
आज इंसान चाँद पर पहुँच चुका है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता का युग है। दुनिया हमारी हथेली में सिमट गई है। लेकिन इस तेज रफ्तार दौर में यदि सबसे अधिक कुछ बिखर रहा है, तो वह है—रिश्तों का संसार। कभी घर केवल ईंट-पत्थर से नहीं, बल्कि प्रेम, विश्वास, त्याग और सम्मान से बनते थे। संयुक्त परिवार हमारी सबसे बड़ी ताकत थे। दादा-दादी की सीख, माता-पिता का स्नेह और भाई-बहनों का अपनापन जीवन की सबसे बड़ी पूँजी हुआ करता था। मतभेद होते थे, लेकिन मनभेद नहीं। नाराजगी होती थी, पर रिश्ते नहीं टूटते थे। आज सुविधाएँ बढ़ी हैं, लेकिन संवेदनाएँ घटती जा रही हैं। मकान बड़े हो गए हैं, मगर दिल छोटे पड़ते जा रहे हैं। मोबाइल में हजारों संपर्क हैं, लेकिन मन की बात सुनने वाला अपना इंसान कम होता जा रहा है। हमारे सिनेमा ने भी कभी परिवारों को जोडऩे का काम किया था। फिल्में केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि रिश्तों की गर्माहट और संस्कारों का संदेश देती थीं। आज मोबाईल फोन और इंटरनैट ने बाल अवस्था में सुनी जाने वाली दादी-नानी और पंच तंत्र की कहानियों से लेकर उपन्यास और परिवारिक यथार्थवादी कला-कृतियों से हमें दूर कर दिया है। जब से केबल टी.वी. ने निम्र-मध्यवर्गीय घरों में घुसपैठ की है, तब से सास-बहु, ननद-भाभी, भाई-भाई और मायके-ससुराल के रिश्तों का आपसी विश्वास तार-तार करने में काल्पनिक कहानियों पर आधारित धारावाहिकों ने भी लगातार नाकारात्मक भूमिका निभाई है। फलस्वरूप, आज हृदयों से परिवारिक स्नेह और संवेदनाओं की अनुभूति गायब होने लगी हैं। हमारी संस्कृति में बेटी को यह संस्कार देकर विदा किया जाता था कि ससुराल केवल पति का घर नहीं, बल्कि एक पूरा परिवार है। डोली में जाना और उसी घर से अंतिम विदाई का अर्थ किसी बेटी की स्वतंत्रता छीनना नहीं, बल्कि रिश्तों को निभाने का संकल्प था। समय बदला है और बदलाव आवश्यक भी है। हर बेटी को सम्मान, सुरक्षा और समान अधिकार मिलना ही चाहिए। लेकिन यह भी एक कड़वी सच्चाई है कि आजकल विवाह के कुछ ही समय बाद चूल्हा चौका अलग करने की बातें शुरु हो जाती हैं। कई बार बाजे-गाजे से घर आई बहू के स्वागत की खुशियाँ कुछ ही दिनों में बँटवारे के दंश से घायल दिखाई पड़ती हैं। कहीं अहंकार रिश्तों पर भारी पड़ता है, तो कहीं अपेक्षाओं का बोझ प्रेम को दबा देता है। दहेज और घरेलू हिंसा के विरुद्ध बने कानून महिलाओं की सुरक्षा के लिए आवश्यक हैं, लेकिन यदि किसी भी कानून का दुरुपयोग होता है, तो उसका दर्द निर्दोष परिवार भी झेलते हैं। हालांकि यह भी सच है कि अनेक महिलाएं वास्तव में उत्पीडऩ का शिकार होती हैं। इसलिए दोष किसी एक पक्ष का नहीं, उस सोच का है जिसमें संवाद की जगह टकराव और अपनत्व की जगह अहंकार ले लेता है। परिवार तब तक परिवार रहता है, जब तक उसमें मैं से अधिक हम की भावना जीवंत रहती है। रिश्ते किसी मशीन की तरह नहीं होते जिन्हें खराब होने पर बदल दिया जाए। वे पौधों की तरह होते हैं, जिन्हें विश्वास, धैर्य, संवाद और प्रेम से सींचना पड़ता है। जो व्यक्ति हर बहस जीतना चाहता है, वह अक्सर अपने सब रिश्ते हार जाता है। इस कटु सत्य को शायद कोई नहीं समझना चाहता कि जीवन की अंतिम यात्रा में न धन साथ जाता है, न पद, न शोहरत। साथ जाते हैं सिर्फ कर्म और पीछे छूट जाती हैं तो केवल यादें। टूटे हुए रिश्तों की आवाज़ बाहर नहीं सुनाई देती, लेकिन उनकी गूँज पीढिय़ों तक सुनाई देती रहती है। जीवन में धन-दौलत और शोहरत कमाने की लालसा बुरी नहीं यदि यह मान कर चला जाये कि रिश्ते ही वह वास्तिवक पूँजी और सबसे बड़ी विरासत हैं, जो आने वाली पीढिय़ों के लिए सबसे अनमोल उपहार होगा।
