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SAD पुराने पंथक आधार को बचाने की जद्दोजहद में, तो कांग्रेस प्रधानगी की खींचतान में घिरी।

क्या 2027 में मुकाबला सिर्फ सत्ता का होगा या पंजाब के पुराने राजनीतिक समीकरणों का भी होगा हिसाब ? पढ़िए—पंजाब की बदलती सियासी तस्वीर का यह खास विश्लेषण।

विश्लेषण | दिग्विन्द्र राणा

पंजाब की राजनीति में इन दिनों एक दिलचस्प बदलाव दिखाई दे रहा है। जिन धार्मिक और सामाजिक प्रतीकों से राजनीतिक दल कभी दूरी बनाकर चलने में ही अपनी भलाई समझते थे, अब वही प्रतीक चुनावी रणनीति के केंद्र में आते दिखाई दे रहे हैं।
भगवान राम और शिव से लेकर गुरु रविदास जी तक… हिंदू से सिख और दलित से जाट सिख तक… पंजाब में राजनीतिक दल अब हर उस सामाजिक समूह तक पहुंच बनाने की कोशिश कर रहे हैं, जिसे वे कल तक शायद उतनी गंभीरता से नहीं देख रहे थे।
और इस पूरे बदलाव के बीच एक सवाल सबसे ज्यादा चुभता है—

AAP को क्यों याद आए राम और शिव?

भगवंत मान सरकार की ओर से धार्मिक कार्यक्रमों का आयोजन और ‘एक शाम भगवान शिव के नाम’, ‘हमारे राम’ जैसी पहलें महज धार्मिक आयोजन मानकर नजरअंदाज कर देना शायद राजनीतिक रूप से सही नहीं होगा।
यह बदलाव एक संदेश देता है—पंजाब के हिंदू मतदाता की राजनीतिक अहमियत अब कोई पार्टी नजरअंदाज नहीं करना चाहती।
AAP ने पंजाब की सत्ता संभालने के बाद खुद को परंपरागत राजनीति से अलग बताने की कोशिश की थी। लेकिन राजनीति में विचारधारा से ज्यादा महत्वपूर्ण कभी-कभी चुनावी गणित हो जाता है।
पंजाब में हिंदू आबादी 2011 की जनगणना के अनुसार करीब 38.5 प्रतिशत है और शहरी पंजाब में इसका अनुपात काफी अधिक बताई जाती है। ऐसे में यदि AAP धार्मिक-सांस्कृतिक आयोजनों के जरिए हिंदू समाज से अपना संवाद बढ़ाती है, तो इसे केवल आस्था का विषय मानना राजनीतिक तस्वीर के आधे हिस्से से मुंह फेरना होगा।
यह संदेश हो सकता है कि AAP को अब समझ आ गया है कि पंजाब में हिंदू वोट को सिर्फ ‘स्वाभाविक रूप से साथ आने वाला’ वोट मानकर नहीं चला जा सकता।

BJP की नजर सिर्फ दलित वोट पर नहीं

BJP के गुरु रविदास जी की 650वीं जयंती से जुड़े कार्यक्रमों और ‘समरसता’ अभियान को भी केवल दलित वोट की राजनीति कहना जल्दबाजी होगी।
गुरु रविदास जी का नाम पंजाब के सामाजिक इतिहास और दलित चेतना में बेहद महत्वपूर्ण है। ऐसे में रविदासिया और दलित समाज के बीच पहुंच बढ़ाना BJP की रणनीति का स्वाभाविक हिस्सा हो सकता है।
लेकिन BJP की असली कहानी इससे कुछ बड़ी है।
पार्टी एक साथ तीन दिशाओं में बढ़ती दिखाई दे रही है—हिंदू आधार को मजबूत रखना, सिख समाज में जगह बनाना और दलित समाज तक पहुंच बढ़ाना।
यही कारण है कि केवल सिंह ढिल्लों को पंजाब BJP की कमान सौंपने को भी सिर्फ एक संगठनात्मक नियुक्ति मानना मुश्किल है।
एक राष्ट्रीय पार्टी, जिसे पंजाब में लंबे समय से मुख्यतः शहरी हिंदू समर्थन वाली पार्टी के रूप में देखा जाता रहा, पहली बार एक जाट सिख नेता को प्रदेश अध्यक्ष बनाती है। क्या यह महज संयोग है? शायद नहीं। मालवा से आने वाले जाट सिख चेहरे को आगे करके BJP ने एक साथ कई संदेश देने की कोशिश की है—किसान, ग्रामीण पंजाब, जाट सिख और व्यापक सिख समाज। यानी BJP अब केवल यह नहीं कह रही कि ‘हिंदू हमारे साथ हैं।’वह शायद यह भी कह रही है—“पंजाब में हमें सिख समाज के बीच भी स्वीकार्यता चाहिए।”

जाट सिख को साधना क्यों महत्वपूर्ण है?

पंजाब की राजनीति को केवल धार्मिक आंकड़ों से समझना संभव नहीं है।
जाट सिखों का कोई आधिकारिक सरकारी वोट प्रतिशत उपलब्ध नहीं है, लेकिन कृषि, किसान राजनीति और ग्रामीण पंजाब में उनका प्रभाव लंबे समय से राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण रहा है।
खासकर मालवा क्षेत्र की राजनीति में जाट सिख प्रभाव को नजरअंदाज करना किसी भी पार्टी के लिए आसान नहीं।
ऐसे में बीजेपी का जाट सिख चेहरा आगे करना इस बात का संकेत है कि पार्टी अब पंजाब में ‘शहरी हिंदू पार्टी’ की अपनी सीमित छवि से बाहर निकलने की कोशिश कर रही है।
सिख समाज से जुड़े मुद्दे, किसान, नशा, रोजगार, उद्योग और सीमा सुरक्षा जैसे विषयों को उठाने की कोशिश भी इसी व्यापक रणनीति का हिस्सा दिखाई देती है।
अगर इसे एक लाइन में कहें तो BJP शायद पंजाब के लिए नया सामाजिक फार्मूला तलाश रही है—
हिंदू आधार + सिख पहुंच + जाट प्रभाव + दलित समरसता।
अब यह फार्मूला वोट में कितना बदलता है, यह अलग सवाल है।
लेकिन कोशिश यही दिखाई दे रही है।

पंजाब का वोट गणित

2011 की जनगणना के अनुसार पंजाब में सिख आबादी 57.69 प्रतिशत और हिंदू आबादी 38.49 प्रतिशत थी। अनुसूचित जाति की आबादी करीब 31.94 प्रतिशत है।
यहां यह भी महत्वपूर्ण है कि- SC आबादी धर्म से अलग सामाजिक श्रेणी है। इसमें सिख और हिंदू दोनों शामिल हैं। इसलिए SC के 31.94 प्रतिशत को सिख या हिंदू आबादी में जोड़कर कोई नया वोट प्रतिशत निकालना सही नहीं होगा।
जाट सिखों का भी कोई आधिकारिक सरकारी प्रतिशत उपलब्ध नहीं है। लेकिन राजनीतिक प्रभाव केवल संख्या से तय नहीं होता। कई बार किसी समुदाय का सामाजिक, आर्थिक और क्षेत्रीय प्रभाव उसकी आबादी के प्रतिशत से कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण हो जाता है।
और पंजाब में जाट सिख इसका बड़ा उदाहरण हैं।

क्षेत्र भी बोलते हैं

मालवा में जाट सिख प्रभाव, बड़ी ग्रामीण आबादी और दलित मतदाताओं की महत्वपूर्ण मौजूदगी चुनावी समीकरणों को प्रभावित करती है। BJP के लिए यहां जाट सिख और दलित पहुंच बढ़ाना महत्वपूर्ण हो सकता है।
माझा में सिख पहचान, धार्मिक-पंथक मुद्दे और सीमा से जुड़े सवाल राजनीतिक रूप से अधिक संवेदनशील हैं। यहां BJP के लिए सिख समाज में स्वीकार्यता बढ़ाना चुनौती भी है और अवसर भी।
दोआबा में सिख और हिंदू दोनों का प्रभाव है तथा दलित आबादी भी राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण है। इसलिए यहां सामाजिक संतुलन की राजनीति किसी भी पार्टी के लिए अहम हो जाती है।
यानी पंजाब को एक ही वोट बैंक के चश्मे से देखना अब शायद पुरानी गलती होगी।

…और कांग्रेस कि दुविधा

यहीं से कहानी थोड़ी दिलचस्प और थोड़ी निराशाजनक हो जाती है।
कुछ सप्ताह या कुछ महीने पहले तक AAP सरकार के खिलाफ संभावित एंटी-इनकम्बेंसी की चर्चा के बीच कांग्रेस को सबसे मजबूत विपक्षी विकल्प माना जा रहा था।
स्वाभाविक भी था।
सत्ता में AAP थी।
BJP अभी पंजाब में अपने विस्तार की कोशिश कर रही थी।
SAD अपने पुराने प्रभाव को वापस पाने की लड़ाई लड़ रहा था।
ऐसे में कांग्रेस के पास सबसे स्वाभाविक राजनीतिक मौका था।
लेकिन मौका और उसका इस्तेमाल—दो अलग बातें हैं।
जब दूसरे दल मतदाताओं के सामाजिक समीकरण पढ़ रहे हैं, कांग्रेस में प्रदेश नेतृत्व और संगठन को लेकर खींचतान की खबरें सामने आती रहती हैं।
कभी प्रदेश प्रधान की कुर्सी चर्चा में रहती है।
कभी नेतृत्व।
कभी गुट।
कभी संगठन।
और मतदाता?
वह इन सबको देखकर शायद यही पूछ रहा होगा—मेरे मुद्दे पर कौन बात करेगा?
अमरिंदर सिंह राजा वडिंग हों या पूर्व मुख्यमंत्री चरणजीत सिंह चन्नी, कांग्रेस के पास चेहरे हैं। राहुल गांधी के नेतृत्व में राष्ट्रीय स्तर पर भी पार्टी सक्रिय है।
लेकिन पंजाब में सिर्फ चेहरे काफी नहीं हैं।
सवाल यह है कि कांग्रेस के पास 2027 के लिए स्पष्ट सामाजिक और राजनीतिक गठजोड़ का जवाब क्या है?

पंथक आधार लौटा पाने की जद्दोजहद में लगे SAD को भूलना भी गलत होगा…

शिरोमणि अकाली दल को इस पूरे समीकरण से बाहर कर देना भी सही नहीं होगा।
SAD लंबे समय तक पंजाब की सिख-पंथक राजनीति का सबसे बड़ा राजनीतिक केंद्र रहा है। BJP से अलग राह पर जाने के बाद पार्टी अपने पुराने सिख-पंथक और ग्रामीण आधार को फिर मजबूत करने की कोशिश कर रही है।
लेकिन समय बदल चुका है।
शहरी पंजाब में उसकी पकड़ पहले जैसी नहीं रही।
युवा मतदाता पहले की तरह पारंपरिक राजनीतिक पहचान से बंधा हुआ नहीं है।
और AAP ने पंजाब की सत्ता पर कब्जा करके पुराने राजनीतिक समीकरणों को पहले ही उलट दिया है।
ऐसे में SAD के सामने सवाल है कि वह अपने पारंपरिक आधार को सिर्फ भावनात्मक मुद्दों के सहारे वापस लाएगा या नई पीढ़ी और नए पंजाब के लिए कोई नया राजनीतिक एजेंडा भी देगा।
7 अगस्त 2026 को सुखबीर सिंह बादल और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की मुलाकात के बाद BJP-SAD रिश्तों को लेकर चर्चाएं फिर तेज हुई हैं। अभी किसी नए गठबंधन की आधिकारिक घोषणा नहीं हुई है।
लेकिन राजनीति में कई बार घोषणा से पहले संकेत आने लगते हैं।
अगर BJP और SAD भविष्य में फिर किसी राजनीतिक समझ तक पहुंचते हैं, तो 2027 का चुनावी गणित निश्चित रूप से बदल सकता है।

फिलहाल मुकाबला किसके बीच?

मौजूदा राजनीतिक परिस्थितियों को देखें तो AAP के पास प्रदेश की सत्ता है तो भाजपा केंद्र की सत्ता और जीत के रथ पर सवार ही नहीं बल्कि बंगाल विजय के बाद उसके हौसले अपने यौवन पर हैं।
आप को  एंटी-इनकम्बेंसी से मुकाबला करना है। उसने हिंदू समाज के साथ अपना सांस्कृतिक संवाद बढ़ाना शुरू किया है।
BJP के पास केंद्र की ताकत और पंजाब में अपना सामाजिक आधार विस्तार करने की रणनीति है।
हिंदू आधार उसके पास पहले से है।
अब वह सिख, जाट और दलित समाज में जगह बनाने की कोशिश कर रही है।
SAD अपने पुराने सिख-पंथक आधार को फिर से संगठित करने की कोशिश में है।
और कांग्रेस?
कांग्रेस के पास शायद सबसे बड़ा अवसर था, लेकिन सवाल यह है कि क्या वह उस अवसर को राजनीतिक ताकत में बदलने के बजाय संगठनात्मक खींचतान में गंवा रही है?

असली लड़ाई वोट की नहीं, नए गठजोड़ की है

2027 का पंजाब चुनाव सिर्फ यह तय नहीं करेगा कि मुख्यमंत्री की कुर्सी पर कौन बैठेगा।
यह यह भी तय करेगा कि पंजाब में आने वाले वर्षों की राजनीति का नया सामाजिक गठजोड़ क्या होगा।
क्या हिंदू मतदाता किसी एक पार्टी का स्थायी आधार रहेगा?
क्या सिख मतदाता पुराने राजनीतिक घरों में ही लौटेगा?
क्या दलित समाज पहले की तरह किसी एक राजनीतिक खेमे में रहेगा?
क्या जाट सिखों की राजनीतिक पसंद फिर किसी एक दल के साथ मजबूती से जुड़ेगी?
या पंजाब का मतदाता इन सभी पहचान से ऊपर उठकर सरकार के काम, स्थानीय मुद्दों, रोजगार, नशे, किसान, उद्योग और कानून-व्यवस्था के आधार पर फैसला करेगा?
यही असली परीक्षा है, और यही वह जगह है जहां कांग्रेस को सबसे ज्यादा आत्ममंथन की जरूरत है।

अंतिम सवाल कांग्रेस से

AAP को भगवान राम और शिव महादेव की याद आ गई।
BJP को गुरु रविदास जी की समरसता के साथ सिख और जाट समाज तक पहुंच बनाने की जरूरत महसूस हो रही है।
SAD अपने पुराने सिख-पंथक आधार को फिर से खड़ा करने में लगा है।
लेकिन कांग्रेस?
वह अभी भी इस सवाल में उलझी दिखाई देती है कि पंजाब में उसका अगला नेता कौन होगा।
राजनीति में इससे बड़ा अवसर गंवाने की स्थिति शायद ही कोई हो।
क्योंकि जनता चुनाव के समय यह नहीं पूछती कि किस गुट की कुर्सी बची और किसकी गई।
वह पूछती है—
“मेरे लिए कौन खड़ा है?”
पंजाब का सामाजिक समीकरण बदल रहा है।
राम-शिव से रविदास तक, हिंदू से सिख तक, जाट से दलित तक—हर राजनीतिक दल अपना नया रास्ता तलाश रहा है।
2027 में शायद सबसे बड़ा मुकाबला पार्टियों के बीच नहीं, बल्कि पुरानी राजनीति और बदलते पंजाब के बीच होगा।
और जो पार्टी इस बदलाव को सबसे पहले समझ लेगी, वही शायद चुनावी मैदान में सबसे आगे निकल जाएगी।
क्योंकि राजनीति में सबसे बड़ा खतरा विरोधी का मजबूत होना नहीं है।
बल्कि सबसे बड़ा खतरा यह है कि समाज बदल जाए और पार्टी की सोच वहीं की वहीं रह जाए…!


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