बात सिर्फ एक गीत की नहीं है—यह उस आज़ादी के तराने की बात है, जो पीढ़ियों से गूंजता आया है: वंदे मातरम्। —आजादी का वह तराना, जिसने एक दौर में देश को जगाया था,
वन्दे मातरम् जिसे गाते हुए अमर बलिदानीओं ने फांसी के फंदे को गले लगाया था…आज आजादी के आठ दशक बाद राजनीतिक विवाद में क्यों है? नई पीढ़ी की रुचि के लिए प्रस्तुत है यह लेख :
80वें स्वतंत्रता दिवस पर जब एक तरफ लाल किले से आजादी के बाद पहली बार वंदे मातरम गुंजा तो वहीं कांग्रेस मुख्यालय में स्वतंत्रता दिवस समारोह के दौरान इसके गायन को लेकर भाजपा और कांग्रेस के बीच आरोप-प्रत्यारोप भी सामने आए। भाजपा ने आरोप लगाया कि वंदे मातरम् के पूर्ण गायन पर आपत्ति की गई, जबकि कांग्रेस का कहना है कि संबंधित घटना को गलत अर्थ दिया जा रहा है।
राजनीतिक विवाद अपनी जगह है, लेकिन इस घटनाक्रम ने एक अच्छा सवाल जरूर पैदा कर दिया है—आखिर वंदे मातरम् को लेकर विवाद क्या है?
आज की पीढ़ी के बहुत से युवाओं को इसका जवाब मालूम नहीं। उनके लिए यह बस एक देशभक्ति गीत है। वास्तव में इसकी कहानी भारत के स्वतंत्रता संघर्ष, विभाजन और स्वतंत्र भारत की संवैधानिक सोच से जुड़ी हुई है।
इतिहास के आईने में, ‘वंदे मातरम’…
वंदे मातरम् की रचना बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय ने की थी। बाद में यह उनकी पुस्तक आनंदमठ का हिस्सा बनी। 1896 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अधिवेशन में रवींद्रनाथ ठाकुर ने इसे गाया और 1905 के बंग-भंग आंदोलन तक यह अंग्रेजी शासन के खिलाफ राष्ट्रीय चेतना का एक बड़ा प्रतीक बन चुका था।
उस समय वंदे मातरम् केवल गीत नहीं था। यह आजादी चाहने वाले भारतीयों के लिए एक भावनात्मक उद्घोष था।
यानी इस गीत के इतिहास को न जानना , भारत के स्वतंत्रता आंदोलन के एक महत्वपूर्ण अध्याय से अंजान होना होगा।
आपत्ति कब, किसे और क्यों हुई?
मूल वंदे मातरम् केवल उन प्रथम कुछ पंक्तियों तक सीमित नहीं है जिन्हें आज तक सामान्यतः राष्ट्रीय गीत के रूप में गाया जाता रहा। इसके आगे के अंतरों में भारत माता की कल्पना के साथ माँ दुर्गा और माता लक्ष्मी जैसे हिंदू धार्मिक प्रतीकों का उल्लेख है।
यहीं से आपत्ति शुरु होती है।
आजादी से पहले मुस्लिम नेताओं और मुस्लिम लीग की ओर से यह सवाल उठाया गया कि क्या धार्मिक प्रतीकात्मकता वाले पूरे गीत को एक बहुधार्मिक भारत के साझा राष्ट्रीय गीत के रूप में स्वीकार किया जा सकता है?
1937 में कांग्रेस ने इस विषय पर विचार किया और राष्ट्रीय कार्यक्रमों में वंदे मातरम् के पहले दो अंतरों के इस्तेमाल का रास्ता चुना। इसका उद्देश्य गीत के उस हिस्से को रखना था जिसमें मातृभूमि के प्रति श्रद्धा और उसकी प्राकृतिक सुंदरता का वर्णन है, जबकि विवादित धार्मिक प्रतीकों वाले हिस्सों से दूरी बनाई गई।
फिर आया 1947—भारत विभाजन का दौर
1947 में धर्म के आधार पर भारत का एक बड़ा भूभाग अलग होकर पाकिस्तान बना। पाकिस्तान ने आगे चलकर अपनी राष्ट्रीय पहचान को इस्लामी गणराज्य के रूप में स्थापित किया।
भारत ने दूसरा रास्ता चुना।
भारत ने किसी एक धर्म को राज्य धर्म नहीं बनाया और संविधान के माध्यम से सभी नागरिकों को समान अधिकार देने की व्यवस्था की।
यही अंतर आज के विमर्श में समझना बेहद जरूरी है।
भारत ने विभाजन के बाद यहां रहने वाले मुसलमानों से यह नहीं कहा कि पाकिस्तान बन चुका है, इसलिए अब उनके अधिकार समाप्त हो गए। उन्हें भी वही नागरिक अधिकार मिले जो दूसरे भारतीयों को मिले।
लेकिन इसके साथ एक दूसरा सिद्धांत भी सामने था कि—
अल्पसंख्यक अधिकारों का अर्थ यह नहीं हो सकता कि किसी नागरिक के लिए राष्ट्रीय जीवन में अलग नागरिक कसौटी बन जाए।
अधिकार सबके लिए समान और जिम्मेदारियां भी सबके लिए समान—यही लोकतांत्रिक संतुलन है।
धर्मनिरपेक्ष भारत का मतलब क्या है
भारत को अक्सर धर्मनिरपेक्ष देश कहा जाता है। जबकि संविधान की मूल प्रति में भाषा में “secular” शब्द का उल्लेख नहीं है। लेकिन संविधान के अनुच्छेद 25 से 28 में धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार मूल रूप से ही शामिल थे। डॉक्टर बी. आर. आंबेडकर और संविधान सभा ने जानबूझकर इस शब्द को प्रस्तावना में नहीं रखा था, क्योंकि उनका मानना था कि जब संविधान पहले से ही धार्मिक स्वतंत्रता और समानता दे रहा है, तो अलग से शब्द जोड़ने की आवश्यकता नहीं है।
आपातकाल के दौरान 1976 में तत्कालीन इंदिरा गांधी सरकार द्वारा 42वें संविधान संशोधन के तहत ‘secular’ और ‘socialist’ जैसे शब्द जोड़े गए। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि भारत अपनी सभ्यता, संस्कृति या बहुसंख्यक समाज की परंपराओं से मुंह मोड़ ले।
इसका अर्थ है कि राज्य किसी एक धर्म को अपना धर्म नहीं मानता और सभी नागरिकों को अपनी आस्था का पालन करने की स्वतंत्रता देता है।
इसलिए सवाल सिर्फ यह नहीं होना चाहिए कि– किसी मुस्लिम को वंदे मातरम् के किसी हिस्से पर आपत्ति क्यों है। सवाल यह भी होना चाहिए कि क्या समानता का अर्थ यह है कि किसी एक समुदाय की आपत्ति हमेशा राष्ट्रीय परंपरा पर अंतिम फैसला तय करेगी?
और यही कसौटी हर समुदाय पर समान रूप से लागू होनी चाहिए।
अगर किसी हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई या किसी अन्य समुदाय की धार्मिक भावना किसी विषय से जुड़ी है, तो लोकतंत्र में उस पर चर्चा का अधिकार सबको है। लेकिन अंतिम कसौटी एक ही होनी चाहिए—संविधान और समान नागरिकता। ख़ैर यह अलग से चर्चा का विषय है…
1950 में मिली राष्ट्रीय मान्यता
24 जनवरी 1950 को संविधान सभा ने जन गण मन को राष्ट्रीय गान के रूप में स्वीकार किया और वंदे मातरम् के ऐतिहासिक महत्व को भी मान्यता दी।
इसलिए आज की पीढ़ी को यह अंतर स्पष्ट रूप से समझना चाहिए—
जन गण मन राष्ट्रीय गान है और वंदे मातरम् राष्ट्रीय गीत।
दोनों की भूमिका अलग है, लेकिन स्वतंत्रता संघर्ष में दोनों का महत्व अपनी-अपनी जगह है।
अब सवाल नई पीढ़ी के सामने है
आज का युवा 1947 को देख नहीं पाया। उसने अंग्रेजी शासन नहीं देखा और न वह दौर देखा जब वंदे मातरम् कहना संघर्ष का प्रतीक था।
इसलिए उसके सामने सिर्फ आदेश या नारा रखने से बात पूरी नहीं होगी।
उसे पूरा इतिहास बताना होगा।
उसे यह भी समझना होगा कि भारत ने विभाजन के बाद पाकिस्तान से अलग रास्ता क्यों चुना। उसे यह भी समझना होगा कि अल्पसंख्यकों के अधिकार क्यों जरूरी हैं और समान नागरिक जिम्मेदारियां क्यों उतनी ही जरूरी हैं।
और सबसे महत्वपूर्ण—उसे यह तय करना होगा कि राष्ट्रीय सम्मान और धार्मिक स्वतंत्रता के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए।
वंदे मातरम् का विवाद इसलिए केवल एक गीत का विवाद नहीं है।
यह भारत की उस लंबी यात्रा का हिस्सा है जिसमें एक तरफ हमारी सभ्यता, स्वतंत्रता संघर्ष और राष्ट्रीय स्मृति है, तो दूसरी तरफ संविधान, विविधता और समान नागरिकता।
इसलिए आज किसी युवा से केवल यह कहना पर्याप्त नहीं कि “वंदे मातरम् बोलो।”
उसे यह भी बताइए कि हम वंदे मातरम् क्यों बोलते हैं।
क्योंकि इतिहास समझकर बोला गया एक शब्द, बिना इतिहास जाने लगाए गए सौ नारों से कहीं ज्यादा मजबूत होता है।
वंदे मातरम्—इतिहास के साथ, संविधान के सम्मान के साथ और भारत की विविधता को समझते हुए।
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