📰 फगवाड़ा, पंजाब और देश-दुनिया की अन्य सभी बड़ी खबरों के लिए
🔴 यहाँ क्लिक करके D-News Watch के मुख्य पृष्ठ (Home) पर जाएँनाना पाटेकर की विदाई के साथ भारतीय सिनेमा ने सिर्फ एक अभिनेता नहीं खोया है। उसने वह आवाज खोई है जो कभी गुस्से में व्यवस्था से सवाल करती थी, कभी रिश्तों की पीड़ा बयान करती थी और कभी सिर्फ एक संवाद बोलकर पूरे हॉल को हंसा देती थी।
मुंबई|गोवा, डी-न्यूज वाच
फिल्मी दुनिया से आई एक खबर ने करोड़ों दर्शकों को भीतर तक हिला दिया। नाना पाटेकर नहीं रहे। 75 साल की उम्र में दिग्गज अभिनेता ने गोवा स्थित अपने घर में अंतिम सांस ली।
उन्हें कार्डियक अरेस्ट के बाद अस्पताल ले जाया गया, जहां डॉक्टरों ने उन्हें बचाने की पूरी कोशिश की, लेकिन नाना को नहीं बचाया जा सका। उनके बेटे मल्हार पाटेकर ने निधन की पुष्टि की है।
नाना पाटेकर का जाना इसलिए भी भारी लग रहा है क्योंकि वह उन कलाकारों में नहीं थे जिन्हें सिर्फ फिल्म की कहानी में याद किया जाता है। वह फिल्म खत्म होने के बाद भी दर्शक के साथ चलते रहते थे। उनकी आवाज कानों में रह जाती थी, उनका चेहरा आंखों के सामने घूमता रहता था और उनके निभाए किरदार कई बार हमारी अपनी जिंदगी के किसी न किसी आदमी जैसे लगते थे। वह पर्दे पर आते थे तो अभिनय शुरू नहीं होता था, एक इंसान हमारे सामने खड़ा हो जाता था।
उनकी सबसे बड़ी ताकत उनका चेहरा नहीं, बल्कि उस चेहरे के पीछे छिपी बेचैनी थी। नाना जब गुस्सा करते थे तो लगता था सचमुच किसी बात से नाराज हैं। जब चुप रहते थे तो लगता था भीतर बहुत कुछ चल रहा है। जब किसी कमजोर आदमी की भूमिका निभाते थे तो उसकी मजबूरी दिखाई देती थी और जब व्यवस्था से लड़ते किरदार में आते थे तो दर्शक को लगता था कि उसकी अपनी आवाज बोल रही है। शायद इसी वजह से नाना पाटेकर के संवाद सिर्फ संवाद नहीं रहे—वे लोगों की बातचीत का हिस्सा बन गए।
‘परिंदा’, ‘क्रांतिवीर’, ‘अग्निसाक्षी’, ‘अब तक छप्पन’, ‘खामोशी’ और ‘नटसम्राट’ जैसी फिल्मों में उन्होंने अलग-अलग चेहरे दिखाए, लेकिन हर चेहरे में एक बात समान रही—किरदार बनावटी नहीं लगा। नाना ने खलनायक भी निभाया, पुलिस अधिकारी भी, पिता भी, टूटता हुआ कलाकार भी और व्यवस्था से लड़ता हुआ आदमी भी। उन्हें देखकर कभी ऐसा नहीं लगा कि अभिनेता अपने स्टारडम को किरदार के ऊपर रख रहा है। उल्टा, कई बार ऐसा लगा कि नाना खुद पीछे हट गए और किरदार आगे आ गया।
फिर वही नाना ‘वेलकम’ के उदय शेट्टी बनकर आए और पूरे देश को हंसा दिया। यह उनके अभिनय की खूबसूरती थी। जिस कलाकार को लोग गंभीर और तीखे किरदारों के लिए जानते थे, वही एक ऐसे किरदार में दिखाई दिया जिसे बच्चे तक पहचानने लगे। उदय शेट्टी के गुस्से में भी हास्य था, उसकी अकड़ में भी मासूमियत थी और उसकी परेशानियों में भी एक अजीब-सी अपनापन। नाना ने साबित कर दिया कि बड़ा अभिनेता वह नहीं जो सिर्फ गंभीर भूमिका कर सके, बल्कि वह है जो दर्शक को अपनी मर्जी से हंसा भी सके और रुला भी सके।
लेकिन नाना की असली याद सिर्फ फिल्मों में नहीं है। किसने सोचा था कि उनके जाने से एक दिन पहले अभिनेता अशोक सराफ जो किस्सा सुना रहे हैं उसे एक दिन बाद उनके पर सारा देश नम आँखों से सुनेगा। उनके जाने से ठीक एक दिन पहले अभिनेता अशोक सराफ ने नाना से जुड़ा एक पुराना किस्सा सुनाया था कि, एक नाटक के दौरान हालात बिगड़ गए और कलाकारों के लिए खतरा पैदा हो गया। तब नाना ने अशोक सराफ को भीड़ से बाहर निकाला, उन्हें सुरक्षित जगह पहुंचाने के लिए खुद रिक्शा चलाया और बाकी कलाकारों की सुरक्षा की भी चिंता की। एक कलाकार ने दूसरे कलाकार के लिए जो किया, वह नाना के इंसान होने की तस्वीर दिखाता है।
शायद यही नाना पाटेकर की सबसे बड़ी पहचान थी। पर्दे पर उनका चेहरा जितना कठोर दिखाई देता था, उनकी जिंदगी की ऐसी कहानियां उनके भीतर के संवेदनशील इंसान की झलक देती थीं। वह चमक-दमक वाली फिल्मी दुनिया में रहते हुए भी अपने अलग अंदाज के लिए जाने गए। उन्हें देखकर लगता था कि यह आदमी अभिनय करने नहीं आया, बल्कि अपने आसपास की जिंदगी को समझकर उसे पर्दे पर उतारने आया है।
नाना का सफर भी आसान नहीं था। उन्होंने रंगमंच से शुरुआत की और धीरे-धीरे हिंदी तथा मराठी सिनेमा में अपनी जगह बनाई। उन्होंने सिर्फ अभिनेता के रूप में ही नहीं, बल्कि निर्देशक के तौर पर भी काम किया। ‘प्रहार’ इसका उदाहरण है। उन्हें राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कारों से लेकर पद्म श्री तक कई बड़े सम्मान मिले, लेकिन शायद नाना के लिए सबसे बड़ा सम्मान वह था जो उन्हें किसी पुरस्कार समारोह में नहीं, बल्कि सिनेमा हॉल से निकलते हुए दर्शकों की बातचीत में मिलता था।
आज उनकी फिल्मों के दृश्य फिर से याद आएंगे। कोई ‘क्रांतिवीर’ का नाना खोजेगा, कोई ‘नटसम्राट’ का और कोई ‘वेलकम’ का उदय शेट्टी। कोई उनकी पुरानी आवाज सुनकर मुस्कुराएगा तो किसी की आंखें भर आएंगी। यही किसी कलाकार की असली जिंदगी है—वह चला जाता है, लेकिन उसके किरदार लोगों के बीच रह जाते हैं।
नाना पाटेकर की विदाई के साथ भारतीय सिनेमा ने सिर्फ एक अभिनेता नहीं खोया है। उसने वह आवाज खोई है जो कभी गुस्से में व्यवस्था से सवाल करती थी, कभी रिश्तों की पीड़ा बयान करती थी और कभी सिर्फ एक संवाद बोलकर पूरे हॉल को हंसा देती थी।
आज नाना को अलविदा कहते हुए शायद उनके किसी किरदार का संवाद याद आ जाए, कोई दृश्य आंखों के सामने आ जाए या उनकी वह भारी आवाज कानों में सुनाई दे जाए। और तब महसूस होगा कि कुछ कलाकारों की मौत सिर्फ खबर बनकर नहीं आती। वह हमारी यादों में एक खाली जगह छोड़ जाती है।
नाना पाटेकर चले गए हैं।
लेकिन उनकी आवाज अभी बाकी है।
उनके किरदार अभी बाकी हैं।
उनके संवाद अभी बाकी हैं।
और सबसे बड़ी बात—उनकी याद अभी बाकी है।
अलविदा नाना… पर्दा गिर गया है, लेकिन आपका अभिनय कभी खत्म नहीं होगा।
भावपूर्ण श्रद्धांजलि।
Discover more from D-News Watch
Subscribe to get the latest posts sent to your email.
📰 फगवाड़ा, पंजाब और देश-दुनिया की अन्य सभी बड़ी खबरों के लिए
👉 यहाँ क्लिक करके D-News Watch के मुख्य पृष्ठ (Home) पर जाएँ
