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ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग के बीच सवाल—क्या हर चुनाव के बाद सड़क पर नई लड़ाई, नया आंदोलन और नया इस्तीफा ही विपक्ष की राजनीति का रास्ता रह गया है?

D-News Watch|विश्लेषण

यूपी सहित कई राज्यों के चुनाव सामने हैं और दिल्ली में एक बार फिर विपक्ष सड़क पर है और इस बार निशाने पर मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार हैं। चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली, मतदाता सूची के Special Intensive Revision यानी SIR और चुनावी प्रक्रिया को लेकर विपक्ष के सवालों को लोकतंत्र में पूरी गंभीरता से सुना जाना चाहिए, क्योंकि चुनाव सिर्फ सत्ता हासिल करने का माध्यम नहीं बल्कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में जनता के विश्वास की सबसे बड़ी परीक्षा होते हैं। लेकिन इसी के साथ एक बड़ा और असहज सवाल भी खड़ा होता है—क्या चुनाव जीतने पर वही चुनाव व्यवस्था लोकतांत्रिक जनादेश बन जाती है और चुनाव हारने पर उसी व्यवस्था की विश्वसनीयता पर सवाल उठने लगते हैं? अगर विपक्ष को लगता है कि चुनाव आयोग ने गलत किया है तो उसे ठोस सबूत, आंकड़े और दस्तावेज जनता के सामने रखने चाहिए, संसद में बहस करनी चाहिए और न्यायिक रास्ता अपनाना चाहिए; लेकिन अगर हर चुनावी हार के बाद व्यवस्था पर सवाल और हर राजनीतिक असहमति के बाद किसी संवैधानिक पदाधिकारी के इस्तीफे की मांग राजनीतिक रणनीति बन जाए, तो फिर जनता यह सवाल पूछने के लिए मजबूर होगी कि आखिर इस राजनीति की अंतिम मंजिल क्या है।

शिक्षा मंत्री के इस्तीफे के बाद अब ज्ञानेश कुमार—क्या आंदोलन यहीं रुकेगा?

जुलाई में शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे के बाद अब मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग ने राजनीतिक आंदोलन को एक नए मोड़ पर ला खड़ा किया है। आंदोलन लोकतंत्र की ताकत है और जनता या राजनीतिक दलों को अपनी मांगों के लिए सड़क पर उतरने का पूरा अधिकार है, लेकिन सवाल यह है कि अगर आज ज्ञानेश कुमार इस्तीफा दे देते हैं तो क्या विपक्ष आंदोलन समाप्त कर देगा? क्या इसके बाद चुनाव आयोग पर भरोसा बहाल हो जाएगा? क्या EVM पर उठने वाले सवाल खत्म हो जाएंगे? क्या मतदाता सूची को लेकर विवाद समाप्त हो जाएगा? या फिर अगले चुनाव में कोई नया विवाद सामने आएगा और फिर किसी दूसरे संवैधानिक पदाधिकारी के इस्तीफे की मांग शुरू हो जाएगी? लोकतंत्र में किसी संस्था की आलोचना गलत नहीं है, लेकिन संस्थाओं के लगातार राजनीतिकरण से पैदा होने वाला अविश्वास अंततः उसी लोकतंत्र को कमजोर करता है जिसकी रक्षा का दावा हर राजनीतिक दल करता है।

2019 के बाद आंदोलन पर आंदोलन—क्या सड़क अब राजनीति का स्थायी मंच बनती जा रही है?

2019 के बाद देश ने किसान आंदोलन सहित कई बड़े आंदोलनों को देखा है और इन आंदोलनों ने कई बार सरकारों को अपने फैसलों पर पुनर्विचार करने के लिए मजबूर भी किया है। आंदोलन का अधिकार लोकतांत्रिक व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा है, लेकिन यहां एक फर्क समझना जरूरी है—जनहित के मुद्दे पर आंदोलन और चुनावी राजनीति को आंदोलन के सहारे लगातार आगे बढ़ाने में अंतर होता है। जब किसान अपनी फसल, कीमत या कानून को लेकर सड़क पर आता है तो उसके पीछे सीधा सामाजिक और आर्थिक हित होता है; जब छात्र शिक्षा व्यवस्था के खिलाफ आवाज उठाते हैं तो उनका अपना भविष्य दांव पर होता है; लेकिन जब राजनीतिक दल चुनाव परिणाम के बाद लगातार संस्थाओं की वैधता पर सवाल उठाते हैं तो जनता यह जानना चाहती है कि क्या यह संघर्ष सुधार के लिए है या फिर राजनीतिक हार का कारण तलाशने के लिए। लोकतंत्र में आंदोलन जरूरी है, लेकिन लोकतंत्र केवल आंदोलन का नाम नहीं है—लोकतंत्र चुनाव लड़ने, हार स्वीकार करने, जनता को समझाने और अगली बार बेहतर तैयारी के साथ वापस आने की क्षमता का नाम भी है।

जीत हुई तो जनता का फैसला, हार हुई तो चुनाव आयोग दोषी—यह दोहरा पैमाना कब तक?

विपक्ष के सामने सबसे बड़ा राजनीतिक सवाल यही है कि वह जनता के बीच अपनी विश्वसनीयता कैसे बनाएगा। अगर किसी चुनाव में विपक्ष जीतता है तो क्या वह यह कहेगा कि जनता ने लोकतांत्रिक तरीके से उसे चुना है और चुनाव आयोग ने निष्पक्ष चुनाव कराया है? अगर हां, तो उसी व्यवस्था में किसी दूसरे राज्य में हार मिलने पर सबसे पहले चुनाव आयोग की विश्वसनीयता पर सवाल क्यों? देश में ऐसे कई राज्य हैं जहां विपक्षी दलों ने उसी चुनावी व्यवस्था और उसी संवैधानिक ढांचे के तहत सरकारें बनाई हैं। तमिलनाडु, केरल, कर्नाटक और तेलंगाना जैसे राज्यों के चुनाव परिणामों को भी इसी लोकतांत्रिक व्यवस्था ने स्वीकार किया है। इसलिए विपक्ष को जनता को यह समझाना होगा कि समस्या किसी खास चुनाव परिणाम से है या पूरी चुनाव प्रक्रिया में कोई ऐसी संरचनात्मक खामी है जिसे वह प्रमाण के साथ साबित कर सकता है। क्योंकि अगर चुनाव आयोग सिर्फ उस समय सही है जब विपक्ष जीतता है और उस समय संदिग्ध हो जाता है जब विपक्ष हारता है, तो यह तर्क जनता के मन में बहुत लंबे समय तक टिक नहीं सकता।

EVM और चुनाव आयोग पर सवाल उठाना गलत नहीं, लेकिन सवाल का जवाब क्या सबूत से नहीं आना चाहिए

चुनाव आयोग की आलोचना लोकतंत्र विरोधी नहीं है। EVM, VVPAT, मतदाता सूची, SIR, चुनावी प्रक्रिया और आयोग की पारदर्शिता पर सवाल पूछना विपक्ष का अधिकार है और लोकतंत्र में जरूरी भी है। लेकिन किसी संस्था पर गंभीर आरोप लगाने के साथ उतनी ही गंभीर जिम्मेदारी भी आती है कि आरोपों के समर्थन में ठोस प्रमाण सामने रखे जाएं। केवल इसलिए कि कोई दल चुनाव हार गया, यह निष्कर्ष निकाल देना कि मशीनों ने उसे हरा दिया या चुनाव आयोग ने किसी राजनीतिक दल को जिताया, लोकतांत्रिक बहस को मजबूत नहीं करता। अगर गड़बड़ी है तो बूथवार आंकड़े सामने आएं, गलत तरीके से हटाए गए मतदाताओं के प्रमाण सामने आएं, तकनीकी जांच की मांग हो, न्यायालय में मामला जाए और संसद में बहस हो। लेकिन केवल राजनीतिक मंच से आरोप लगाने के बजाय प्रमाण की राजनीति करनी होगी, क्योंकि आज जनता पहले से कहीं ज्यादा सवाल पूछती है और वह यह भी देखती है कि कौन-सा दल अपनी सुविधा के अनुसार लोकतंत्र की परिभाषा बदल रहा है।

विपक्ष की असली चुनौती चुनाव आयोग नहीं, अपनी राजनीतिक विश्वसनीयता है

किसी भी लोकतंत्र में मजबूत विपक्ष जरूरी है। विपक्ष सरकार की गलतियों को सामने लाता है, जनता की आवाज संसद तक पहुंचाता है और सत्ता को जवाबदेह बनाता है। लेकिन विपक्ष की सबसे बड़ी पूंजी उसकी विश्वसनीयता होती है। यदि जनता को यह धारणा बनने लगे कि विपक्ष चुनाव हारने के बाद जनादेश को स्वीकार करने के बजाय लगातार किसी संस्था, EVM, मतदाता सूची या चुनाव प्रक्रिया को दोष देने में लग जाता है, तो धीरे-धीरे जनता का भरोसा भी कमजोर हो सकता है। विपक्ष को यह समझना होगा कि सरकार को चुनौती केवल आंदोलन से नहीं दी जा सकती; सरकार को सबसे बड़ी चुनौती चुनाव मैदान में दी जाती है। जनता के सामने अपना विकल्प मजबूत करके, संगठन मजबूत करके, उम्मीदवार मजबूत करके और अपनी नीतियों पर विश्वास पैदा करके। क्योंकि अंततः लोकतंत्र में सरकार को सड़क की भीड़ नहीं, वोट की ताकत बदलती है।

अगर ज्ञानेश कुमार आज इस्तीफा दें तो क्या कल नया आंदोलन नहीं होगा?

यही इस पूरे विवाद का सबसे बड़ा प्रश्न है। मान लीजिए ज्ञानेश कुमार इस्तीफा दे देते हैं, तो क्या विपक्ष यह लिखित रूप से कहेगा कि अब चुनाव आयोग पर उसका विश्वास बहाल हो गया? क्या SIR का विवाद समाप्त हो जाएगा? क्या EVM को लेकर सारे सवाल समाप्त हो जाएंगे? क्या अगले चुनाव का परिणाम विपक्ष के खिलाफ आने पर वह उसे उसी सहजता से स्वीकार करेगा? अगर इन सवालों का जवाब हां है तो फिर विपक्ष को अपनी मांग के साथ एक स्पष्ट लोकतांत्रिक रोडमैप भी जनता के सामने रखना चाहिए। लेकिन अगर इस्तीफा केवल अगले राजनीतिक संघर्ष की शुरुआत है तो जनता यह पूछने में बिल्कुल सही होगी कि आखिर संस्थाओं के इस्तीफे की यह श्रृंखला कहां जाकर रुकेगी। लोकतंत्र में किसी अधिकारी का इस्तीफा किसी भी समस्या का स्थायी समाधान नहीं हो सकता; समाधान संस्थागत सुधार, पारदर्शिता और प्रमाण आधारित जांच से आता है।

देश में अब —चुनाव जीतने की तैयारी होगी या चुनाव हारने के बाद आंदोलन की?

विपक्ष के लिए आज सबसे जरूरी सवाल यह नहीं है कि वह कितनी बड़ी रैली कर सकता है या कितने सांसदों को सड़क पर उतार सकता है। असली सवाल यह है कि वह जनता को अपने पक्ष में कितना भरोसा दिला सकता है। यदि उसे लगता है कि चुनाव व्यवस्था में गड़बड़ी है तो वह उसे साबित करे, यदि उसे लगता है कि मतदाता सूची में अन्याय हुआ है तो प्रभावित मतदाताओं को सामने लाए, यदि उसे EVM पर संदेह है तो तकनीकी और न्यायिक जांच की मांग करे और यदि उसे चुनाव आयोग की भूमिका पर आपत्ति है तो संवैधानिक प्रक्रिया के तहत उसे चुनौती दे। लेकिन इसके साथ उसे यह भी बताना होगा कि वह जनता का विश्वास कैसे जीतेगा। क्योंकि लोकतंत्र में सबसे आसान काम हार के बाद सवाल उठाना है, सबसे मुश्किल काम अपनी कमियों को स्वीकार करके अगली बार जनता को अपने पक्ष में खड़ा करना है।

अंतिम सवाल—लोकतंत्र में हार की भी कोई जगह है या नहीं?

भारत जैसे विशाल लोकतंत्र में हर राजनीतिक दल के लिए सबसे कठिन परीक्षा सिर्फ जीतना नहीं बल्कि हार को स्वीकार करना भी है। सत्ता पक्ष की जिम्मेदारी है कि वह विपक्ष के सवालों का जवाब दे, चुनाव आयोग की जिम्मेदारी है कि वह हर संदेह को पारदर्शिता से दूर करे और विपक्ष की जिम्मेदारी है कि वह हर चुनावी हार को षड्यंत्र बताने से पहले अपने राजनीतिक प्रदर्शन का भी हिसाब जनता को दे। अगर जीत को जनता का जनादेश और हार को चुनाव आयोग की साजिश बताया जाएगा, तो विपक्ष जनता के बीच अपनी विश्वसनीयता आखिर कैसे बनाएगा? यही वह सवाल है जिसका जवाब आज सिर्फ ज्ञानेश कुमार या चुनाव आयोग को नहीं, बल्कि पूरे राजनीतिक वर्ग को देना होगा। क्योंकि चुनाव आयोग पर सवाल उठते रह सकते हैं, सरकारें बदलती रह सकती हैं और राजनीतिक आंदोलन आते-जाते रह सकते हैं, लेकिन अगर जनता का चुनावी व्यवस्था से भरोसा ही टूट गया तो नुकसान किसी एक पार्टी का नहीं होगा—नुकसान उस लोकतांत्रिक व्यवस्था का होगा जिसमें सत्ता बदलने की ताकत आखिरकार जनता के वोट के पास है।


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