जरा सोचिए उस व्यक्ति के बारे में, जो वर्षों से समाज के लिए अपना योगदान दे रहा है। कभी सम्मान के लिए किसी मंच पर अपना बायोडाटा नहीं रखा और न ही यह अपेक्षा की, कि उसका नाम पुकारा जाए…! और फिर एक दिन अचानक…
डी-न्यूज वाच डैस्क/फगवाड़ा
15 अगस्त का पर्व गुजर चुका है। देशभर में स्वतंत्रता दिवस के समारोह हुए, तिरंगा फहराया गया, देशभक्ति के कार्यक्रम आयोजित हुए और समाज के विभिन्न क्षेत्रों में उल्लेखनीय योगदान देने वाली अनेक विभूतियों को सम्मानित किया गया।
किसी व्यक्ति की मेहनत और योगदान को सार्वजनिक रूप से पहचान मिलना निश्चित रूप से गौरव की बात है। ऐसे सम्मान न केवल सम्मानित व्यक्ति का उत्साह बढ़ाते हैं, बल्कि समाज के अन्य लोगों को भी बेहतर काम करने की प्रेरणा देते हैं।
लेकिन इन सम्मान समारोहों के बाद एक विचार मन में जरूर आता है—क्या सम्मान के योग्य लोगों की पहचान केवल उन नामों तक सीमित रहनी चाहिए, जो स्वयं अपना विवरण या बायोडाटा प्रस्तुत करते हैं?
या फिर इसके साथ ऐसी व्यवस्था भी होनी चाहिए, जिसमें प्रशासन और समाज अपने स्तर पर भी उन लोगों को तलाश सके जो लंबे समय से सेवा कार्य कर रहे हैं, लेकिन स्वयं सम्मान के लिए आगे नहीं आते?
बायोडाटा जरूरी है, लेकिन क्या इतना ही पर्याप्त है?
सम्मान के लिए बायोडाटा या नामांकन मांगना अपने आप में कोई गलत प्रक्रिया नहीं है। उपलब्धियों और सामाजिक योगदान की जानकारी प्राप्त करने के लिए ऐसी प्रक्रिया आवश्यक भी हो सकती है। राष्ट्रीय स्तर पर दिए जाने वाले अनेक पुरस्कारों में भी नामांकन और उपलब्धियों का विवरण लिया जाता है।
इसलिए सवाल बायोडाटा मांगने का नहीं है।
सवाल यह है कि क्या बायोडाटा के साथ योग्य लोगों की सक्रिय तलाश भी होनी चाहिए?
समाज में ऐसे अनेक लोग हैं जो वर्षों से रक्तदान, पर्यावरण संरक्षण, जरूरतमंदों की सहायता, स्वास्थ्य सेवाओं, सामाजिक जागरूकता, शिक्षा, नशे के खिलाफ अभियान और अन्य क्षेत्रों में लगातार काम कर रहे हैं।
इनमें से कुछ लोग संगठनों के माध्यम से सक्रिय हैं, जबकि कुछ लोग व्यक्तिगत स्तर पर ही जरूरतमंदों की मदद करते रहते हैं।
बहुत से लोग अपने काम का प्रचार करना पसंद नहीं करते। उनके लिए किसी जरूरतमंद की सहायता करना या समाज के लिए कुछ करना ही अपने आप में संतोष का विषय होता है।
ऐसे लोग संभव है कि सम्मान के लिए अपना नाम या बायोडाटा स्वयं प्रस्तुत न करें।
बायोडाटा देने वाला भी सम्मान का हकदार, लेकिन…
यहां एक बात स्पष्ट रहनी चाहिए।
जो व्यक्ति निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार अपना बायोडाटा देता है, वह बिल्कुल उचित प्रक्रिया का पालन कर रहा है। अपने कार्यों की जानकारी उपलब्ध करवाना किसी भी तरह गलत नहीं है।
सवाल किसी सम्मानित व्यक्ति या आवेदन करने वाले व्यक्ति पर नहीं है।
सवाल केवल इतना है कि क्या प्रक्रिया का दायरा इतना व्यापक हो सकता है कि आवेदन करने वालों के साथ-साथ ऐसे लोगों की भी पहचान हो सके, जिन्होंने स्वयं कभी आवेदन नहीं किया?
क्योंकि संभव है कि किसी शहर, कस्बे या गांव में कोई व्यक्ति वर्षों से समाज के लिए काम कर रहा हो, लेकिन उसे सम्मान की प्रक्रिया के बारे में जानकारी ही न हो या वह स्वयं को सम्मान के योग्य मानकर आवेदन करना उचित न समझता हो।
ऐसे व्यक्ति तक व्यवस्था कैसे पहुंचे—यह विचार का विषय हो सकता है।
प्रशासन अपनी ओर से भी कर सकता है पहल
अगर सम्मान समारोहों का उद्देश्य समाज में अच्छे कार्यों को पहचान देना और प्रोत्साहित करना है, तो प्रशासन अपनी ओर से भी ऐसे लोगों की जानकारी जुटा सकता है।
ग्राम पंचायतों, नगर निकायों, सामाजिक संस्थाओं, शिक्षकों, चिकित्सकों और अन्य जिम्मेदार नागरिकों से सुझाव लिए जा सकते हैं।
यह पता लगाया जा सकता है कि कौन लोग लंबे समय से रक्तदान, पर्यावरण, शिक्षा, जरूरतमंदों की सहायता, स्वास्थ्य, सामाजिक जागरूकता या अन्य क्षेत्रों में निरंतर काम कर रहे हैं।
इसके लिए किसी बड़े तंत्र की आवश्यकता भी जरूरी नहीं।
सम्मान प्रक्रिया में एक छोटा-सा हिस्सा ऐसा रखा जा सकता है, जिसमें प्रशासन स्वयं योग्य व्यक्तियों को चिन्हित करे।
इससे आवेदन करने वालों की प्रक्रिया भी बनी रहेगी और ऐसे लोगों तक पहुंचने का रास्ता भी खुलेगा जो स्वयं आगे नहीं आते।
सम्मान की संख्या नहीं, विश्वसनीयता महत्वपूर्ण
सम्मान समारोह तभी अधिक सार्थक दिखाई देता है जब समाज भी यह महसूस करे कि जिन लोगों को सम्मान मिला है, उन्होंने वास्तव में कुछ उल्लेखनीय किया है।
किसी समारोह में बड़ी संख्या में लोगों को सम्मानित करना निश्चित रूप से उत्साह का वातावरण बनाता है, लेकिन सम्मान का वास्तविक मूल्य उसकी संख्या से नहीं, उसकी विश्वसनीयता से तय होता है।
जब किसी व्यक्ति का नाम सम्मान के लिए घोषित हो और आम लोग कहें—
“हां, इस व्यक्ति ने सचमुच समाज के लिए काम किया है।”
तो यही उस सम्मान की सबसे बड़ी सफलता है।
इसलिए उद्देश्य सम्मान की संख्या बढ़ाना नहीं, बल्कि सम्मान की विश्वसनीयता और सामाजिक प्रभाव बढ़ाना होना चाहिए।
अगले वर्ष एक अतिरिक्त प्रयास क्यों नहीं?
अगले वर्ष जब स्वतंत्रता दिवस या गणतंत्र दिवस के सम्मान की प्रक्रिया शुरू हो, तो आवेदन और बायोडाटा की प्रक्रिया के साथ एक अतिरिक्त पहल की जा सकती है।
एक सूची उन लोगों की हो जिन्होंने स्वयं आवेदन किया है।
और दूसरी सूची उन लोगों की, जिन्हें प्रशासन, स्थानीय संस्थाओं और समाज के विश्वसनीय सुझावों के आधार पर स्वयं चिन्हित किया गया है।
दोनों प्रक्रियाएं साथ-साथ चल सकती हैं।
इससे किसी की योग्यता पर प्रश्न भी नहीं उठेगा और ऐसे लोगों तक पहुंचने की संभावना भी बढ़ेगी जो अपने काम का प्रचार करने के बजाय चुपचाप सेवा करते रहते हैं।
सवाल सम्मान का नहीं, पहचान का है
किसी व्यक्ति का सम्मान मिलना अच्छी बात है। अपने काम का विवरण देना भी उचित है और प्रशासन द्वारा बायोडाटा मांगना भी एक व्यवस्थित प्रक्रिया का हिस्सा हो सकता है।
लेकिन इसके साथ एक और प्रयास हो तो सम्मान की भावना और व्यापक हो सकती है—
उन लोगों की तलाश, जो स्वयं आगे आकर अपना नाम प्रस्तुत नहीं करते।
15 अगस्त के समारोह समाप्त हो गए। सम्मान हुए, तस्वीरें सामने आईं और अनेक लोगों को उनके योगदान के लिए सार्वजनिक पहचान मिली।
अब अगले 15 अगस्त से पहले अगर व्यवस्था उन लोगों को भी तलाशने का प्रयास करे जो वर्षों से बिना किसी अपेक्षा के समाज के लिए काम कर रहे हैं, तो शायद सम्मान समारोह की सार्थकता और बढ़ सके।
आखिर सवाल यह नहीं कि किसने अपना बायोडाटा दिया।
सवाल यह है कि क्या हम उन लोगों तक भी पहुंच पा रहे हैं, जिन्होंने कभी अपना बायोडाटा दिया ही नहीं?
शायद सम्मान की संस्कृति को और मजबूत बनाने की दिशा में यह एक छोटा, लेकिन सार्थक कदम हो सकता है।
सोचिए, उस व्यक्ति की खुशी कितनी बड़ी होगी…
जरा उस व्यक्ति के बारे में सोचिए, जो वर्षों से चुपचाप समाज के लिए अपना योगदान दे रहा है। उसने कभी सम्मान के लिए अपना नाम नहीं भेजा, कभी किसी मंच पर अपना बायोडाटा नहीं रखा और न ही यह अपेक्षा की कि उसका नाम किसी समारोह में पुकारा जाए।
और फिर एक दिन अचानक प्रशासन की ओर से उसके पास एक पत्र पहुंचे—
“आपको इस वर्ष स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर आयोजित समारोह में आपके सामाजिक योगदान के लिए सम्मानित किया जाना है।”
सोचिए, उस पल उसे कितनी खुशी होगी।
शायद वह अपने परिवार को यह खबर बताएगा, शायद परिवार के चेहरे पर गर्व दिखाई देगा और शायद उसके मन में यह भाव भी आएगा कि उसकी वर्षों की निस्वार्थ सेवा किसी की नजर से ओझल नहीं हुई।
ऐसा सम्मान केवल एक प्रशस्ति-पत्र या स्मृति-चिह्न नहीं होगा। यह उस व्यक्ति के लिए समाज की ओर से यह संदेश होगा कि “हमने आपके काम को देखा है और उसकी कद्र की है।”
और संभव है कि ऐसा एक सम्मान उसे आगे और अधिक उत्साह के साथ समाज के लिए काम करने की प्रेरणा दे।
यही सम्मान का सबसे सुंदर उद्देश्य हो सकता है—किसी को केवल पुरस्कृत करना नहीं, बल्कि उसके सेवाभाव को पहचानकर उसे आगे बढ़ने की प्रेरणा देना।
शायद इसी भावना के साथ सम्मान की प्रक्रिया में उन लोगों तक भी पहुंचने का प्रयास होना चाहिए, जो स्वयं कभी सम्मान की कतार में खड़े होने नहीं आते।
लेखकीय टिप्पणी: इस लेख का उद्देश्य किसी व्यक्ति, संस्था अथवा किसी सम्मान समारोह विशेष की आलोचना या समर्थन करना नहीं है। लेख केवल 15 अगस्त के अवसर पर आयोजित होने वाले सम्मान समारोहों की परंपरा, उद्देश्य और सामाजिक उपयोगिता पर एक सामान्य वैचारिक विमर्श प्रस्तुत करता है। इसे किसी के पक्ष या विपक्ष में टिप्पणी के रूप में न पढ़ा जाए।
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