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नवरात्रि: आस्था से आगे समाज का संदेश”।

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— दिग्विन्द्र राणा | D-News Watch

नवरात्रि केवल नौ दिन की पूजा नहीं, बुराई पर अच्छाई, अन्याय पर न्याय और अहंकार पर विवेक की जीत का संदेश है। मां शक्ति की आराधना के बीच समाज के सामने एक सवाल भी है—क्या हम जिन मूल्यों की पूजा करते हैं, उन्हें अपने जीवन में भी जगह देते हैं?

शरद ऋतु के आगमन के साथ ही देश में शारदीय नवरात्रि की रौनक दिखाई देने लगती है। मंदिरों में घंटियों की गूंज, घरों में पूजा की तैयारी, माता की चौकियां, भजन-कीर्तन और बाजारों में बढ़ती चहल-पहल इस पर्व के उत्साह को दर्शाते हैं। वर्ष 2026 में शारदीय नवरात्रि 11 अक्टूबर से शुरू होकर 19 अक्टूबर तक मनाई जाएगी, जबकि 20 अक्टूबर को विजयादशमी का पर्व होगा। इन नौ दिनों में मां दुर्गा के नौ स्वरूपों की आराधना की जाती है। लेकिन इस पर्व की महत्ता केवल धार्मिक अनुष्ठानों तक सीमित नहीं है। इसके भीतर ऐसा संदेश छिपा है, जो आज के सामाजिक जीवन में भी उतना ही प्रासंगिक है जितना सदियों पहले था।

मां दुर्गा की आराधना और नारी सम्मान का सवाल

भारतीय परंपरा में शक्ति को स्त्री स्वरूप में पूजने की एक समृद्ध परंपरा रही है। मां दुर्गा, मां लक्ष्मी और मां सरस्वती के अलग-अलग स्वरूप शक्ति, समृद्धि और ज्ञान का प्रतीक हैं। नवरात्रि में कन्या पूजन करके छोटी बच्चियों में देवी का स्वरूप देखने की परंपरा भी इसी भाव से जुड़ी है। लेकिन यहां समाज के सामने एक विचारणीय सवाल खड़ा होता है—जिस समाज में कन्या को देवी मानकर उसके चरण छुए जाते हैं, उसी समाज में बेटियों की सुरक्षा, शिक्षा, समान अवसर और सम्मान को लेकर चुनौतियां क्यों बनी रहती हैं?

नवरात्रि का वास्तविक संदेश तभी सार्थक होगा, जब कन्या पूजन का भाव घर और समाज के व्यवहार में भी दिखाई दे। बेटी को पढ़ने, आगे बढ़ने और अपने फैसले लेने का अवसर मिले। महिलाओं को कार्यस्थल, सार्वजनिक स्थानों और घरों में सम्मान तथा सुरक्षा मिले। किसी महिला के साथ अन्याय होने पर समाज उसकी आवाज बने, न कि उसके चरित्र पर सवाल उठाए। देवी की आराधना और नारी का सम्मान दो अलग-अलग विषय नहीं होने चाहिए। आस्था की सबसे सुंदर अभिव्यक्ति वही है, जो इंसान के व्यवहार में दिखाई दे।

महिषासुर पर विजय की कथा आज भी क्यों प्रासंगिक है?

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार मां दुर्गा ने महिषासुर का वध करके अधर्म और अत्याचार का अंत किया था। यह कथा केवल एक दैवी युद्ध का वर्णन नहीं करती, बल्कि बुराई के विरुद्ध संघर्ष का प्रतीक भी मानी जाती है। हर युग में बुराई का स्वरूप बदलता है। कभी वह अहंकार के रूप में सामने आती है, कभी लालच, हिंसा, भेदभाव और दूसरों के अधिकारों को कुचलने की प्रवृत्ति के रूप में।

आज भी समाज में भ्रष्टाचार, नशे की समस्या, महिलाओं के विरुद्ध अपराध, कमजोर वर्गों के साथ भेदभाव और सार्वजनिक जीवन में नैतिकता की कमी जैसी चुनौतियां दिखाई देती हैं। ऐसे में नवरात्रि हमें यह सोचने का अवसर देती है कि बुराई को केवल धार्मिक कथाओं में पहचानना पर्याप्त नहीं है। उसे अपने आसपास के व्यवहार और व्यवस्था में भी पहचानना होगा। अन्याय के सामने चुप रहना, गलत काम देखकर आंखें बंद कर लेना और अपने लाभ के लिए दूसरों के अधिकारों की अनदेखी करना भी ऐसे व्यवहार हैं, जिन पर आत्ममंथन जरूरी है।

उपवास के साथ विचारों की शुद्धता भी जरूरी

नवरात्रि में बहुत से श्रद्धालु उपवास रखते हैं, सात्विक भोजन करते हैं और पूजा-पाठ के माध्यम से मन को एकाग्र करने का प्रयास करते हैं। उपवास की अपनी धार्मिक और व्यक्तिगत महत्ता है। यह अनुशासन, संयम और आत्मनियंत्रण का अवसर भी बन सकता है। लेकिन इस पर्व का एक व्यापक अर्थ यह भी है कि इंसान अपने व्यवहार पर ध्यान दे। यदि कोई व्यक्ति नौ दिन तक खान-पान में संयम रखता है, लेकिन उसके व्यवहार में क्रोध, कटुता, छल या दूसरों के प्रति अपमान बना रहता है, तो उसे अपने आचरण पर भी विचार करना चाहिए।

धार्मिक आस्था व्यक्तिगत विश्वास का विषय है, लेकिन दया, ईमानदारी, संयम और दूसरों के प्रति सम्मान ऐसे मूल्य हैं, जिनसे पूरे समाज को लाभ मिलता है। किसी जरूरतमंद की मदद करना, किसी बुजुर्ग का सहारा बनना, किसी गरीब परिवार के बच्चे की पढ़ाई में सहयोग देना या किसी परेशान व्यक्ति की बात सुनना भी मानवीय संवेदना की अभिव्यक्ति है। पूजा के साथ यदि ऐसे छोटे-छोटे कार्य जुड़ जाएं, तो त्योहार का प्रभाव मंदिर और घर की चारदीवारी से निकलकर समाज तक पहुंच सकता है।

त्योहार की रौनक के बीच सामाजिक जिम्मेदारी न भूलें

नवरात्रि के दौरान धार्मिक आयोजनों, मेलों, भंडारों और सांस्कृतिक कार्यक्रमों से बाजारों तथा स्थानीय कारोबार को भी गति मिलती है। अनेक छोटे दुकानदारों, फूल विक्रेताओं, कारीगरों और अस्थायी कामगारों के लिए यह समय कमाई का अवसर लेकर आता है। इसलिए त्योहार की खुशियों के साथ उन लोगों के योगदान को भी समझना चाहिए, जिनकी मेहनत से आयोजन सफल होते हैं।

साथ ही, सार्वजनिक आयोजनों में साफ-सफाई, यातायात व्यवस्था, सुरक्षा और ध्वनि के नियमों का ध्यान रखना भी जरूरी है। धार्मिक उत्साह ऐसा होना चाहिए, जिसमें किसी दूसरे व्यक्ति को परेशानी न हो। प्लास्टिक और कचरे का अनावश्यक इस्तेमाल कम करना, भोजन की बर्बादी रोकना और जरूरतमंदों तक सहायता पहुंचाना पर्व को अधिक जिम्मेदार और सार्थक बना सकता है।

आस्था का अर्थ केवल अपने लिए सुख और समृद्धि की कामना करना नहीं, बल्कि दूसरों के जीवन में भी सुख और सम्मान बढ़ाने का प्रयास करना है। जब धार्मिक आयोजन स्थानीय लोगों की भागीदारी, सामाजिक सहयोग और जिम्मेदारी की मिसाल बनते हैं, तब उनकी सकारात्मक भूमिका और व्यापक हो जाती है।

नौ देवियां, नौ संदेश और आत्ममंथन का अवसर

मां दुर्गा के नौ स्वरूपों की पूजा भारतीय धार्मिक परंपरा में विशेष स्थान रखती है। इन स्वरूपों को श्रद्धालु अलग-अलग गुणों, शक्तियों और आध्यात्मिक भावों से जोड़कर देखते हैं। नवरात्रि के नौ दिन व्यक्ति को अपने जीवन पर विचार करने का अवसर दे सकते हैं—क्या हम अपने परिवार के प्रति जिम्मेदार हैं? क्या हमारे व्यवहार में दूसरों के लिए सम्मान है? क्या हम गलत बात का विरोध करने का साहस रखते हैं? क्या हम अपनी सफलता के साथ समाज के कमजोर लोगों की जरूरतों को भी समझते हैं?

इन सवालों का जवाब किसी विशेष पूजा-पद्धति में नहीं, बल्कि हमारे रोजमर्रा के व्यवहार में मिलता है। धार्मिक परंपराएं मनुष्य को बेहतर बनने की प्रेरणा दे सकती हैं, लेकिन उस प्रेरणा को वास्तविकता में बदलने की जिम्मेदारी मनुष्य की ही होती है। नवरात्रि का यही पक्ष इसे केवल एक वार्षिक धार्मिक आयोजन से आगे ले जाकर व्यक्तिगत सुधार और सामाजिक चेतना का अवसर बनाता है।

असली विजय कब होगी?

शारदीय नवरात्रि का समापन विजयादशमी के साथ होता है। यह पर्व परंपरागत रूप से बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक है। लेकिन इस प्रतीक का महत्व तभी बढ़ेगा, जब हम अपने जीवन में भी गलत प्रवृत्तियों के विरुद्ध खड़े होने का प्रयास करें। यदि बेटियों को बराबरी मिले, महिलाओं को सुरक्षा मिले, कमजोर व्यक्ति को न्याय मिले, सार्वजनिक जीवन में ईमानदारी बढ़े और जरूरतमंदों के प्रति संवेदना मजबूत हो, तो यह पर्व अपने व्यापक सामाजिक अर्थ को भी प्राप्त करेगा।

मां दुर्गा की आराधना करने वाले प्रत्येक श्रद्धालु के लिए यह अवसर है कि वह अपनी आस्था के साथ अपने कर्तव्यों पर भी विचार करे। समाज में बदलाव केवल बड़े भाषणों या सरकारी फैसलों से नहीं आता। उसकी शुरुआत परिवार, मोहल्ले और व्यक्ति के अपने व्यवहार से भी होती है।

नवरात्रि का संदेश केवल यह नहीं कि हम मां दुर्गा से शक्ति मांगें, बल्कि यह भी है कि उस शक्ति का इस्तेमाल सही काम के लिए करें। क्योंकि बुराई पर विजय का उत्सव तभी सार्थक है, जब अच्छाई हमारे विचारों, व्यवहार और समाज में भी दिखाई दे।


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