मिलेगा और BJP का वोट SAD को?
यही वह सवाल है जिसे शायद राजनीतिक दल भी सबसे ज्यादा गंभीरता से देख रहे होंगे।
क्योंकि गठबंधन नेताओं के मंच साझा करने से बन सकता है।
लेकिन वोटर के मन में गठबंधन बनने में समय लगता है।
2020 के कृषि कानूनों के बाद SAD और BJP अलग हुए थे। उसके बाद दोनों दलों ने एक-दूसरे से अलग राजनीतिक रास्ता अपनाया।
अब अगर फिर साथ आते हैं तो क्या पुराने मतदाता भी उसी तेजी से साथ आ जाएंगे?
क्या वह SAD उम्मीदवार को उसी तरह वोट देगा जैसे BJP उम्मीदवार को देता?
क्या BJP समर्थक ग्रामीण सीट पर SAD के उम्मीदवार के पक्ष में उसी उत्साह से मतदान करेगा?
इन सवालों का जवाब किसी पार्टी की प्रेस कॉन्फ्रेंस या चुनावी सभा में नहीं मिलेगा।
इसका जवाब मिलेगा—बूथ पर।
और यहीं से 2027 की असली कहानी शुरू होती है
मान लीजिए गठबंधन हो गया।
सीटों का बंटवारा भी हो गया।
मान लीजिए BJP को 50 के आसपास सीटें मिल गईं और SAD बाकी सीटों पर उतर गया।
तब अगला सवाल होगा—
कौन सी सीट BJP लड़ेगी और कौन सी SAD?
क्योंकि केवल सीटों की संख्या महत्वपूर्ण नहीं है।
सीटों का भूगोल उससे ज्यादा महत्वपूर्ण है।
BJP कहां मजबूत है?
SAD कहां मजबूत है?
कहां दोनों के वोट एक-दूसरे को मजबूत करते हैं?
कहां दोनों के समर्थकों के बीच वैचारिक या स्थानीय दूरी है?
और सबसे महत्वपूर्ण—
कहां कांग्रेस या AAP इस गठबंधन को तोड़ने की स्थिति में हैं?
2024 ने एक नक्शा छोड़ा है, 2027 उसे बदल सकता है
2024 के लोकसभा चुनाव में 117 विधानसभा क्षेत्रों में कांग्रेस 37, AAP 33, BJP 23, स्वतंत्र उम्मीदवार 15 और SAD 9 क्षेत्रों में सबसे आगे रहे।
यह आंकड़ा अपने आप में बहुत बड़ा संकेत है।
क्योंकि BJP ने लोकसभा की एक भी सीट नहीं जीती, लेकिन विधानसभा क्षेत्रों के स्तर पर वह 23 जगह सबसे आगे थी।
वहीं SAD ने केवल एक लोकसभा सीट जीती, लेकिन वह 9 विधानसभा क्षेत्रों में सबसे आगे था।
अब सवाल यह नहीं कि दोनों ने 2024 में कितनी सीटें जीतीं।
सवाल यह है कि—
अगर 23 BJP-लीड और 9 SAD-लीड वाले क्षेत्रों के पीछे दो अलग-अलग संगठनों की जगह एक ही चुनावी गठबंधन खड़ा होता तो तस्वीर कितनी अलग होती?
और फिर बात सिर्फ इन 32 सीटों की नहीं है।
कई ऐसे क्षेत्र भी हैं जहां BJP और SAD अलग-अलग दूसरे या तीसरे स्थान पर रहे और दोनों के वोट मिलकर मुकाबले को उलटने की क्षमता रखते थे।
यानी गठबंधन की असली ताकत ‘जोड़’ में नहीं, ‘ट्रांसफर’ में होगी।
और यही बात सबसे ज्यादा याद रखने वाली है।
18.56 + 13.42 = 31.98 प्रतिशत—लेकिन चुनाव कैलकुलेटर से नहीं जीते जाते
18.56 + 13.42 = 31.98 प्रतिशत।
कैलकुलेटर पर यह जोड़ एक सेकंड में हो जाएगा।
लेकिन चुनाव में सवाल यह नहीं है कि—
18.56 और 13.42 कितना होता है?
बल्कि सवाल यह है कि—
क्या 18.56 वाला मतदाता 13.42 वाले उम्मीदवार को वोट देगा?
और—
क्या 13.42 वाला मतदाता 18.56 वाले उम्मीदवार के लिए उसी उत्साह से मतदान करेगा?
अगर जवाब हां है तो 2027 में पंजाब का चुनावी गणित सचमुच बदल सकता है।
लेकिन अगर जवाब नहीं है तो गठबंधन का बड़ा आंकड़ा कागज पर ही बड़ा रह सकता है।
और शायद इसी कारण सीटों का पेच इतना महत्वपूर्ण है
सीटों के बंटवारे पर दोनों दलों में कितनी सहमति बनी है, इसका अंतिम जवाब घोषणा के बाद ही मिलेगा।
लेकिन अगर BJP 50-55 सीटों के आसपास की मांग करती है और SAD इससे कम पर राजी होता है तो इसका मतलब सिर्फ टिकटों का बंटवारा नहीं होगा।
यह इस बात का भी संकेत होगा कि—
पंजाब की राजनीति में पुराने ‘बड़े भाई-छोटे भाई’ का समीकरण बदल चुका है।
यानी गठबंधन वही हो सकता है।
झंडे वही हो सकते हैं।
नेता वही हो सकते हैं।
लेकिन सत्ता का संतुलन पहले जैसा नहीं होगा।
D-News Watch के मंच से जनता के सवाल
क्या BJP और अकाली दल का गठबंधन वास्तव में हो चुका है?
क्या महज आधिकारिक रूप से घोषणा बाकी है?
क्या बातचीत गंभीर है?
क्या सीटों का बंटवारा अंतिम पेच है?
क्या गठबंधन होते ही BJP-SAD जीत की स्थिति में आ जाएंगे?
क्या गठबंधन होने पर पंजाब की 117 सीटों का चुनावी गणित बदल जाएगा?
कहानी अभी बाकी है…
2024 ने एक अजीब तस्वीर दिखाई थी—
BJP अलग लड़ी तो वोट बहुत मिले, सीट नहीं मिली।
SAD अलग लड़ा तो अपना आधार बचा, लेकिन विस्तार नहीं हुआ।
अब अगर दोनों फिर एक साथ आते हैं तो सवाल यह नहीं रहेगा कि—
“BJP कितनी मजबूत है?”
या—
“SAD कितना बचा है?”
सवाल होगा—
क्या दो अधूरे चुनावी समीकरण मिलकर एक पूरा समीकरण बना सकते हैं?
और अगर बना—तो अगला सवाल इससे भी बड़ा होगा।
उस समीकरण की कीमत कांग्रेस चुकाएगी या आम आदमी पार्टी?
या फिर पंजाब का मतदाता एक बार फिर दोनों दलों को यह बता देगा कि—
चुनावी गणित कागज पर बनाया जा सकता है, लेकिन सरकार का फैसला अंततः पंजाब की जनता ही करती है।
2027 चुनाव | कहानी अभी बाकी है…
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