अकाली-भाजपा साथ आए तो पंजाब में किसका बिगड़ेगा खेल? AAP की वापसी के सामने सबसे बड़ा सवाल
D-News Watch विश्लेषण | दिग्विन्द्र राणा
पंजाब की राजनीति में 2027 विधानसभा चुनाव से पहले एक पुरानी राजनीतिक तस्वीर फिर उभरती दिखाई दे रही है—शिरोमणि अकाली दल और भाजपा के दोबारा साथ आने की संभावना।
21 अगस्त को अकाली नेता बिक्रम सिंह मजीठिया का यह कहना कि पंजाब के लोग अकाली दल और भाजपा को फिर साथ देखना चाहते हैं, इस चर्चा को अचानक राजनीतिक गर्मी दे गया है। हालांकि अंतिम फैसला दोनों दलों के शीर्ष नेतृत्व को करना है, लेकिन इतना साफ है कि 2027 के चुनावी मैदान में यह संभावित गठबंधन समीकरण बदलने की क्षमता रखता है।
लेकिन बड़ा सवाल यह है कि अगर अकाली-भाजपा गठबंधन बन भी जाता है तो क्या यह गठजोड़ सीधे आम आदमी पार्टी की सरकार को चुनौती दे पाएगा?
इसका जवाब सिर्फ वोट प्रतिशत जोड़ने से नहीं मिलेगा।
2022 का गणित: कागज पर 25 प्रतिशत, लेकिन कहानी उससे बड़ी है
2022 में अकाली दल और भाजपा अलग-अलग चुनाव लड़े थे। आम आदमी पार्टी ने 117 में से 92 सीटें जीतकर जबरदस्त बहुमत हासिल किया था। AAP का वोट शेयर करीब 43.2 प्रतिशत रहा।
दूसरी तरफ SAD को करीब 18.9 प्रतिशत और BJP को करीब 6.8 प्रतिशत वोट मिले। यानी दोनों के वोट जोड़ दिए जाएं तो आंकड़ा करीब 25.7 प्रतिशत बैठता है।
कागज पर यह AAP के 43 प्रतिशत से काफी पीछे था।
इसलिए 2022 के आंकड़ों को देखकर यह कहना कि केवल SAD+BJP के जुड़ने से AAP की सरकार खतरे में आ जाएगी, चुनावी गणित को जरूरत से ज्यादा सरल बना देना होगा।
लेकिन 2027 की लड़ाई 2022 जैसी नहीं होगी।
क्योंकि तब पंजाब में AAP के पक्ष में एक जबरदस्त सत्ता-विरोधी बदलाव की लहर थी। अब AAP सरकार पांच साल का शासन पूरा करने की स्थिति में होगी और चुनाव जनता के सामने सरकार के कामकाज बनाम विपक्ष के विकल्प के रूप में होगा।
2024 लोकसभा ने पहली बार तस्वीर पलटी
2024 लोकसभा चुनाव ने पंजाब की राजनीति में एक महत्वपूर्ण संकेत दिया।
कांग्रेस करीब 26.3 प्रतिशत वोट के साथ 7 सीटें जीत गई, जबकि AAP को करीब 26 प्रतिशत वोट के बावजूद सिर्फ 3 सीटें मिलीं।
भाजपा को 18.56 प्रतिशत वोट मिले, लेकिन वह एक भी लोकसभा सीट नहीं जीत सकी। अकाली दल करीब 13.42 प्रतिशत वोट के साथ सिर्फ बठिंडा सीट जीत पाया।
यानी 2024 में एक दिलचस्प स्थिति बनी—भाजपा का वोट शेयर पंजाब में काफी बढ़ा, लेकिन वह सीट में परिवर्तित नहीं हो पाया।
और यहीं से संभावित SAD-BJP गठबंधन का असली महत्व सामने आता है।
अगर भाजपा का वोट बैंक और अकाली दल का पारंपरिक ग्रामीण-सिख वोट बैंक एक-दूसरे के पक्ष में ट्रांसफर होता है, तो कई सीटों पर मुकाबला त्रिकोणीय से सीधा मुकाबला बन सकता है।
लेकिन यहां भी एक बड़ा ‘अगर’ है।
वोट प्रतिशत जोड़ना आसान है, वोट ट्रांसफर करवाना मुश्किल।
क्या 2027 में 25-30 प्रतिशत वोट से सरकार बन सकती है?
पंजाब में बहुमत का आंकड़ा 59 सीट है।
अगर SAD और BJP मिलकर 25-30 प्रतिशत के आसपास वोट हासिल करते हैं तो यह उन्हें मजबूत विपक्षी ताकत जरूर बना सकता है, लेकिन सरकार बनाने के लिए उन्हें सिर्फ अपना वोट जोड़ना नहीं होगा—उन्हें कांग्रेस और AAP के बीच बंटने वाले वोट का लाभ भी उठाना होगा।
यानी 2027 का सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह नहीं होगा कि SAD+BJP का संयुक्त वोट कितना है।
सवाल यह होगा कि तीसरी ताकत के रूप में कांग्रेस कितनी मजबूत रहती है।
अगर कांग्रेस 20-25 प्रतिशत के आसपास मजबूत रहती है, तो AAP, कांग्रेस और SAD-BJP के बीच त्रिकोणीय मुकाबले में 30 प्रतिशत के आसपास वोट भी बड़ी संख्या में सीटों में बदल सकता है।
लेकिन अगर कांग्रेस कमजोर पड़ती है और मुकाबला मुख्य रूप से AAP बनाम SAD-BJP बनता है, तो दोनों गठबंधनों के बीच सीधा वोट मुकाबला कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण हो जाएगा।
AAP को हल्के में लेना भी विपक्ष की बड़ी गलती होगी
AAP के खिलाफ माहौल होने की चर्चाओं के बावजूद उसके पक्ष में कुछ ठोस चुनावी संकेत भी मौजूद हैं।
2024 के बाद पंजाब में हुए विधानसभा उपचुनावों में AAP ने लगातार अच्छा प्रदर्शन किया। 2024 में उसने गिद्दड़बाहा, डेरा बाबा नानक और चब्बेवाल जैसी सीटें जीतीं, जबकि बरनाला कांग्रेस के खाते में गया।
2025 के लुधियाना पश्चिम उपचुनाव में AAP ने कांग्रेस को 10,637 वोटों से हराया।
और नवंबर 2025 के तरनतारन उपचुनाव में भी AAP ने जीत हासिल की। यहां अकाली दल दूसरे नंबर पर रहा, जबकि AAP उम्मीदवार ने 12,091 वोटों के अंतर से जीत दर्ज की।
इसका अर्थ यह नहीं कि AAP 2027 में फिर 92 सीटें जीतने जा रही है।
लेकिन यह जरूर बताता है कि AAP को पंजाब की राजनीति से बाहर मान लेना अभी जल्दबाजी होगी।
फिर SAD-BJP गठबंधन की सबसे बड़ी ताकत क्या होगी?
सबसे पहली ताकत होगी—वोटों का भौगोलिक और सामाजिक विस्तार।
अकाली दल की पारंपरिक ताकत ग्रामीण पंजाब, किसान और सिख वोट बैंक में रही है। भाजपा की पकड़ शहरी क्षेत्रों, व्यापारिक वर्ग और कुछ हिंदू बहुल इलाकों में मजबूत रही है।
अलग-अलग लड़ने पर दोनों के वोट कई सीटों पर तीसरे स्थान की ताकत बन सकते हैं।
लेकिन साथ लड़ने पर यही वोट किसी सीट पर जीत का आधार बन सकते हैं।
यानी गठबंधन का असली फायदा कुल वोट प्रतिशत में नहीं, सीट-दर-सीट वोटों के एकत्रीकरण में दिखाई देगा।
लेकिन गठबंधन के सामने भी कम मुश्किलें नहीं
सबसे बड़ा सवाल होगा—क्या दोनों दलों के मतदाता एक-दूसरे के उम्मीदवार को स्वीकार करेंगे?
2020 में कृषि कानूनों के मुद्दे पर SAD ने NDA से नाता तोड़ा था। उसके बाद दोनों दलों ने अलग-अलग रास्ता अपनाया। अब यदि फिर साथ आते हैं तो नेतृत्व को केवल सीट बंटवारे पर नहीं, बल्कि पुराने राजनीतिक मतभेदों पर भी जनता को जवाब देना होगा।
दूसरी चुनौती होगी मुख्यमंत्री चेहरे की।
तीसरी चुनौती होगी कि पंजाब में भाजपा की बढ़ी हुई वोट हिस्सेदारी को विधानसभा सीटों में कैसे बदला जाए।
और चौथी चुनौती—अकाली दल अपने पुराने पारंपरिक वोट बैंक को कितनी मजबूती से वापस ला पाता है।
2026 का एक और संकेत: AAP अभी भी मुकाबले में है
2026 के स्थानीय निकाय चुनावों में AAP ने बड़ी संख्या में वार्ड जीतकर अपनी संगठनात्मक मौजूदगी का संकेत दिया। उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार AAP ने 952 वार्ड जीते, जबकि कांग्रेस 386, SAD 191 और BJP 170 वार्डों तक रही।
स्थानीय निकाय चुनाव विधानसभा चुनाव का सीधा आईना नहीं होते, लेकिन वे एक बात जरूर बताते हैं—AAP का संगठन पूरी तरह कमजोर नहीं हुआ है।
इसलिए 2027 की लड़ाई को केवल ‘सरकार के खिलाफ गुस्सा’ बनाम ‘विपक्ष’ की लड़ाई मानना सही नहीं होगा।
तो क्या AAP वापसी कर सकती है?
हां—और इसकी संभावना को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
लेकिन 2022 जैसी वापसी की संभावना फिलहाल मान लेना भी जल्दबाजी होगी।
AAP के लिए सबसे बड़ा खतरा सत्ता विरोधी भावना, बेरोजगारी, नशा, कानून-व्यवस्था, किसानों और ग्रामीण मुद्दों पर विपक्ष की एकजुटता तथा कांग्रेस और अकाली-भाजपा के बीच संभावित वोट ध्रुवीकरण होगा।
दूसरी तरफ AAP की ताकत होगी—सत्ता में होने का संगठनात्मक लाभ, सरकारी योजनाओं का प्रचार, मुख्यमंत्री भगवंत मान का चेहरा और उपचुनावों में लगातार जीत का रिकॉर्ड।
सबसे दिलचस्प मुकाबला शायद तीन कोणों का होगा
अगर आज की तस्वीर को एक लाइन में समझें तो पंजाब में 2027 की संभावित लड़ाई कुछ इस तरह दिखाई देती है—
AAP : सत्ता और सरकार के काम का रिपोर्ट कार्ड
Congress : परंपरागत विपक्ष और 2024 लोकसभा की सफलता
SAD-BJP : पुराना गठबंधन + वोटों का संभावित एकीकरण
यहीं से चुनाव का असली रोमांच शुरू होगा।
अगर SAD और BJP साथ आते हैं और उनके वोट वास्तविक रूप से एक-दूसरे को ट्रांसफर होते हैं, तो कई सीटों पर कांग्रेस और AAP दोनों का गणित बिगड़ सकता है।
लेकिन अगर वोट ट्रांसफर अधूरा रहा, कांग्रेस मजबूत बनी रही और AAP अपना मौजूदा ग्रामीण-शहरी नेटवर्क संभाल लेती है, तो गठबंधन का संयुक्त वोट प्रतिशत भी उसे सत्ता तक पहुंचाने की गारंटी नहीं देगा।
D-News Watch का निष्कर्ष
पंजाब में 2027 का चुनाव शायद 2022 का रिपीट नहीं होगा।
2022 में सवाल था—कौन AAP को रोक सकता है?
2027 में सवाल उल्टा हो सकता है—AAP को रोकने के लिए क्या विपक्ष के पास पर्याप्त वोट एक जगह लाने की क्षमता है?
अकाली-भाजपा गठबंधन बनता है तो पंजाब में चुनाव का मुकाबला निश्चित रूप से ज्यादा दिलचस्प और कड़ा होगा। लेकिन गठबंधन बन जाना और चुनाव जीतने की स्थिति बन जाना—दो अलग बातें हैं।
सबसे बड़ा गणित 25 प्रतिशत बनाम 43 प्रतिशत का नहीं है।
सबसे बड़ा गणित यह है कि 2027 में किस दल का वोट किसके खिलाफ एकजुट होगा।
और अगर अकाली-भाजपा गठबंधन वास्तव में बन गया, कांग्रेस अलग मैदान में रही और AAP भी अपना आधार बचाए रखती है, तो पंजाब में मुकाबला शायद इस बार सीटों से ज्यादा वोटों के ट्रांसफर और उम्मीदवारों की स्थानीय पकड़ तय करेगा।
यानी अभी पंजाब की राजनीति में तस्वीर साफ नहीं हुई है—लेकिन इतना जरूर है कि अकाली-भाजपा की दोस्ती अगर दोबारा पक्की हो गई, तो 2027 का चुनाव तीन दलों की लड़ाई से आगे बढ़कर तीन बड़े वोट-ब्लॉकों की लड़ाई बन सकता है।
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