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2014 से बदला मतदाता का मिजाज, लेकिन क्या विपक्ष ने अपनी राजनीति बदली? गठबंधन में खींचतान, नेतृत्व की उलझन और हर हार के बाद चुनावी व्यवस्था पर सवाल—अब जनता विपक्ष से भी जवाब चाहती है।

नई दिल्ली | D-News Watch

चुनाव में हारने वाली पार्टी के पास दो रास्ते होते हैं। पहला, वह जनता के फैसले को समझे, अपनी गलतियों की समीक्षा करे और अगली बार बेहतर तैयारी के साथ मैदान में उतरे। दूसरा, वह अपनी हार के लिए ऐसे कारणों को जिम्मेदार ठहराए जिनसे उसकी अपनी राजनीतिक जिम्मेदारी पीछे छूट जाए। भारतीय विपक्ष की मौजूदा राजनीति को देखते हुए सवाल उठता है कि वह इन दोनों में से किस रास्ते पर आगे बढ़ रहा है?

‘वोट चोरी’ के आरोपों को इसी सवाल के साथ देखना जरूरी है। अगर मतदाता सूची में गड़बड़ी हुई है, किसी पात्र मतदाता का नाम गलत तरीके से हटाया गया है या मतदान प्रक्रिया में अनियमितता हुई है, तो उसकी जांच होनी चाहिए। लोकतंत्र में चुनावी निष्पक्षता पर सवाल उठाना कोई अपराध नहीं है। लेकिन क्या हर चुनावी हार का सबसे बड़ा कारण चुनावी गड़बड़ी ही है? क्या विपक्ष अपनी रणनीति, नेतृत्व और जनता से जुड़ाव की कमजोरियों पर भी उतनी ही गंभीरता से सवाल उठा रहा है?

2014, 2019 और 2024: जनता के फैसले को समझने में कहां चूक रहा है विपक्ष?

2014 के लोकसभा चुनाव में महंगाई, भ्रष्टाचार और बदलाव की उम्मीद ने राजनीतिक माहौल को प्रभावित किया। भाजपा ने 282 सीटें हासिल कीं और अपने दम पर बहुमत पाया। 2019 में पुलवामा के बाद बालाकोट की हवाई कार्रवाई, राष्ट्रीय सुरक्षा और मजबूत नेतृत्व चुनावी चर्चा के प्रमुख विषय बने। भाजपा की सीटें बढ़कर 303 हो गईं।

2024 में तस्वीर बदल गई। राम मंदिर निर्माण, अनुच्छेद 370 हटाने और अपने शासनकाल की उपलब्धियों को सामने रखने के बावजूद भाजपा 240 सीटों पर रह गई। दूसरी तरफ कांग्रेस ने अपनी सीटें 2019 की 52 से बढ़ाकर 99 कर लीं और विपक्षी गठबंधन ने भाजपा को अपने दम पर बहुमत से दूर रखने में अहम भूमिका निभाई।

इन नतीजों से एक बात साफ है—मतदाता का फैसला स्थायी नहीं होता। सरकार की उपलब्धियां, जनता की अपेक्षाएं, महंगाई, रोजगार, स्थानीय उम्मीदवार, सामाजिक समीकरण और विपक्ष की रणनीति, सभी चुनाव को प्रभावित कर सकते हैं। 2024 में भाजपा की सीटें कम हुईं तो उसके पीछे राजनीतिक कारणों की जांच होनी चाहिए। लेकिन यदि विपक्ष अपनी सफलता का श्रेय जनता के समर्थन को देता है, तो उसे अपनी असफलताओं के कारण भी निष्पक्षता से देखने चाहिए।

पहली बड़ी गलती: एकजुटता का दावा, लेकिन जमीन पर टकराव

विपक्षी दलों ने भाजपा को चुनौती देने के लिए INDIA गठबंधन बनाया था। इसका उद्देश्य था कि अलग-अलग राज्यों में मजबूत दल एक-दूसरे के वोट न काटें और भाजपा के सामने प्रभावी मुकाबला खड़ा करें। 2024 के लोकसभा चुनाव में इस रणनीति से कुछ राज्यों में विपक्ष को फायदा भी हुआ।

लेकिन गठबंधन का असली इम्तिहान केवल लोकसभा चुनाव में सीटें बांटने से नहीं होता। असली परीक्षा तब होती है, जब सहयोगी दलों को अपने राजनीतिक हितों से समझौता करना पड़े। दिल्ली में 2025 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस और आम आदमी पार्टी अलग-अलग मैदान में उतरीं। दोनों भाजपा को चुनौती दे रही थीं, लेकिन एक-दूसरे के खिलाफ भी चुनाव लड़ रही थीं। ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक था कि क्या विपक्षी दल भाजपा को हराने के लिए एकजुट थे या अपनी-अपनी राजनीतिक जमीन बचाने में ज्यादा व्यस्त थे?

कांग्रेस और क्षेत्रीय दलों के बीच नेतृत्व, सीटों और राजनीतिक प्रभाव को लेकर खींचतान की समस्या भी नई नहीं है। राष्ट्रीय स्तर पर एकजुटता का संदेश देने वाले दल जब राज्यों में एक-दूसरे को कमजोर करने लगते हैं, तो स्वभाविक रूप से ईवीएम धोखा देती है और मतदाता के सामने विपक्ष की विश्वसनीयता का सवाल खड़ा होता है। अगर विपक्ष अपने सहयोगियों के साथ सीटों और नेतृत्व पर सहमति नहीं बना सकता, तो वह देश के सामने एक स्थिर और प्रभावी विकल्प कैसे पेश करेगा?

दूसरी गलती: भाजपा का विरोध तो है, लेकिन अपनी वैकल्पिक योजना कहां है?

किसी भी लोकतंत्र में विपक्ष का काम सरकार की गलतियों को उजागर करना है। लेकिन केवल विरोध करना ही पर्याप्त नहीं होता। जनता यह भी जानना चाहती है कि अगर विपक्ष सत्ता में आया, तो वह महंगाई कैसे कम करेगा, रोजगार के अवसर कैसे बढ़ाएगा, सरकारी स्कूलों और अस्पतालों की स्थिति कैसे सुधारेगा और भ्रष्टाचार पर लगाम लगाने के लिए क्या करेगा। यदि विपक्ष बेरोजगारी पर सवाल उठाता है, तो उसे अपनी रोजगार नीति भी स्पष्ट करनी चाहिए। यदि वह महंगाई को मुद्दा बनाता है, तो जनता को यह भी बताना चाहिए कि उसके पास कीमतों को नियंत्रित करने और आम परिवारों की आय बढ़ाने की क्या योजना है। यदि वह लोकतांत्रिक संस्थाओं की निष्पक्षता पर चिंता जताता है, तो उसे संस्थागत सुधारों का ठोस खाका भी सामने रखना चाहिए। सरकार की आलोचना करना आसान है; उसका व्यावहारिक विकल्प पेश करना कठिन। लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर सत्ता की दावेदारी करने वाली पार्टी से यही अपेक्षा की जाती है।

तीसरी गलती: नेतृत्व का सवाल अब भी पूरी तरह हल नहीं

कांग्रेस राष्ट्रीय विपक्ष की सबसे बड़ी पार्टी है, लेकिन विपक्षी गठबंधन में कई क्षेत्रीय दलों के अपने-अपने मजबूत नेता और राजनीतिक हित हैं। ऐसे में यह सवाल बार-बार उठता है कि गठबंधन की साझा रणनीति कौन तय करता है? चुनावी हार की जिम्मेदारी कौन लेता है? और मतदाताओं के सामने विपक्ष का साझा चेहरा तथा साझा कार्यक्रम क्या है? राहुल गांधी विपक्ष की राजनीति में प्रमुख भूमिका निभाते हैं। उन्हें सरकार से सवाल पूछने और चुनावी प्रक्रिया पर चिंता जताने का पूरा अधिकार है। लेकिन एक राष्ट्रीय नेता के रूप में उनकी जिम्मेदारी केवल सरकार को कठघरे में खड़ा करने तक सीमित नहीं हो सकती। उन्हें यह भी दिखाना होगा कि विपक्ष अपने संगठन को कैसे मजबूत करेगा, सहयोगियों के साथ मतभेद कैसे सुलझाएगा और जनता के लिए किस तरह की वैकल्पिक राजनीति पेश करेगा। नेतृत्व का मूल्यांकन केवल भाषणों या संसद में सरकार को घेरने से नहीं, बल्कि संगठन खड़ा करने, चुनावी रणनीति बनाने और जनता का भरोसा जीतने से भी होता है।

चौथी गलती: हार के बाद समीक्षा कम, आरोप ज्यादा दिखाई देते हैं

यहाँ ‘नाच न जाने, आंगन टेढ़ा’ वाली कहावत याद आती है। क्या लगातार चुनावी निराशा झेल रहा विपक्ष अपनी कमजोरियों को स्वीकार करने के बजाय चुनावी व्यवस्था को ही दोष देने लगा है? यह सवाल विपक्ष से भी पूछा जायेगा। बेशक इसका जवाब पहले से तय नहीं किया जा सकता और चुनावी अनियमितता के आरोपों को केवल इसलिए खारिज नहीं किया जा सकता कि आरोप लगाने वाली पार्टी चुनाव हार गई। उसी तरह, किसी आरोप को केवल इसलिए सच भी नहीं मान लेना चाहिए कि उसे प्रेस कॉन्फ्रेंस में जोरदार तरीके से पेश किया गया है।

2025 में राहुल गांधी ने कर्नाटक के महादेवपुरा विधानसभा क्षेत्र की मतदाता सूची में कथित गड़बड़ियों का आरोप लगाया था। कर्नाटक के मुख्य निर्वाचन अधिकारी ने उनसे आरोपों के समर्थन में शपथपत्र और संबंधित मतदाताओं का विवरण देने को कहा था। ऐसे मामलों में जरूरी है कि आरोपों को स्पष्ट दस्तावेजों, नामों, रिकॉर्ड और जांच के आधार पर परखा जाए। विपक्ष की जिम्मेदारी है कि गंभीर आरोप लगाए तो उनके समर्थन में ठोस प्रमाण भी पेश करे। निर्वाचन आयोग की जिम्मेदारी है कि शिकायतों का पारदर्शी और भरोसेमंद तरीके से जवाब दे। दोनों में से किसी को भी अपनी जिम्मेदारी से बचने का अवसर नहीं मिलना चाहिए। सवाल आरोप लगाने के अधिकार का नहीं, आरोप को प्रमाणित करने और उसका जवाब देने की जिम्मेदारी का है।

पांचवीं गलती: क्या विपक्ष जनता की नाराजगी को अपना स्थायी समर्थन समझ बैठा?

किसी सरकार से नाराजगी होना और विपक्ष को सत्ता सौंपने के लिए तैयार होना दो अलग बातें हैं। मतदाता सरकार से असंतुष्ट हो सकता है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि वह अपने आप विपक्ष पर भरोसा करने लगेगा। 2024 के चुनाव में भाजपा का अपने दम पर बहुमत से दूर रहना विपक्ष के लिए एक अवसर था। कांग्रेस और उसके सहयोगियों ने बेहतर प्रदर्शन किया। लेकिन किसी एक चुनाव में सफलता मिलना स्थायी राजनीतिक बदलाव की गारंटी नहीं है। उस समर्थन को बनाए रखने के लिए संगठन, स्थानीय नेतृत्व, गठबंधन की एकजुटता और लगातार जनसंपर्क जरूरी होता है। विपक्ष के सामने चुनौती यही है कि वह चुनावी सफलता को स्थायी जनाधार में बदले। यदि वह हर राज्य में अलग रणनीति अपनाता है, सहयोगियों से टकराता है और जनता के रोजमर्रा के सवालों के बजाय केवल राष्ट्रीय राजनीतिक आरोपों पर निर्भर रहता है, तो उसके सामने भरोसे का संकट बना रह सकता है।

देश क्या देख रहा है?

देश का मतदाता केवल सरकार की परीक्षा नहीं लेता; वह विपक्ष को भी परखता है। वह देखता है कि कौन उसकी समस्याओं को समझ रहा है, कौन समाधान दे रहा है, कौन अपनी गलती स्वीकार कर रहा है और कौन हर परिस्थिति में अपनी जिम्मेदारी दूसरे पर डाल रहा है। विपक्ष को यह समझना होगा कि  यदि गठबंधन कमजोर है, तो उसे सुधारा जाए। यदि नेतृत्व पर सवाल हैं, तो उनका जवाब दिया जाए। और यदि जनता के मुद्दों से दूरी बनी है, तो उसे दूर किया जाए। सत्तारूढ़ दल के पास सत्ता, संगठन और सरकारी कामकाज का लाभ हो सकता है। इसलिए निष्पक्ष चुनाव सुनिश्चित करना और चुनावी शिकायतों की जांच करना और भी महत्वपूर्ण है। लेकिन विपक्ष को यह भी साबित करना होगा कि वह केवल सत्ता का विरोध करने वाला समूह नहीं, बल्कि देश चलाने का सक्षम विकल्प है।

निष्कर्ष: जनता को आरोप नहीं, भरोसेमंद विकल्प चाहिए

‘वोट चोरी’ का आरोप राजनीतिक बहस का बड़ा हिस्सा बन सकता है, लेकिन वह अपने आप विपक्ष की चुनावी कमजोरी का जवाब नहीं है। 2014, 2019 और 2024 के नतीजे बताते हैं कि जनता का मूड बदलता है और राजनीतिक दलों को उसके साथ बदलना पड़ता है। विपक्ष अगर अपनी हार के कारणों को समझने के बजाय हर बार चुनावी व्यवस्था को ही दोष देता दिखाई देगा, तो उसकी बात पर सवाल उठेंगे। लेकिन यदि वह प्रमाण के साथ चुनावी अनियमितता सामने लाता है और साथ ही अपनी रणनीति, संगठन तथा नेतृत्व की कमियों को सुधारता है, तो उसकी विश्वसनीयता बढ़ सकती है।

लोकतंत्र को मजबूत विपक्ष की जरूरत है—ऐसे विपक्ष की जो सरकार से जवाब मांगे, लेकिन खुद भी जवाबदेह बने। आखिरी सवाल यही है कि विपक्ष देश को यह समझाने में कितना सफल होगा कि चुनावी प्रक्रिया पर उसके आरोप प्रमाणित हैं, और वह खुद जनता का भरोसा जीतने के लिए क्या बदलने को तैयार है? लोकतंत्र में सरकार की जवाबदेही जरूरी है, लेकिन विपक्ष की जवाबदेही भी उतनी ही जरूरी है..!


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